अशोक भाटिया
आखिरकार अंतिम समय में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने असम में 21 सीटों पर विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। पार्टी ने कांग्रेस से गठबंधन की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली। कांग्रेस झामुमो को 7 सीट से अधिक देने को तैयार नहीं हुई। कांग्रेस को पता है कि असम में झामुमो की कोई खास पकड़ नहीं है। इसलिए उसने 7 सीटों से अधिक देना उचित नहीं समझा। दोनों तरफ से बारगेनिंग हुई। लेकिन बात नहीं बनी। यह स्वाभाविक राजनीतिक स्थिति है कि जिस राज्य में जिस पार्टी का दबदबा रहता है वह अपने हिसाब से गठबंधन करती है और सहयोगी दलों को सीट देती है।
असम विधानसभा चुनाव को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा के निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने कहा है कि इस निर्णय से राज्य में आदिवासी मतों का बिखराव होगा। झामुमो ने सोमवार को 126 सदस्यों वाली असम विधानसभा के लिए 21 उम्मीदवारों की घोषणा की है।केशव महतो कमलेश ने कहा कि कांग्रेस पार्टी ने असम विधानसभा चुनाव में झामुमो के साथ गठबंधन को लेकर गंभीर एवं सकारात्मक पहल की थी। झामुमो को पांच से सात सीटों का प्रस्ताव भी दिया गया था।
यह भी आश्वासन दिया गया था कि जिन सीटों पर झामुमो चुनाव लड़ेगा, वहां वहां कांग्रेस का पूरा संगठनात्मक समर्थन रहेगा। कांग्रेस की मंशा स्पष्ट रूप से यह थी कि झामुमो के प्रतिनिधि असम विधानसभा में पहुंचे। लेकिन, झामुमो ने स्थानीय दलों के सहयोग को लेकर 21 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। कमलेश ने कहा कि कांग्रेस पार्टी असम में झामुमो के चुनावी नतीजे के बारे में कोई अंदाजा नहीं लगाना चाहती, लेकिन हमें चिंता है कि झामुमो को यह फैसला आदिवासी वोटों को बांट सकता है।
ऐसे में पार्टी ने अब अकेले चुनाव मैदान में उतरने का फैसला लिया है। झामुमो के केंद्रीय महासचिव विनोद कुमार पांडेय ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि पार्टी 19 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी, जबकि एक सीट भाकपा माले के लिए छोड़ी गई है। नामांकन की अंतिम तिथि कल ही होने के कारण पार्टी ने तेजी से रणनीति को अंतिम रूप दे दिया है।
काफी समय से कयास लगाए जा रहे थे कि विपक्षी दल एक मजबूत गठबंधन के साथ बीजेपी के सामने खड़े होंगे। इसी सिलसिले में रांची से लेकर दिल्ली तक बैठकों का कई दौर चला। खुद असम कांग्रेस के प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह और गौरव गोगोई ने हेमंत सोरेन से मुलाकात की थी। बात यहीं नहीं रुकी, सोरेन खुद दिल्ली जाकर कांग्रेस आलाकमान से भी मिले, लेकिन हफ्तों की माथापच्ची के बाद भी सीटों के गणित पर कोई ठोस सहमति नहीं बन सकी। अंततः, झामुमो ने हार मानकर अपने 19 उम्मीदवारों की सूची फाइनल कर दी है और उन्हें पार्टी का पारंपरिक चुनाव चिन्ह ‘तीर-कमान’ भी सौंप दिया गया है।
झामुमो की इस अकेले चलने की जिद के पीछे एक सोची-समझी चुनावी रणनीति छिपी है। पार्टी का मुख्य ध्यान असम के उन इलाकों पर है जहां चाय बागानों में काम करने वाले लोग और आदिवासी समुदाय बड़ी संख्या में रहते हैं। इन समुदायों के साथ पार्टी का पुराना जड़ाव रहा है और उसे उम्मीद है कि यह वोट बैंक उसे जीत दिलाने में मदद करेगा। माजबत विधानसभा सीट से प्रीति रेखा बरला और सोनारी से बलदेव तेली जैसे चेहरों को उतारकर झामुमो ने यह साफ कर दिया है कि वह पूरी तैयारी के साथ मैदान में है। हालांकि, उसने विपक्षी एकजुटता का एक छोटा संदेश देते हुए बिहाली की सीट वामदलों (CPIML) के लिए छोड़ दी है।
असम की इस टूट का असर केवल वहीं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसकी तपिश झारखंड की राजनीति में भी महसूस की जाएगी। जानकारों का मानना है कि इस घटनाक्रम से दोनों दलों के बीच तल्खी बढ़ सकती है, जिसका असर आगामी राज्यसभा चुनावों पर पड़ेगा। झारखंड में जल्द ही राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव होने हैं। अभी तक माना जा रहा था कि एक सीट कांग्रेस के खाते में जा सकती है, लेकिन अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि झामुमो दोनों ही सीटों पर अपना दावा ठोक सकती है। लेकिन अंतिम दोनों में भाजपा क्या खेल करती है और झामुमो क्या रुख रहता है इस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। इसलिए राज्यसभा का चुनाव झारखंड की राजनीति में टर्निंग पॉइंट हो सकता है।यह देखना दिलचस्प होगा कि झारखंड की सत्ता में साझेदार ये दो दल इस कड़वाहट को रांची की गलियों तक पहुंचने से कैसे रोकते हैं।
