ईरान, इज़राइल-अमेरीका युद्ध सेनिवारक कार्रवाई केंद्र

Iran, Israel-USA War Preventive Action Center

प्रो. नीलम महाजन सिंह

05 मार्च को विक्रम मिसरी, आई.एफ.एस. विदेश सचिव, ने ईरान के दूतावास में जा कर, सैयद अली खामेनेई, ईरान के सुप्रीम लीडर की मृत्यु पर शोक प्रकट किया। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री से मुलाकात की। इरान दूतावास की विज़िटर डायरी में भारत की ओर से ईरान को शौक जताया गया। 28 फरवरी को अमेरिका-इज़राइल ने राष्ट्रपति डाॅनल्ड ट्रम्प द्वारा हफ़्तों की सैन्य तैयारियों और धमकियों के बाद ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर हमला शुरू किया। ट्रम्प ने कहा कि इस अभियान का लक्ष्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना व “ईरानी शासन से उत्पन्न होने वाले खतरों को समाप्त करके अमेरिकी लोगों की रक्षा करना है”। ट्रम्प ने ईरानियों से इस हमले का लाभ उठाने का आग्रह किया, क्योंकि यह सरकार पर कब्ज़ा करने का “पीढ़ियों में एकमात्र मौका है”। बाद में ट्रम्प व इज़राइली अधिकारियों ने पुष्टि की, कि तेहरान पर इज़राइल रक्षा बल (आईडीएफ) के हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई मारे गए थे।

अमेरिका ने इस्फ़हान, कराज, करमानशाह, क़ुम और तब्रीज़ में सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर अतिरिक्त हमले किए। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए बहरीन, कुवैत, कतर व संयुक्त अरब अमीरात सहित पूरे मध्य पूर्व में इज़राइल-अमेरिकी ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। ईरान 1957 से परमाणु कार्यक्रम चला रहा है। इराक के साथ युद्ध के दौरान, ईरान ने 1980 के दशक के अंत में अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए परमाणु हथियार विकसित करने का निर्णय लिया था। परिणामस्वरूप, ईरान ने 1990 के दशक में इस कार्यक्रम के अनुसंधान में सहयोग के लिए चीन व रूस के साथ समझौते किए। 2002 में ईरानी असंतुष्ट समूहों से गठित एक संगठन, ‘नेशनल काउंसिल ऑफ रेजिस्टेंस ऑफ ईरान’ ने ईरान के दो परमाणु स्थलों के अस्तित्व का खुलासा किया, जिन्हें आईएईए से छिपाया गया था। 2003 तक, राजनयिकों ने एक अभियान शुरू किया। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए गहन प्रयास किए गए। ईरान सहमत हो गया, लेकिन उसने केवल परमाणु ऊर्जा के लिए अपने सेंट्रीफ्यूज रखने पर ज़ोर या। हालांकि उसने आईएईए को पारदर्शी रिपोर्टिंग करने की अपनी प्रतिबद्धता का पालन नहीं किया व गुप्त गतिविधियां जारी रखीं, जिसके परिणामस्वरूप एक विवाद खड़ा हो गया। जून 2004 में फटकार व सितंबर 2005 में आईएईए द्वारा गैर-अनुपालन पाए जाने से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में भविष्य में मामला भेजे जाने का मार्ग प्रशस्त हुआ। 2006 में यूएनएससी ने इसे अपनाया।ईरान को अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को निलंबित करने के लिए बाध्य किया गया। अगले कुछ वर्षों में, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने संवर्धन संबंधी गतिविधियों को निलंबित करने में ईरान की विफलता के लिए उस पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाने वाले कई प्रस्ताव पारित किए। प्रसिद्ध नेता हसन रूहानी ने ईरान का राष्ट्रपति चुनाव जीता। प्रतिबंध हटाना व अर्थव्यवस्था को बहाल करना, उनका संकल्प था। संयुक्त राज्य अमेरिका ने कई दौर की द्विपक्षीय वार्तालाप आयोजित किये व ईरान के नए नेतृत्व के साथ वार्ता में अन्य पी-5+1 गठबंधन सदस्यों – चीन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, यूनाइटेड किंगडम – का नेतृत्व किया। इन प्रयासों का परिणाम संयुक्त व्यापक कार्य योजना को अपनाने के रूप में सामने आया। 2015 में जेसीपीओ (JCPOA) पर हस्ताक्षर किए गए थे। प्रमुख पक्षों द्वारा समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने इसे मंजूरी दे दी। ‘संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 2231’, प्रतिबंधों में राहत का मार्ग प्रशस्त करता है। हालांकि जेसीपीओ ने ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को सीमित कर दिया, लेकिन उसकी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं बढ़ती रहीं। इसके माध्यम से शिया उग्रवादियों को हथियारबंद करना और प्रशिक्षण देना कुद्स फोर्स, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) की अंतरराष्ट्रीय शाखा ने मध्य पूर्व में सांप्रदायिक विभाजन को और बढ़ा दिया है। ईरान ने ‘फिलिस्तीनी आतंकवादी समूह हमास’ को वर्षों से सैन्य सहायता व प्रशिक्षण प्रदान किया है, जिसके कारण 7 अक्टूबर, 2023 को उसने इज़राइल पर हमला किया। लेबनान में हिज़्बुल्लाह को उन्नत सशस्त्र ड्रोन दिए गए, जिन्हें प्रशिक्षित व वित्त पोषित किया गया।

