क्या “सभ्यताओं का संघर्ष” है अमेरिका+इज़राइल–ईरान युद्ध ?

Is the US-Israel-Iran war a “clash of civilizations”?

तनवीर जाफ़री

अमेरिका -इस्राईल द्वारा ईरान पर थोपे गये युद्ध को विश्व राजनीति में अनेक दृष्टिकोणों से परिभाषित किया जा रहा है। अनेक अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषकों की राय है कि यह युद्ध अमेरिका द्वारा विश्व की तेल संपदा पर नियंत्रण करने की एक जानी पहचानी चाल है जिसे ईरान पर परमाणु हथियार निर्मित करने के प्रयासों के बहाने युद्ध के रूप में अंजाम दिया जा रहा है। कुछ का मत है कि यह शस्त्र निर्माता देशों द्वारा अपने हथियार बेचने व खपाने की ख़ातिर लड़ा जा रहा युद्ध है। कुछ इस युद्ध को इस्राईल की गहरी चाल बता रहे हैं क्योंकि इस्राईल ईरान को अपने सपनों के ‘ग्रेटर इस्राईल ‘ के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा समझता है। जबकि कुछ इस युद्ध को ईसाई व मुस्लिम जगत के बीच छिड़े युद्ध के नज़रिये से भी देख रहे हैं। तो क्या इस युद्ध को अन्य कारणों के अतिरिक्त ईसाई व मुस्लिम जगत के बीच छिड़े दो अलग अलग “सभ्यताओं के संघर्ष” की अवधारणा के रूप में भी देखा जा सकता है ? क्या है और कहाँ से शुरू हुई “सभ्यताओं का संघर्ष” की यह अवधारणा ?

दरअसल सबसे पहले यह विचार सैमुअल पी. हंटिंगटन ने 1993 में Foreign Affairs पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख “The Clash of Civilizations?” के माध्यम से व्यक्त किये थे। बाद में उनके यही विचार 1996 में उनकी चर्चित पुस्तक The Clash of Civilizations and the Remaking of World Order में प्रस्तुत किये गये। सैमुअल पी. हंटिंगटन राजनीति शास्त्र के एक प्रमुख अमेरिकी विद्वान और हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर थे। उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में लगभग 58 वर्ष तक अध्यापन का कार्य किया। “सभ्यताओं के संघर्ष” का सिद्धांत उन्हीं के द्वारा व्यक्त किया गया विचार है जिसे ‘हंटिंगटन के सिद्धांत’ के रूप में भी जाना जाता है। यह थ्योरी अमेरिका में हुये 9/11 के हमलों के बाद और भी चर्चित हुई और आज भी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में इसका समय समय पर ज़िक्र होता रहता है। वर्तमान अमेरिका -इस्राईल -ईरान युद्ध के दौरान इसतरह की चर्चा एक बार फिर तेज़ हो गयी है। तो क्या अमेरिका द्वारा मध्य एशिया पर थोपी गयी जंग को ईसाई व मुस्लिम जगत के बीच छिड़ी दो अलग अलग “सभ्यताओं के संघर्ष” के रूप में परभाषित किया जा सकता है या परिभाषित किया जाना चाहिए ?

सबसे पहले तो यदि मुख्य रूप से मध्य एशिया में युद्धरत इन तीन देशों को ही देखें तो ईरान जहाँ शिया मुस्लिम बाहुल्य देश है वहीँ इस्राइल एक यहूदी बाहुल्य मुल्क है जबकि युद्ध में उसका मुख्य सहयोगी अमेरिका एक ईसाई देश है। परन्तु इन तीनों ही देशों की सेनाओं में प्रत्येक धर्मों के लोग देखे जा सकते हैं। जहाँ इस्राईल की सेना इस्राईल डिफ़ेंस फ़ोर्सेज़ IDF में आज भी अरब व ईसाई मूल के लोग बड़ी संख्या में स्वेच्छा से अपनी सेवाएं दे रहे हैं वहीँ अमेरिका में भी हज़ारों मुस्लिम अमेरिकी सेना का हिस्सा हैं। यहाँ तक कि अमेरिका में कई महत्वपूर्ण अधिकारी स्तर के पदों पर भी कई मुस्लिम तैनात हैं। IDF व US मिलिट्री दोनों ही जगह मुस्लिम सैनिकों को नमाज़,रोज़ा व हलाल खाने जैसे सभी धार्मिक अधिकार व सुविधायें हासिल हैं। इसी तरह ईरान की सेना में भी ईसाई और यहूदी दोनों ही मूल के सैनिक कार्यरत हैं। वैसे भी चूँकि ईरान में 18 वर्ष से ऊपर के सभी पुरुष नागरिकों के लिए 2 साल की अनिवार्य सैन्य सेवा है, जिसमें ईसाई,आर्मेनियन और असिरियन, यहूदी और ज़ोरोस्ट्रियन जैसे सभी मान्यता प्राप्त धार्मिक अल्पसंख्यक भी शामिल हैं। पिछले दिनों अमेरिका ईरान युद्ध के दौरान भी एक ईसाई ईरानी सैनिक के शहीद होने पर ईरानी सत्ता प्रमुख स्व सैय्यद अली ख़ामनेई ने उस ईसाई फ़ौजी अधिकारी के घर पहुंचकर उसके परिवार को सांत्वना दी थी जिसकी वीडिओ काफ़ी वायरल हुई थी।

