खेजड़ली का संरक्षण और सोलर ऊर्जा विकास: परंपरा बनाम प्रगति के बीच नई बहस

Khejadli Conservation and Solar Energy Development: A New Debate Between Tradition vs. Progress

राजस्थान के राजवृक्ष खेजड़ी को बचाने की विधानसभा में गुहार

गोपेन्द्र नाथ भट्ट

राजस्थान विधानसभा में राज्य के राजवृक्ष खेजड़ी के संरक्षण का मुद्दा गंभीर और भावनात्मक बहस का विषय बना। सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के विधायकों ने एकजुट स्वर में कहा कि खेजड़ी केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि राजस्थान की पर्यावरणीय आत्मा और चेतना, सांस्कृतिक विरासत एवं पहचान और मरुस्थलीय जीवन प्रणाली की रीढ़ और आधारशिला है। ऐसे में इसके अस्तित्व पर मंडराता खतरा न केवल पर्यावरणीय संकट है, बल्कि ऐतिहासिक और सामाजिक मूल्यों पर भी प्रश्नचिह्न है। विधानसभा में चर्चा के दौरान खेजड़ली की ऐतिहासिक घटना का विशेष उल्लेख हुआ, जहां करीब तीन सौ वर्ष पूर्व 1730 में अमर शहीद अमृता देवी बिश्नोई सहित 363 लोगों ने खेजड़ी के वृक्षों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। विधायकों ने कहा कि यह घटना दुनिया के पहले संगठित पर्यावरण आंदोलनों में से एक मानी जाती है। खेजड़ी के लिए हुआ यह बलिदान आज भी राजस्थान की पहचान और गौरव का प्रतीक है। सदस्यों ने सवाल उठाया कि जिस वृक्ष के लिए इतिहास में इतना बड़ा त्याग हुआ, वही यह वृक्ष आज विकास के नाम पर असुरक्षित क्यों हो गया है। खेजड़ी (बॉटनिकल नाम – प्रोसोपिस सिनेरेरिया) राजस्थान का राज्य वृक्ष है। इसे 1983 में राज्य वृक्ष का दर्जा दिया गया था। यह रेगिस्तानी इलाकों में एक महत्वपूर्ण वृक्ष है, जिसे राजस्थान का गौरव, कल्पवृक्ष और “रेगिस्तान का सुनहरा वृक्ष” भी कहा जाता है।

खेजड़ली संरक्षण और सोलर परियोजनाओं पर राजस्थान विधानसभा में तीखी चर्चा हुई।राज्य विधानसभा में यह चिंता जताई गई कि हाल के वर्षों में सोलर ऊर्जा परियोजनाओं, सड़क निर्माण, औद्योगिक विस्तार और शहरीकरण के चलते खेजड़ी वृक्षों पर दबाव बढ़ा है। कई क्षेत्रों में खेजड़ी की कटाई, जड़ों को नुकसान और प्राकृतिक आवास के विखंडन की शिकायतें सामने आई हैं। विधायकों ने कहा कि मरुस्थलीय पारिस्थितिकी में खेजड़ी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह न केवल मिट्टी को उपजाऊ बनाती है, बल्कि पशुपालन, जल संरक्षण और स्थानीय जैव विविधता को भी सहारा देती है।

सदन में विपक्षी सदस्यों ने सरकार से मांग की कि खेजड़ी को विशेष संरक्षित वृक्ष का दर्जा दिया जाए और इसकी कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। उन्होंने कहा कि विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय खेजड़ी बहुल क्षेत्रों को बाहर रखा जाना चाहिए। साथ ही खेजड़ली और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों को इको-सेंसिटिव ज़ोन घोषित करने की मांग भी उठी। विपक्ष ने यह भी कहा कि बिना स्थानीय समुदाय, विशेषकर बिश्नोई समाज, की सहमति के कोई परियोजना आगे नहीं बढ़नी चाहिए।