सीरिया में एक लाख शिया लड़ाकू, जिन्हें आपूर्ति की गई थी बैलिस्टिक मिसाइलें औरयमन के हौथियों को ड्रोन मुहैया कराए व इराक में शिया मिलिशिया की मदद की। इरान, आतंकवाद को प्रायोजित करने वाला सबसे प्रमुख राज्य रहा, जो प्रति वर्ष एक अरब डॉलर से अधिक आतंकवादी वित्तपोषण पर खर्च करता रहा। इनके बीच अफगानिस्तान, गाजा, लेबनान, पाकिस्तान, सीरिया, यमन में आईआरजीसी-कुद्स फोर्स के सहयोगी बलों की संख्या क्रमशः 140,000 और 185,000 है ।

ईरान को पिछले चालीस वर्षों में सबसे बुरे आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा है, जिससे ईरानी तेल निर्यात आधे से अधिक कम हो गया है। बातचीत पर ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर जेसीपीओ के प्रतिबंधों का उल्लंघन करना शुरू कर दिया, जिससे तनाव बढ़ गया। इज़राइल-ईरान के बीच संघर्ष अक्टूबर 2023 में अमेरिका के करीबी सहयोगी इज़राइल व ईरान समर्थित फ़िलिस्तीनी आतंकवादी समूह ‘हमास’ के बीच युद्ध छिड़ने से ईरान- इज़राइल के बीच तनाव बढ़ गया। ईरान समर्थित प्रॉक्सी बलों ने गाज़ा पट्टी में इज़राइल के सैन्य घुसपैठ के विरोध में हमले तेज कर दिए। इराक-सीरिया में अमेरिकी और इजरायली ठिकानों पर दो सौ हमले हुए। इसके जवाब में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने 26 अक्टूबर, 2023 को ईरान समर्थित दो ठिकानों पर हवाई हमले का आदेश दिया व 2 फरवरी, 2024 को इन दोनों देशों में ईरान से जुड़े 85 ठिकानों पर हमले किए गए। यमन में ‘हौथी औरलेबनान में हिजबुल्लाह’, जो ईरान के प्रतिरोध के दोनों सहयोगी हैं – ने भी लाल सागर और लेबनान के साथ इजरायल की उत्तरी सीमा से हमले किए, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर इसके फैलने की आशंका बढ़ गई। हमास व हिज़्बुल्लाह के नेताओं की इज़राइल द्वारा हत्या के बाद, ईरान ने हमला शुरू किया। अक्टूबर 2024 में इज़राइल के खिलाफ 180 बैलिस्टिक मिसाइलें दागी गईं। अब ईरान पर सबसे बड़ा सीधा हमला है, जिसमें उसकी हवाई सुरक्षा व मिसाइल उत्पादन सुविधाओं को निशाना बनाया गया। इज़राइल का हमास – हिजबुल्लाह के नेतृत्व का सफाया, साथ ही सीरिया में ‘बशर अल-असद’ शासन के पतन ने 2024 में ईरान के प्रतिरोध के ध्रुव को काफी कमज़र कर दिया। 2025 में सत्ता में लौटने पर अमेरिकी राष्ट्रपति डाॅनल्ड ट्रम्प ने तेहरान के खिलाफ़त, अपने अधिकतम दबाव अभियान को फिर से शुरू किया। साथ ही उसके परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत भी शुरूआत की। 2018 में अमेरिका द्वारा जेसीपीओए परमाणु समझौते से हटने के बाद से ये पहली प्रत्यक्ष अमेरिकी-ईरान वार्ता है। इज़राइल इन वार्ताओं का पूर्णतः विरोधी रहा है व ईरान के परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता बनाए हुए है। इज़राइली अधिकारियों का तर्क है कि परमाणु हथियार विकसित करने के ईरान के गुप्त प्रयास क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को मौलिक रूप से बदल देंगे, जिससे इज़राइल के अस्तित्व को सीधा खतरा होगा। