राजेश जैन
मध्य-पूर्व एक बार फिर उस उबाल पर है, जहां हर मिसाइल सिर्फ सीमाओं को नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और आने वाले समय की दिशा को प्रभावित कर रही है। ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच चल रहा यह संघर्ष पारंपरिक युद्ध से कहीं ज्यादा जटिल है। यह एक ऐसी लड़ाई है जिसमें हर पक्ष जीत को अलग तरीके से परिभाषित कर रहा है। कोई वर्चस्व चाहता है, कोई सुरक्षा और कोई सिर्फ अपने अस्तित्व को बचाए रखना।
इस संघर्ष की पृष्ठभूमि दशकों पुरानी है। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद से अमेरिका और ईरान के रिश्तों में अविश्वास स्थायी हो गया। इजराइल के लिए ईरान हमेशा एक संभावित खतरा रहा, खासकर उसके परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल क्षमता के कारण। समय के साथ ईरान ने अपने प्रभाव का विस्तार लेबनान, सीरिया, यमन और गाजा तक किया, जिससे यह टकराव केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे क्षेत्र में फैल गया। आज की स्थिति उसी लंबे तनाव का परिणाम है, जहां हर पक्ष दूसरे को सीमित या कमजोर करना चाहता है।
अमेरिका: बदलते लक्ष्य, बढ़ता दबाव
अमेरिका इस युद्ध में सबसे उलझी हुई स्थिति में दिखता है। उसका घोषित उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना है, लेकिन व्यवहार में उसके लक्ष्य कई परतों में बंटे हुए हैं। कभी वह सिर्फ सैन्य क्षमता घटाने की बात करता है, कभी ईरान की क्षेत्रीय पकड़ खत्म करने की और कभी सीधे सत्ता परिवर्तन की उम्मीद जताता है। यही अस्पष्टता उसकी रणनीति को कमजोर बनाती है। दूसरी तरफ घरेलू दबाव भी कम नहीं है-तेल की बढ़ती कीमतें, महंगा सैन्य अभियान और एक और लंबे मध्य-पूर्वी युद्ध में फंसने का डर। ऐसे में अमेरिका के लिए जीत को परिभाषित करना ही सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
इजराइल: खतरे को जड़ से खत्म करने की कोशिश
इजराइल इस युद्ध में सबसे स्पष्ट लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रहा है। उसके लिए ईरान की मिसाइल क्षमता और परमाणु कार्यक्रम सीधा अस्तित्व का सवाल है। इसलिए उसकी रणनीति बेहद आक्रामक और सटीक है-मिसाइल ठिकानों को नष्ट करना, कमांड सिस्टम तोड़ना और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के नेटवर्क को कमजोर करना। इजराइल सिर्फ तत्काल नुकसान पहुंचाना नहीं चाहता, बल्कि वह एक दीर्घकालिक डिटरेंस यानी ऐसा डर कि ईरान भविष्य में दोबारा ऐसी ताकत खड़ी करने से पहले कई बार सोचे, बनाना चाहता है। इसीलिए वह युद्ध को जल्दी खत्म करने की बजाय अपनी शर्तों पर समाप्त करना चाहता है।
ईरान और आईआरजीसी: हार नहीं, टिके रहना ही जीत
ईरान इस संघर्ष को अलग नजरिए से देख रहा है। उसके लिए यह जीत-हार की लड़ाई नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है। वह जानता है कि पारंपरिक युद्ध में वह अमेरिका या इजराइल का मुकाबला नहीं कर सकता, इसलिए उसने अपनी रणनीति को “असममित युद्ध” पर आधारित किया है। यहीं पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आता है। यह सिर्फ एक सैन्य संगठन नहीं, बल्कि एक वैचारिक और रणनीतिक ढांचा है, जिसके पास अपनी थल, वायु और नौसेना, मिसाइल प्रोग्राम, ड्रोन तकनीक और अंतरराष्ट्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क है। आईआरजीसी ने ईरान को एक हाइब्रिड वॉर मशीन में बदल दिया है-जहां ड्रोन, गुरिल्ला रणनीति और प्रॉक्सी समूह मिलकर युद्ध को लंबा और महंगा बनाते हैं। ईरान के लिए यही रणनीति सबसे बड़ी सुरक्षा है। वह जानता है कि अगर वह टिक गया, तो वह इस युद्ध को अपनी जीत के रूप में पेश कर सकता है।
खाड़ी देश और वैश्विक असर: युद्ध का असली दबाव
इस युद्ध का सबसे बड़ा असर उन देशों पर पड़ रहा है जो सीधे इसमें शामिल नहीं हैं। सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देश लगातार हमलों और अस्थिरता का सामना कर रहे हैं। उनके लिए सबसे बड़ा खतरा आर्थिक है-तेल आपूर्ति, निवेश और क्षेत्रीय स्थिरता पर असर। होर्मुज़ जलडमरूमध्य इस पूरे संघर्ष का सबसे संवेदनशील बिंदु बन गया है। दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल इसी रास्ते से गुजरता है। अगर यह मार्ग बाधित होता है, तो इसका असर ल की कीमतों से लेकर सप्लाई चेन तक, पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यानी यह युद्ध अब सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक मोर्चे पर भी लड़ा जा रहा है।
यह युद्ध कब खत्म होगा
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह युद्ध कब और कैसे खत्म होगा। फिलहाल तीन संभावनाएं दिखती हैं। पहली, अगर किसी तरह का कूटनीतिक समझौता होता है-हालांकि मौजूदा हालात में इसकी संभावना सीमित है। दूसरी, अगर सभी पक्ष युद्ध से थक जाएं और एक अनौपचारिक विराम बन जाए। तीसरी, अगर इजराइल ईरान की सैन्य क्षमता को काफी हद तक कमजोर कर दे और ईरान सिर्फ टिके रहने को अपनी जीत मान ले। लेकिन सच्चाई यह है कि इस संघर्ष का कोई स्पष्ट और स्थायी अंत नजर नहीं आता। यह युद्ध रुक भी जाए, तो दूसरे रूप में जारी रह सकता है-प्रॉक्सी युद्ध, साइबर हमले या आर्थिक टकराव के रूप में।
यह अंत नहीं, एक लंबी कहानी की शुरुआत है
ईरान युद्ध को समझने के लिए सिर्फ यह देखना काफी नहीं कि कौन किस पर हमला कर रहा है। असली कहानी यह है कि हर पक्ष क्या हासिल करना चाहता है और किस हद तक जाने को तैयार है। अमेरिका व्यवस्था बदलना चाहता है, इजराइल खतरा खत्म करना चाहता है और ईरान सिर्फ टिके रहना चाहता है।यही तीनों लक्ष्य इस युद्ध को लंबा और जटिल बना रहे हैं। दुनिया इस आग को जल्दी बुझते देखना चाहती है, लेकिन मध्य-पूर्व का इतिहास बताता है-यहां युद्ध खत्म नहीं होते, सिर्फ अपना रूप बदलते हैं।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। )





