अमेरिका-ईरान शांति वार्ता के बीच इजऱायल का हिज़्बुल्लाह पर आक्रामक रुख

Israel takes aggressive stance against Hezbollah amid US-Iran peace talks

सौरभ वार्ष्णेय

पश्चिम एशिया एक बार फिर विरोधाभासों के दौर से गुजर रहा है। एक ओर अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता की संभावनाएं बन रही हैं, वहीं दूसरी ओर इजऱायल ने लेबनान में हिज़्बुल्लाह के ठिकानों पर हमले तेज कर दिए हैं। यह स्थिति न केवल क्षेत्रीय संतुलन को चुनौती दे रही है, बल्कि शांति प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगा रही है। इजऱायल का तर्क साफ है—वह अपनी सुरक्षा को लेकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहता। हिज़्बुल्लाह को वह अपने लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है, जो ईरान के समर्थन से उत्तरी सीमा पर लगातार दबाव बनाए हुए है। ऐसे में जब अमेरिका और ईरान बातचीत की मेज पर हैं, इजऱायल इसे एक अवसर के रूप में देख रहा है कि वह सैन्य कार्रवाई के जरिए अपने दुश्मनों को कमजोर कर दे। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह रणनीति दीर्घकालिक शांति की राह आसान करती है, या फिर इसे और जटिल बना देती है? शांति वार्ता का मूल उद्देश्य तनाव कम करना होता है, जबकि इजऱायल के हमले उसी समय तनाव को बढ़ा रहे हैं। इससे यह संदेश जाता है कि क्षेत्रीय शक्तियां अपने-अपने हितों को प्राथमिकता दे रही हैं, भले ही इससे व्यापक शांति प्रक्रिया प्रभावित हो।

लेबनान की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। पहले से ही आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा यह देश अब एक नए संघर्ष की आग में झुलस रहा है। आम नागरिकों के लिए यह हालात और भी भयावह होते जा रहे हैं, जहां हर विस्फोट के साथ जीवन और भविष्य दोनों अनिश्चित होते जा रहे हैं।इस पूरे घटनाक्रम में ईरान की भूमिका भी अहम है। हिज़्बुल्लाह को उसका समर्थन इजऱायल के लिए सीधी चुनौती है। ऐसे में अमेरिका–ईरान वार्ता का परिणाम चाहे जो भी हो, इजऱायल अपनी सुरक्षा रणनीति में कोई ढील देने के मूड में नहीं दिखता। यह स्थिति एक बड़े सवाल को जन्म देती है—क्या पश्चिम एशिया में शांति केवल कूटनीतिक वार्ताओं से संभव है, या इसके लिए सभी पक्षों को एक समान प्रतिबद्धता दिखानी होगी? जब तक एक ओर बातचीत और दूसरी ओर बमबारी का सिलसिला चलता रहेगा, तब तक शांति एक दूर का सपना ही बनी रहेगी।आज जरूरत इस बात की है कि सभी संबंधित पक्ष संयम बरतें और शांति प्रक्रिया को कमजोर करने वाले कदमों से बचें। वरना, यह विरोधाभास न केवल वर्तमान संकट को गहरा करेगा, बल्कि भविष्य में किसी स्थायी समाधान की संभावनाओं को भी धूमिल कर देगा।

हिज़्बुल्लाह क्यों है इजऱायल की प्राथमिकता?
पाकिस्तान में चल रही अमेरिका -ईरान शांति वार्ता के बीच इजरायल हिज़्बुल्लाह लेबनान पर जबरदस्त हमलें कर रहा है। इजऱायल के लिए हिज़्बुल्लाह केवल एक संगठन नहीं, बल्कि उसकी उत्तरी सीमा पर मौजूद सबसे बड़ा सुरक्षा खतरा है। लेबनान में सक्रिय यह संगठन ईरान समर्थित है और उसके पास हजारों रॉकेट और मिसाइलें हैं, जो सीधे इजऱायल के शहरों को निशाना बना सकती हैं। 2006 का इजऱायल-हिज़्बुल्लाह युद्ध 2006 इस खतरे का स्पष्ट उदाहरण रहा है, जब हिज़्बुल्लाह ने इजऱायल को भारी चुनौती दी थी।