राज्य सरकार की ओर से जवाब देते हुए वन मंत्री ने सदन को आश्वस्त किया कि राजवृक्ष खेजड़ी के संरक्षण को लेकर राज्य सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि किसी भी विकास परियोजना में पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी नहीं की जाएगी और खेजड़ी वृक्षों की बिना अनुमति कटाई पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। मंत्री ने यह भी बताया कि सरकार खेजड़ी संरक्षण के लिए विशेष दिशा-निर्देश और निगरानी तंत्र को मजबूत करने पर विचार कर रही है। विधानसभा में यह मत भी उभरा कि सवाल “विकास बनाम पर्यावरण” का नहीं, बल्कि संतुलित और संवेदनशील विकास का है। कई विधायकों ने सुझाव दिया कि सोलर ऊर्जा जैसी परियोजनाओं को बंजर और गैर-सांस्कृतिक भूमि पर प्राथमिकता दी जाए। इसके साथ ही रूफटॉप सोलर और विकेंद्रीकृत ऊर्जा मॉडल अपनाकर हरित ऊर्जा लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं, बिना खेजड़ी जैसे महत्वपूर्ण वृक्षों को नुकसान पहुंचाए। सदन में यह मांग भी रखी गई कि खेजड़ी संरक्षण के लिए अलग से राज्य स्तरीय नीति बनाई जाए, जिसमें इसके संरक्षण, पुनरोपण, अनुसंधान और जनभागीदारी को शामिल किया जाए। विधायकों ने कहा कि खेजड़ी को बचाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की साझा जिम्मेदारी है, और इसके लिए जागरूकता अभियान भी जरूरी हैं।

चर्चा के दौरान कई सदस्यों ने कहा कि खेजड़ी राजस्थान की लोकसंस्कृति, लोकगीतों और परंपराओं में रची-बसी है। यह वृक्ष सूखे और कठिन परिस्थितियों में भी जीवन का संदेश देता है। ऐसे में इसका संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरणीय धरोहर को सुरक्षित रखने जैसा है।राजस्थान विधानसभा में उठी यह गुहार इस बात का स्पष्ट संकेत है कि राजवृक्ष खेजड़ी का मुद्दा केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि राज्य की पहचान, इतिहास और भविष्य से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। यदि समय रहते ठोस और संवेदनशील निर्णय नहीं लिए गए, तो विकास की दौड़ में एक अमूल्य धरोहर को खोने का खतरा है। खेजड़ी को बचाने की यह आवाज अब केवल सदन तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान की सामूहिक चेतना की पुकार बनती जा रही है।

इस तरह राजस्थान के जोधपुर जिले का खेजड़ली गांव एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। यह गांव आज आधुनिक विकास, विशेषकर सोलर ऊर्जा परियोजनाओं, और पर्यावरण–संस्कृति संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती का प्रतीक बन गया है। एक ओर राज्य और देश को हरित ऊर्जा की ओर ले जाने की प्रतिबद्धता है, तो दूसरी ओर खेजड़ली की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक पहचान को बचाए रखने की मांग तेज़ हो रही है।खेजड़ली का नाम आते ही बिश्नोई बलिदानियों की स्मृति उभरती है, जिन्होंने खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। यही घटना भारत ही नहीं, दुनिया के पहले संगठित पर्यावरण आंदोलनों में गिनी जाती है। बिश्नोई समाज के लिए खेजड़ी केवल पेड़ नहीं, बल्कि जीवन, आस्था और पर्यावरण संतुलन का आधार है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी विकास परियोजना को लेकर संवेदनशीलता स्वाभाविक है।

