डॉ विजय गर्ग
पतंग उड़ाना एक ऐसी परंपरा है जो सदियों से जीवंत है और मकर संक्रांति के साथ जुड़ी हुई है। यह न केवल एक उत्सव का हिस्सा है, बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। पतंग उड़ाने से हमें सूर्य की ऊर्जा मिलती है, शरीर में सक्रियता आती है और जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा मिलती है।
कई बार हम संशय में होते हैं कि हमारी पुरानी प्रथाएं और मनोरंजन के साधन वक्त के साथ उड़ रहे हैं, मगर कुछ ऐसे भी साधन हैं जो मनोरंजन के आकाश में आज भी उड़ते दिखाई देते हैं। ऐसा ही एक पर्व है मकर संक्रांति, जिससे कई किंवदंतियां जोड़ी हैं। हर साल 14 जनवरी को मनाया जाने वाला यह त्योहार सूर्य के उत्तरायण होने का प्रतीक होता है। हिंदुओं के लिए सूर्य एक रोशनी, ताकत और ज्ञान का प्रतीक है। मकर संक्रांति के अर्थ में मकर शब्द राशि के नाम से ताल्लुक रखता है, वही संक्रांति का अर्थ है संक्रमण। यानी इस दिन सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है।
शारीरिक और मानसिक लाभ
पतंग उड़ाने की परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। मकर संक्रांति के पर्व के आसपास पतंगे उड़ना शुरू हो जाती हैं। हालांकि, ज्यादातर सर्दी के मौसम में लोग घरों में ऊनी कपड़ों में दुबके रहते हैं, लेकिन वैज्ञानिक तथ्यों के अनुसार उत्तरायण में सूर्य की गर्मी ठंड के प्रकोप से होने वाली सर्दी, खांसी, फ्लू जैसे रोगों को समाप्त कर देती है। सूर्य की रोगनाशक शक्ति के बारे में अथर्ववेद में कहा गया है कि सूर्य औषधि बनाता है तथा अपनी रश्मियों द्वारा सभी जीवों का स्वास्थ्य उत्तम रखता है। हमारे वेदों में सूर्य की पूजा को बहुत महत्व दिया गया है। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने सूर्य की शक्ति प्राप्त करके प्राकृतिक जीवन व्यतीत करने का संदेश मानव जाति को दिया था।
हाल में एक रिसर्च में यह तथ्य सामने आया कि भारत में करीब 80 फीसदी लोगों में विटामिन डी की कमी है। अकेले दिल्ली में 90 से 97 फीसदी स्कूली बच्चों (6 से 17 वर्ष की आयु) में विटामिन डी की कमी पाई गई है, जबकि भारत दुनिया में उन देशों में शामिल है जहां सूर्य की पर्याप्त रोशनी आती है। ऐसे में मकर संक्रांति जैसे पर्व संदेश और सीख देते हैं कि इस बहाने बच्चों और बड़ों को भी पतंग उड़ाने के बहाने पर्याप्त धूप मिल जाती है। पतंग उड़ाते समय हमारा मुंह ऊपर की ओर खुलता है, जैसे ही हम डोर खींचते हैं, तो ऑक्सीजन तेजी से हमारी सांसों में पहुंचती है। ऑक्सीजन लेवल पर्याप्त होने के साथ हमारे हाथ, कंधे, कमर, आंखें—सभी की अच्छी-खासी कसरत हो जाती है। छत पर सभी का साथ होना सकारात्मकता बढ़ाता है। कुछ वैज्ञानिक और डॉक्टरों का यह भी कहना है कि पतंग उड़ाने से शरीर स्वस्थ रहता है, साथ ही मस्तिष्क भी तनाव मुक्त रहता है। त्वरित निर्णय लेने की आदत में इजाफा होता है। साथ ही धूप से सर्दियों में होने वाली त्वचा संबंधी समस्याओं से भी शरीर मुक्त रहता है।
पतंग की कहानी