इजऱायल की रणनीति साफ है—वह अपनी सीमाओं के आसपास किसी भी ऐसे सैन्य संगठन को पनपने नहीं देना चाहता, जो भविष्य में बड़े युद्ध का कारण बन सके। हिज़्बुल्लाह की बढ़ती ताकत और आधुनिक हथियारों की उपलब्धता इजऱायल की पूर्व-रक्षात्मक नीति को और आक्रामक बनाती है। दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है ईरान की भूमिका। हिज़्बुल्लाह को ईरान का प्रॉक्सी माना जाता है, जो इजऱायल के खिलाफ छद्म युद्ध का हिस्सा है। ऐसे में हिज़्बुल्लाह पर हमला करना, दरअसल ईरान के प्रभाव को सीमित करने की रणनीति भी है। इजऱायल नहीं चाहता कि उसके आसपास ईरान का सैन्य घेरा मजबूत हो।इसके अलावा, इजऱायल के आंतरिक राजनीतिक दबाव भी इस नीति को प्रभावित करते हैं। सुरक्षा के मुद्दे पर कठोर रुख अपनाना वहां की सरकारों के लिए जरूरी होता है। नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और किसी भी संभावित खतरे को पहले ही खत्म करना, इजऱायल की नीति का मूल आधार है।हालांकि, इस आक्रामक रणनीति के अपने जोखिम भी हैं। लेबनान में हिज़्बुल्लाह के खिलाफ व्यापक कार्रवाई पूरे क्षेत्र को बड़े युद्ध की ओर धकेल सकती है। इससे न केवल लेबनान, बल्कि सीरिया और अन्य पड़ोसी देश भी प्रभावित हो सकते हैं।इजऱायल का हिज़्बुल्लाह को खत्म करने का उद्देश्य केवल तत्काल सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दीर्घकालिक रणनीतिक संतुलन से जुड़ा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सैन्य समाधान ही स्थायी शांति ला सकता है? जब तक क्षेत्रीय राजनीति, ईरान–इजऱायल तनाव और लेबनान की आंतरिक स्थिति में सुधार नहीं होता, तब तक यह संघर्ष बार-बार उभरता रहेगा। यह स्थिति बताती है कि पश्चिम एशिया में शांति केवल हथियारों से नहीं, बल्कि कूटनीति, संवाद और संतुलित नीतियों से ही संभव है।

हिज़्बुल्लाह को खत्म करने का उद्देश्य
मध्य-पूर्व की राजनीति में हिज़्बुल्लाह एक ऐसा नाम है, जो सिर्फ एक संगठन नहीं बल्कि एक विचारधारा, सैन्य ताकत और क्षेत्रीय प्रभाव का प्रतीक बन चुका है। विशेषकर इजऱायल के लिए यह संगठन वर्षों से सबसे बड़ा सुरक्षा खतरा माना जाता रहा है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि इजऱायल हिज़्बुल्लाह को पूरी तरह खत्म क्यों करना चाहता है।

इसको सिलसिलेवार समझते हैं कि सबसे पहला सुरक्षा और अस्तित्व का प्रश्न ? इजऱायल के लिए हिज़्बुल्लाह सिर्फ एक विरोधी संगठन नहीं, बल्कि उसकी सीमाओं पर खड़ा एक सशस्त्र खतरा है। लेबनान के दक्षिणी हिस्से से हिज़्बुल्लाह के पास हजारों रॉकेट और मिसाइलें हैं, जो सीधे इजऱायली शहरों को निशाना बना सकती हैं। ऐसे में इजऱायल के लिए यह लड़ाई अपने नागरिकों की सुरक्षा और अपने अस्तित्व से जुड़ी है।

दूसरा क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करना। हिज़्बुल्लाह को ईरान का करीबी सहयोगी माना जाता है। ईरान इस संगठन के माध्यम से मध्य-पूर्व में अपना प्रभाव बढ़ाता है। इजऱायल के लिए हिज़्बुल्लाह को कमजोर करना, दरअसल ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव को चुनौती देना भी है। इजऱायल की सैन्य नीति अक्सर “पहले ही खतरे को खत्म करना” रही है। हिज़्बुल्लाह के बढ़ते सैन्य संसाधन और तकनीकी क्षमता (जैसे सटीक मिसाइलें) भविष्य में बड़े युद्ध का कारण बन सकते हैं। इसलिए इजऱायल इसे समय रहते खत्म करना चाहता है, ताकि संभावित बड़े संघर्ष से बचा जा सके। अंतिम कारण मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक दबदबा है।

हिज़्बुल्लाह ने 2006 के लेबनान युद्ध 2006 में इजऱायल को कड़ी टक्कर दी थी। इस युद्ध ने इजऱायल की “अजेय” छवि को झटका दिया। ऐसे में हिज़्बुल्लाह को खत्म करना इजऱायल के लिए अपनी सैन्य और राजनीतिक श्रेष्ठता को पुन: स्थापित करने का भी प्रयास है। इजऱायल के भीतर भी सरकारों पर दबाव रहता है कि वे नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। साथ ही, अमेरिका जैसे सहयोगियों का समर्थन भी इस नीति को मजबूती देता है। हिज़्बुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई से इजऱायल अपने सहयोगियों को यह संदेश देता है कि वह आतंकवाद और क्षेत्रीय अस्थिरता के खिलाफ सख्त रुख अपनाए हुए है। हिज़्बुल्लाह को खत्म करने का उद्देश्य केवल एक संगठन को समाप्त करना नहीं है, बल्कि यह सुरक्षा, रणनीति, राजनीति और शक्ति संतुलन का मिश्रण है। हालांकि, यह भी सच है कि ऐसी किसी भी कोशिश के गंभीर मानवीय और क्षेत्रीय परिणाम हो सकते हैं। इसलिए यह संघर्ष केवल सैन्य नहीं, बल्कि कूटनीतिक समाधान की भी मांग करता है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।