राजस्थान देश में सौर ऊर्जा उत्पादन में अग्रणी राज्यों में शामिल है। विश्व का सबसे बड़ा सोलर हब बनने को तैयार है। राज्य सरकार का लक्ष्य है कि विशाल मरुस्थलीय क्षेत्र का उपयोग कर नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को कई गुना बढ़ाया जाए। खेजड़ली और आसपास के इलाकों को भी सोलर पार्क और ट्रांसमिशन लाइन जैसी परियोजनाओं के लिए उपयुक्त माना जा रहा है।सरकारी स्तर पर तर्क दिया जा रहा है कि सौर ऊर्जा न केवल कार्बन उत्सर्जन कम करेगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार और निवेश भी लाएगी। कुछ परियोजनाओं में भूमि अधिग्रहण और आधारभूत ढांचे का काम प्रारंभिक चरण में है, जबकि कुछ पर सामाजिक और पर्यावरणीय आपत्तियों के कारण पुनर्विचार किया जा रहा है।स्थानीय ग्रामीणों, बिश्नोई समाज और पर्यावरण संगठनों का कहना है कि सोलर परियोजनाओं के नाम पर खेजड़ी के पेड़ों की कटाई, जैव विविधता को नुकसान और ऐतिहासिक स्थल की गरिमा से समझौता किया जा रहा है। उनका तर्क है कि खेजड़ली केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि राष्ट्रीय धरोहर है, जहां किसी भी प्रकार की औद्योगिक गतिविधि से पहले विशेष संरक्षण नीति होनी चाहिए।

कई संगठनों ने मांग की है कि खेजड़ली क्षेत्र को इको-सेंसिटिव ज़ोन घोषित किया जाए और सोलर परियोजनाओं को वैकल्पिक, कम संवेदनशील क्षेत्रों में स्थानांतरित किया जाए। राज्य सरकार यह भी स्पष्ट कर चुकी है कि खेजड़ली के ऐतिहासिक स्मारक और बलिदान स्थल की मर्यादा और संरक्षण से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। हालांकि, ज़मीनी स्तर पर संवाद की कमी और अविश्वास की स्थिति अब भी बनी हुई है।विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहस “पर्यावरण बनाम विकास” की नहीं, बल्कि संतुलित और संवेदनशील विकास की है। सोलर ऊर्जा समय की आवश्यकता है, लेकिन ऐसे प्रतीकात्मक और संवेदनशील क्षेत्रों में परियोजनाओं की योजना बनाते समय अतिरिक्त सावधानी जरूरी है। वैकल्पिक मॉडल के रूप में डिसेंट्रलाइज्ड सोलर सिस्टम, रूफटॉप सोलर और बंजर, गैर-सांस्कृतिक भूमि के उपयोग पर ज़ोर दिया जा सकता है। इससे ऊर्जा उत्पादन भी होगा और विरासत संरक्षण भी।

खेजड़ली का सवाल केवल एक गांव या एक परियोजना तक सीमित नहीं है। यह सवाल है कि भारत अपने पर्यावरणीय मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखते हुए आधुनिक विकास को कैसे आगे बढ़ाता है। यदि सरकार, स्थानीय समाज और विशेषज्ञ मिलकर पारदर्शी संवाद और संवेदनशील नीति अपनाते हैं, तो खेजड़ली मॉडल पूरे देश के लिए मिसाल बन सकता हैजहां हरित ऊर्जा और हरित विरासत साथ-साथ आगे बढ़ें। खेजड़ली का संरक्षण और सोलर ऊर्जा विकास दोनों ही आवश्यक हैं। चुनौती यह है कि बलिदान की भूमि पर विकास का रास्ता ऐसा हो, जो इतिहास को मिटाए नहीं, बल्कि उससे प्रेरणा लेकर भविष्य को रोशन करे। यही खेजड़ली की आत्मा है और यही टिकाऊ विकास की सच्ची भावना भी होनी चाहिए।

विधानसभा में उठी यह गुहार स्पष्ट संकेत है कि खेजड़ी का मुद्दा केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि राजस्थान की पहचान और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा प्रश्न बन चुका है।