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने यह बयान दिया। ईरान ने इस हमले को “युद्ध का कृत्य” घोषित किया व जवाबी कार्रवाई में ड्रोन, दर्जनों बैलिस्टिक मिसाइलों का प्रक्षेपण किया। इजरायली प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस अभियान को ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने का अंतिम उपाय बताया। हालांकि ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में परमाणु वार्ता फिर से शुरू होने के बाद, तेजी से इजरायल के उद्देश्यों के प्रति समर्थन व्यक्त किया व तेहरान में सत्ता परिवर्तन के प्रति अपनी तत्परता का संकेत दिया। इज़राइल-ईरान के बीच एक सप्ताह तक चले हवाई हमलों के बाद, संयुक्त राज्य अमेरिका ने सीधे तौर पर हस्तक्षेप करते हुए ईरान के फोर्डो, इस्फ़हान और नतान्ज़ स्थित तीन परमाणु ठिकानों पर हमला किया। ट्रंप प्रशासन ने दावा किया कि इन हमलों से ईरान की हथियार-योग्य यूरेनियम प्राप्त करने की क्षमता में काफ़ी कमी आई है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के परमाणु निगरानी निकाय के प्रमुख ने आंकलन किया कि कार्यक्रम में कुछ महीनों की ही देरी हुई है। यह एक सीक्रेट कोशिश थी ताकि इंटरनेट एक्सेस पर सरकारी पाबंदियों का सामना करने में विरोधियों की मदद की जा सके। यह बात बिना नाम बताए, अधिकारियों ने वॉल स्ट्रीट जर्नल को बताई। व्हाइट हाउस ने इस रिपोर्ट पर कोई कमेंट नहीं किया, लेकिन जनवरी में पब्लिकली कहा था कि ट्रंप ने स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क से ईरान में कनेक्टिविटी पक्का करने के बारे में बात की थी। 11 फ़रवरी 2026 को ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के एक सलाहकार ने कहा कि ईरान की मिसाइल कैपेबिलिटी पर अभी ‘रेड लाइन’ बनी हुई है, क्योंकि वॉशिंगटन व तेहरान आगे बढ़ने से बचने के लिए बातचीत के दूसरे राउंड पर विचार कर रहे हैं (रॉयटर्स)। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि उन्होंने नेतन्याहू से कहा कि अगर हो सका तो वह ईरान के साथ डील करना जारी रखेंगे, हालांकि उन्होंने और कोई जानकारी नहीं दी। सारांंशार्थ इस काल में किसी प्रकार का युद्ध मानवता के लिए घातक है। ईरान की वेस्ट एशिया व साउथ एशिया में महत्वपूर्ण वैश्विक उपस्थिति है। किसी प्रकार से भी बिग ब्रदर अमेरिका को ये साम्राज्यवाद रोकना चाहिए। दूसरे देशों के प्राकृतिक संसाधनों को harapne हड़पने की चेष्ठा, इस युग में घातक है। सैय्यद अली खामेनेई की निर्मम हत्या से शिआ मुस्लिम आहत हैं। शांति का मार्ग राजनयिक वार्तालाप से सम्भव है, युद्ध से नहीं।

प्रो. नीलम महाजन सिंह (वरिष्ठ पत्रकार, अंतर्राष्ट्रीय सामयिक विशेषज्ञ, दूरदर्शन व्यक्तित्व, सॉलिसिटर फॉर ह्यूमन राइट्स संरक्षण व परोपकारक)