पतंग उड़ाने की प्रथा कब और कैसे शुरू हुई, इसके बारे में काफी मान्यताएं हैं। कहते हैं कि करीब 2800 साल पहले चीन के शानडोंग में पतंग उड़ाने का चलन शुरू हुआ था, जिसे पतंगधर के नाम से भी जाना जाता है। एक किंवदंती के अनुसार, पतंग उड़ाने की प्रेरणा एक चीनी किसान से मिली, जिसने अपनी टोपी को हवा में उड़ने से बचाने के लिए एक रस्सी से बांधी थी। ऐसा भी कहा जाता है कि सबसे पहली पतंग बांस और कागज से बनी थी। फिर देखते-देखते यह चलन पूरी दुनिया में फैल गया। तमिल की तंदनान रामायण के मुताबिक, मकर संक्रांति के दिन श्रीराम ने पतंग उड़ाई थी और वह पतंग इंद्रलोक में चली गई थी।
प्राचीन इतिहास में पतंग को लेकर एक कथा यह भी है कि पतंग का आविष्कार मध्यकालीन विद्वान हकीम लुकमान ने किया था। उन्होंने तो पतंग उड़ाने का समय सुबह-सुबह निर्धारित किया था, क्योंकि उनका मानना था कि सुबह की ताजगी और धूप में शरीर निरोगी रहता है। लेकिन हां, 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में पतंग उड़ाने का उद्देश्य मनोरंजन से जोड़ दिया गया। पतंगबाजी को पहले के समय में गुड़ी या चंग के नाम से भी जाना जाता था। नवाबों के पतंगबाजी के किस्से तब खूब मशहूर हुए थे। नवाब आसफुद्दौला के शासनकाल में छतों पर बने शीशमहल में पतंग उड़ाने के सारे इंतजाम होते थे।
सन् 1800 के आसपास नवाब सआदत अली खान के समय में पतंगों से पेच लड़ाने का सिलसिला शुरू हुआ। कहते हैं उस वक्त अपनी पतंग से नॉन पेच काटने वालों को नोशेखा की उपाधि से विभूषित किया जाता था। इसी तरह बादशाह अमजद अली शाह के दरबार में पतंग के ठुड्ढे और धनुष बनाए जाने लगे। एक रोचक किस्सा यह भी मशहूर हुआ था कि नवाबों की पतंगे आम पतंगों की तरह नहीं हुआ करती थीं, इन पतंगों को चटखदार रंगों और दुल्हन की तरह सजाया जाता था, जिनमें सोने-चांदी के तार और सितारों का उपयोग होता था। मजेदार बात यह थी कि ये पतंगें जब कटकर जिस छत पर गिरती थीं, उस दिन उस घर में पुलाव बनता था।
पर्व एक तरीके अनेक
समय के साथ पतंग उड़ाना कई देशों में उत्साह का प्रतीक बन गया। गुजरात का पतंगोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। 7 जनवरी से 15 जनवरी तक इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल का आयोजन होता है, जहां जापान, मलेशिया, चीन और सिंगापुर से कई विदेशी इस पतंगबाजी का लुत्फ उठाने आते हैं। तेलंगाना का भी पतंग महोत्सव मशहूर है, जहां कई देशों के लोग हिस्सा लेते हैं। इस महोत्सव की खास बात यह भी है कि इस महोत्सव में स्वीट फेस्टिवल भी आयोजित होता है, जिसमें तकरीबन एक हजार तरह की मिठाइयों का लुत्फ उठाया जा सकता है। जयपुर के इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल में भी कई विदेशी पतंगबाजी का हुनर दिखाने आते हैं।
उत्सव की वैश्विक धूम
