
डॉ संतोष पटेल
खड़ी बोली भी बोली है हमारे भोजपुरी क्षेत्र में यह भाषा बन गई और भोजपुरी उसकी बोली कैसे ? यह कैसे संभव हुआ जबकि हमारी मातृभाषा भोजपुरी है। “माई की भाखा भोजपुरी है। करीब 20करोड़ लोगों की भाषा है और सोलह देश में मौजूद है लेकिन हमालोगों की माई भाषा किसी अन्य भाषा को बताई जाती है। विद्यालयों में बाजाप्ता पढ़ाई जाती है जबकि सत्य यह है कि हिंदी हमारी मातृभाषा नहीं है, ना ही राष्ट्रीय भाषा है, हां, राजकाज की भाषा जरूर है जिसे हमने संविधान में 14 सितंबर 1949 में अंगीकार किया लेकिन इससे तो हमारी मातृभाषा कैसे बदल गई? यह सत्य है कि माई की बोली- बानी भी सत्ता बदल देती है और पूरी भाषा और संस्कृति पर दूसरी भाषा थोप दी जाती है जिसकी खुद की कोई संस्कृति नहीं है।
अब इसका कारण क्या है जबकि आजादी के वक्त पढ़े लिखे हमारे लोग अधिक थे। संविधान सभा के अध्यक्ष भी प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद थे जो स्वयं भोजपुरी भाषी थे लेकिन मजाल कि किसी भी बड़े हमारे नेता ने हमारी भाषा को अस्मिता बोध से जोड़ा हो या शिक्षा का माध्यम बनाया हो। गजब का राष्ट्रवाद था। अब जब लोग इस सवाल करते हैं तो लोग बिहारियों को कहते हैं कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने हिंदी पर हमला बोला है। इससे साफ है कि हिंदी के साम्राज्यवाद ने भोजपुरी भाषियों को अपनी कॉलोनी बना रखा है।
“Decolonising the Mind: The Politics of Language in African Literature” में नगुगी वा थियोंगो भाषा, संस्कृति और औपनिवेशिक प्रभावों के बारे में गहन विचार प्रस्तुत करते हैं। वे तर्क देते हैं कि औपनिवेशिक शक्तियों ने अफ्रीकी लोगों के मन को नियंत्रित करने के लिए यूरोपीय भाषाओं का उपयोग किया, जिसे वे “आध्यात्मिक अधीनता” (spiritual subjugation) कहते हैं। उनकी प्रमुख बातों में से एक यह है कि अफ्रीकी लेखकों को अपनी मातृभाषा में लिखना चाहिए ताकि वे अपनी संस्कृति और पहचान को पुनर्जन्म दे सकें।
चिनुआ अचेबे (Chinua Achebe), जो एक प्रसिद्ध नाइजीरियाई लेखक और विचारक थे, उन्हेंने अपनी मातृभाषा और भाषा के महत्व के बारे में गहरे विचार व्यक्त किए। अचेबे मुख्य रूप से इग्बो (Igbo) समुदाय से थे, और उनकी मातृभाषा इग्बो थी।उन्होंने लिखा है कि “भाषा केवल संचार का साधन नहीं है, बल्कि यह एक समुदाय की आत्मा और उसकी विश्वदृष्टि को प्रतिबिंबित करती है।”
नोम चॉमस्की ने मातृभाषा के महत्व पर विस्तार से लिखा है। उनके अनुसार, मातृभाषा हमारी पहचान और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह हमें अपने परिवार, समाज और संस्कृति से जोड़ती है और हमारे विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने में मदद करती है।
नोम चॉमस्की का LAD (लैंग्वेज एक्विज़िशन डिवाइस) सिद्धांत:
नोम चॉमस्की ने अपने LAD सिद्धांत में कहा है कि मानव मस्तिष्क में एक विशेष प्रणाली होती है जो हमें भाषा सीखने में मदद करती है। इस प्रणाली को चॉमस्की ने LAD या लैंग्वेज एक्विज़िशन डिवाइस कहा है।
चॉमस्की के अनुसार, LAD एक जन्मजात प्रणाली है जो हमें भाषा के नियमों और संरचनाओं को सीखने में मदद करती है। यह प्रणाली हमें भाषा के विभिन्न पहलुओं, जैसे कि व्याकरण, शब्दावली, और उच्चारण, को सीखने में मदद करती है।
वैसे ही दक्षिण अफ्रीका के भाषाविद नेविल अलेक्जेंडर ने दक्षिण अफ्रीका जैसे बहुभाषी समाज में “भाषा नियोजन” (language planning) पर जोर दिया। वे मानते थे कि मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा बच्चों के लिए नींव रखती है, लेकिन वैश्विक संदर्भ में प्रतिस्पर्धा के लिए बहुभाषिक दक्षता जरूरी है।
आप हमारा दुर्भाग्य देखें कि हमारे भाग्य विधाताओं ने तो भोजपुरी को विद्यालय के चौखट तक नहीं आने दिया। उसे शिक्षा का माध्यम भी नहीं बनाया। जब देश की आज़ादी के पचहत्तर साल से अधिक हो गया तो सरकार ने नई शिक्षा नीति, 2020 में अनेक मातृभाषाओं के महत्व को समझा और विद्यालय में एलिमेंट्री लेवल पर शिक्षा का माध्यम भाषा बनाने की बात की है जबकि पिछले दो शिक्षा नीतियों में पाहवा कमिटी तक बोल चुकी थी कि मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाया जाए फिर भी सरकारें उदासीन ही रही। धीरे धीरे हमारे ऊपर जबरदस्ती का राष्ट्रीय सोच थोपा गया। किसी संस्कृति की हत्या की यह हत्या ही माना जाएगा जिस हत्या को अंजाम कोई और नहीं, बल्कि अपने ही लोग दे रहे थे और अब भी दे रहे हैं।