अब यदि इसी मध्य एशिया युद्ध को और बड़े सन्दर्भ में देखें तो भी हमें ऐसा कुछ भी नज़र नहीं आता जिससे इसे ईसाई व मुस्लिम जगत के बीच छिड़े “सभ्यताओं के संघर्ष” के रूप में वर्णित किया जा सके। वर्तमान ईरान–यूएस–इस्राईल युद्ध में ईरान को राजनयिक और राजनीतिक समर्थन देने वाले बड़े देशों में रूस का नाम प्रमुख रूप से लिया जा सकता है। रूस ने ईरान को वायु‑रक्षा, ड्रोन तकनीक और अन्य उपकरणों की आपूर्ति की जिससे ईरान को आत्मरक्षा में भी आसानी हुई और वह इस्राईल व अमेरिकी ठिकानों पर भी कारगर हमले कर सका। जबकि रूस में भी सबसे बड़ा धर्म ईसाई धर्म है। ख़ास तौर पर यहां रूढ़िवादी ईसाई रूस की कुल आबादी का लगभग 60–70% हैं। यदि यह युद्ध “सभ्यताओं का संघर्ष” होता तो उस लिहाज़ से रूस ईसाई बाहुल्य अमेरिका के साथ खड़ा नज़र आता न कि मुस्लिम बाहुल्य देश ईरान के साथ ? इसी तरह चीन ने भी इस युद्ध के दौरान आयरन डोम से लेकर अत्याधुनिक संचार व सूचना प्रणाली तक सब कुछ मुहैय्या कराया। यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ व संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी रूस व चीन ईरान के साथ मज़बूती से खड़े रहे। चीन भी आधिकारिक तौर पर एक नास्तिक व धर्म‑निरपेक्ष देश है परन्तु यहाँ सबसे बड़ी धार्मिक आबादी बौद्ध धर्म, ताओवाद और कन्फ़्यूज़ियसवाद के अनुयायियों की है। इनमें से किसी वर्ग का इस्लाम से कोई मेल नहीं खाता। फिर भी चीन ईरान के साथ डटकर खड़ा रहा।

इसके अतिरिक्त फ़्रांस,स्पेन,इटली जैसे कई ईसाई बाहुल्य देशों ने ईरान पर अमेरिकी हमलों की आलोचना कर यह जता दिया कि यह ईसाई व मुस्लिम जगत के बीच छिड़ा दो अलग अलग “सभ्यताओं का संघर्ष” क़तई नहीं। इसी तरह सऊदी अरब,संयुक्त अरब अमीरात,बहरीन,क़तर,कुवैत,जॉर्डन ,मिस्र व मोरक्को जैसे अनेक मुस्लिम बाहुल्य देशों ने परोक्ष या अपरोक्ष रूप से यहाँ तक कि अपने देशों में अमेरिकी व अन्य पश्चिमी देशों के सैन्य अड्डे उपलब्ध कराकर ईरान की खुलकर मुख़ालिफ़त भी की। इसलिये इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि किसी भी युद्ध को धार्मिक युद्ध या “सभ्यताओं का संघर्ष” के रूप में नहीं परिभाषित किया जाना चाहिए। क्योंकि प्रायः लगभग हर युद्ध के मूल में शक्तिसंतुलन,वर्चस्व,संसाधन,हथियारों की होड़,व्यवसायिकता,विस्तारवाद,पूंजीवाद,साम्यवाद व तरह तरह की राजनीति ही रही है। वर्तमान युद्ध भी जहाँ तेल संसाधनों पर अमेरिकी गिद्ध दृष्टि का परिणाम है वहीँ यह इस्राईल की विस्तारवादी नीति व महत्वाकांक्षाओं का भी नतीजा है। इस युद्ध को ईसाई-मुस्लिम युद्ध कहना न तो सही है, न ही उपयोगी। हाँ ऐसे विचारों को हवा देने से आपसी समझ बढ़ने के बजाय सामाजिक विभाजन ही बढ़ने की प्रबल संभावना है । युद्ध की वास्तविकता को समझने के लिये भू-राजनीति, इतिहास और शक्ति संतुलन को देखना ज़रूरी है, न कि केवल किसी देश की बहुसंख्य आबादी का धर्म। इस आधार पर सैमुअल पी. हंटिंगटन द्वारा पेश किये गये “सभ्यताओं के संघर्ष” के सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया जा सकता।