पतंग उड़ाने के दीवाने भारत में ही नहीं, विदेशों में भी कम नहीं हैं। चीन के वेई फांग शहर में अप्रैल में काइट फेस्टिवल बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। लोग ऊंची-ऊंची पतंगों को देखने के लिए वहां आते हैं, क्योंकि वहां एक मान्यता है कि ऊंची उड़ती पतंगों को देखने से उनकी आंखें हमेशा अच्छी रहती हैं। ब्रिटेन में अगस्त के दूसरे सप्ताह काइट फेस्टिवल मनाया जाता है, जहां 3डी पतंगों का क्रेज ज्यादा होता है। ऑस्ट्रेलिया में सितंबर में सबसे बड़ा पतंगोत्सव मनाया जाता है। ग्वाटेमाला में पतंग उत्सव वहां की 15 से 20 मीटर चौड़ी ऊंची पतंगों के कारण मशहूर है। इंडोनेशिया में अक्टूबर के तीसरे हफ्ते में मनाया जाने वाला काइट फेस्टिवल लंबी चौड़ी पतंगों के अलावा 100 मीटर लंबी पूछ के कारण बच्चों में बहुत प्रिय है। दक्षिण अफ्रीका और इटली में भी काइट फेस्टिवल मनाया जाता है। अमेरिका में द जिलकर काइट फेस्टिवल मार्च में मनाया जाता है।
अलबेले किस्से
शुरुआत में पतंग संदेशों के आदान-प्रदान के लिए उड़ाई जाती थी। जापान में एक पतंगबाज के एक ही लाइन में सबसे ज्यादा 11,284 पतंगों के उड़ाने का रिकॉर्ड है। ऐसा भी कहते हैं कि हर वीकेंड दुनिया में कहीं न कहीं काइट फेस्टिवल होता है। 180 घंटे सतत ऊंचाई पर पतंग उड़ाने का रिकॉर्ड है। कागज की खोज के 1000 वर्ष पूर्व ही पतंगें बनाई जा चुकी थीं, जो बांस के बने कपड़ों से बनी थीं। सबसे बड़ी पतंग 630 वर्ग मीटर और लंबी पतंग 1034 मीटर की बनाई गई थी। ऐसा भी एक वाक्या हुआ था जब 1760 में जापान में पतंगबाजी पर रोक लगाई गई थी क्योंकि लोग काम करने की बजाय ज्यादा पतंग उड़ाते थे।
एसोचेम के मुताबिक, भारत में 1200 करोड़ रुपये का पतंग बाजार है। देशभर में 70 हजार से ज्यादा कारीगर पतंग बाजार से जुड़े हुए हैं। लेकिन 2020 में मंदी का माहौल था। एक बड़े आकार की चरखी में लगभग 900 मीटर मांझा होता है।
कविताओं में पतंग
एक समय था जब मनोरंजन के साधनों में पतंग उड़ाने का शौक एक जुनून की तरह था। लेकिन समय का अभाव और घरों में फ्लैट संस्कृति के चलते खुले स्थानों की कमी जैसे कारणों से पतंगबाजी कुछ कम हो गई है। हालांकि, भारत की पतंगबाजी की लोकप्रियता के ऐसे मशहूर किस्से हुए कि कई कवियों ने इस साधारण सी हवा में उड़ने वाली पतंगों को अपने गीतों और कविताओं में स्थान दिया।
जीवन जीने की कला
एक डोर के सहारे उड़ने वाला यह छोटा-सा मनोरंजन का साधन हमें जीवन जीने की प्रेरणा भी देता है। एक डोर पर भरोसा करके आसमान छूने की प्रेरणा पतंग से सीखी जा सकती है। पतंगबाज पतंग के नीचे आ जाने पर हवा का रुख पहचानकर फिर उड़ाता है। जैसे ही सफलता मिलती है, वह बेखौफ उड़ने लगता है। यानी एक-दो बार नाकामियों के मिलने पर भी पतंगबाज के उत्साह में कोई कमी नहीं आती। पतंग अपने सही बंधे जोतों के कारण हवा में संतुलन बना पाती है, ठीक वैसे ही मनुष्यों को अपने रिश्तों में संतुलन बनाने की प्रेरणा देती है। आसमान में उड़ रही दूसरी पतंगों से चुनौतियों का सामना करते हुए पतंग अपने अस्तित्व के लिए दिमागी लड़ाई लड़ती है। वह दूसरी पतंग को काटकर फिर से ऊंचा उड़ती है, और ऊंचा उड़ने के बाद ढेर सारी खुशियां पतंगबाज को देती है। यानी यह छोटी सी पतंग मनुष्यों को कितना कुछ सिखाती है।
कुछ बातें
पतंग उड़ाने का स्थान चुनते समय छतों की मुंडेरों का खास ध्यान रखना बेहद जरूरी है। चीन की डोर कभी इस्तेमाल न करें, क्योंकि डोर को पक्का करने के लिए कांच का प्रयोग जानलेवा हो सकता है। पतंग उड़ाने से पहले अगर कोई स्किन समस्या हो तो सनस्क्रीन और गॉगल्स का प्रयोग कर सकते हैं।