असम में 9 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान होना है। राज्य की 126 सीटों के लिए हो रहे इस चुनाव में फिलहाल बीजेपी का पलड़ा भारी दिख रहा है, जिसने 2021 के चुनाव में 60 सीटें जीती थीं। अब जब विपक्षी एकता में सेंध लग चुकी है, तो आम मतदाता के मन में सवाल है कि क्या झामुमो अपने दम पर वोट काटकर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाएगी या खुद के लिए एक नया आधार खड़ा करेगी। 4 मई को जब चुनावी नतीजे आएंगे, तभी पता चलेगा कि हेमंत सोरेन का यह साहसी फैसला कितना सही साबित हुआ।
अब सवाल उठता है कि असम में झामुमो के चुनाव लड़ने से कांग्रेस के साथ उसके रिश्ते पर क्या असर पड़ेगा? असम में चुनाव लड़ने से किसको फायदा होने वाला है? वोटों के बिखराव का लाभ किसको मिलेगा ? भाजपा, कांग्रेस या खुद झामुमो कोई असर डाल पाएगा। आखिर झामुमो की रणनीति क्या है। किस भूमिका में वहां नजर आएगी। सिर्फ चाय बागान में काम करने वाले झारखंड के आदिवासियों के भरोसे झामुमो को कितना वोट मिलने वाला है। आदिवासी वोटों पर झामुमो की नजर है। चाय बागान में काम करने वाले आदिवासियों को अपनी ओर करने के लिए भाजपा ने कई घोषणाएं की हैं।
आदिवासियों का समर्थन इसके पहले के चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को मिलता रहा है। अब झामुमो ने वहां एंट्री की है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन आदिवासियों के नेता के रूप में दूसरे प्रदेशों में भी स्थापित होना चाहते हैं। जहां-जहां आदिवासी हैं वहां उनकी नजर है। इसी उद्देश्य से उन्होंने असम में चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। हालांकि झामुमो ने फैसले में बहुत देर कर दी है। गठबंधन की आस में नामांकन के अंतिम दिन चुनाव मैदान में जाने का फैसला लिया है।
इधर, एक सवाल यह भी उठ रहा है कि झामुमो के चुनाव लड़ने से भाजपा को फायदा हो सकता है। वोटों का बिखराव होगा और इसका सीधा लाभ बीजेपी को मिलेगा। यदि इसका लाभ भाजपा को मिला तो कांग्रेस के साथ झामुमो के रिश्ते में दरार पड़ सकती है। कांग्रेस का एक खेमा यह मान रहा है कि हेमंत सोरेन अंदर से भाजपा को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से ही असम में चुनाव लड़ रहे हैं, क्योंकि वहां उनका कोई आधार नहीं है। सिर्फ चाय बागान में काम करने वाले आदिवासियों के नाम पर चुनाव लड़ने से कोई लाभ होने वाला नहीं है। झामुमो को कोई सीट मिलने वाली नहीं है। हेमंत सोरेन असम तो चले गए लेकिन पड़ोसी प्रदेश पश्चिम बंगाल जहां आदिवासियों की अच्छी खासी संख्या है वहां चुनाव लड़ने पर चुप क्यों है। इसके पीछे का रहस्य क्या है? असम में ओवैसी की भूमिका क्यों निभाना चाहते हैं।
इसके आलावा चुनाव से पहले झामुमो को एक बड़ी राहत मिली है। पार्टी को असम में भी उसका पारंपरिक तीर-धनुष चुनाव चिह्न आवंटित कर दिया गया है। इसके लिए पार्टी ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी के समक्ष आवेदन दिया था, जिसे मंजूरी मिल गई।
गौरतलब है कि असम में जेएमएम की पूरी चुनावी रणनीति चाय बागानों में काम करने वाली जनजातियों और उनके व्यापक आदिवासी वोट बैंक पर आधारित है। राज्य भर में लगभग 35 से 40 विधानसभा क्षेत्रों में इन मतदाताओं का प्रभाव निर्णायक माना जाता है। पिछले एक साल से पार्टी इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने में सक्रिय रूप से लगी हुई है।जेएमएम के महासचिव विनोद कुमार पांडे लगातार असम में डेरा डाले हुए हैं और जमीनी स्तर पर पार्टी संगठन को संगठित और सक्रिय करने के प्रयास जारी हैं।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन असम का दो बार दौरा कर चुके हैं, जिसमें उन्होंने आदिवासी पहचान और सामाजिक कल्याण से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। असम दौरे के दौरान सोरेन ने कहा था कि असम में रहने वाले आदिवासी समुदाय देश के चाय उद्योग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनके परिश्रम ने ही चाय उद्योग को पहचान दिलाई है। इसलिए, इन समुदायों को उनके अधिकार और सम्मान दिलाना अत्यंत आवश्यक है।
गौरतलब है कि असम में चाय बागानों में काम करने वाले श्रमिकों की अच्छी खासी संख्या है, जिनमें से अधिकांश आदिवासी हैं जो ब्रिटिश काल के दौरान झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र से पलायन कर आए थे। जेएमएम इस समूह को संगठित करने और उनके वोट बैंक का लाभ उठाने का लक्ष्य रख रही है।
टीएमसी से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर की पार्टी के साथ ओवैसी के चुनाव लड़ने पर मनोज पांडे ने कहा, “मुझे लगता है कि ओवैसी ने एक-दो राज्यों में कुछ हद तक सफलता हासिल की है। उन्होंने बीजेपी को मजबूत किया है और धर्मनिरपेक्ष दलों और धर्मनिरपेक्ष ताकतों को कमजोर करने का काम किया है, जिससे उनका मनोबल बढ़ा है। मेरा मानना है कि बंगाल की स्थिति में वे कहीं भी उपयुक्त नहीं होंगे।”





