विश्व मौसम विज्ञान संगठन की ताज़ा रिपोर्ट-2026: तपती धरती और बढ़ता संकट: क्या हम चेतेंगे ?

Latest World Meteorological Organization Report 2026: Warming Earth and Growing Crisis: Will We Wake Up?

सुनील कुमार महला

लगातार अंधाधुंध दोहन और प्रकृति के प्रति लापरवाही के कारण आज हमारी धरती(नीला ग्रह) एक गंभीर व बड़े संकट का सामना कर रही है। कहना ग़लत नहीं होगा कि जलवायु परिवर्तन अब कोई भविष्य की बात नहीं रही है, बल्कि यह आज की सच्चाई बन चुका है। वास्तव में,इसका मुख्य व प्रमुख कारण ग्लोबल वार्मिंग है, जो कोयला, पेट्रोल, डीजल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के अधिक उपयोग, बढ़ते उद्योगों और प्लास्टिक प्रदूषण से हो रहा है। हमने विकास के नाम पर जंगल काट दिए, पहाड़ों को खोखला कर दिया और नदियों को प्रदूषित कर दिया। तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण और कंक्रीट के फैलाव ने हमारे पर्यावरण व धरती का संतुलन बहुत बिगाड़ दिया है, जिससे मौसम का चक्र भी गड़बड़ा गया है। अब कहीं समय से पहले बारिश होती है, कहीं भयंकर बाढ़(अतिवृष्टि) आती है और कहीं सूखा(अनावृष्टि)पड़ता है। कंक्रीट के कारण जमीन पानी सोख नहीं पाती, जिससे भूजल स्तर लगातार गिर रहा है।

आज धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है और हाल के साल सबसे ज्यादा गर्म दर्ज किए गए हैं, जो बहुत चिंता की बात है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011 से 2025 तक का समय अब तक का सबसे गर्म दौर रहा है और 2025 का तापमान औद्योगिक युग (1850–1900) से लगभग 1.43 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर 2026–27 में एल-नीनो फिर सक्रिय हुआ, तो तापमान और तेजी से बढ़ सकता है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि एल-नीनो एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इससे दुनिया भर का मौसम बिगड़ जाता है।भारत में मानसून कमजोर पड़ सकता है और सूखा पड़ सकता है, जबकि दक्षिण अमेरिका में भारी बारिश और बाढ़ आ सकती है और ऑस्ट्रेलिया व इंडोनेशिया में सूखा बढ़ सकता है। समुद्र के गर्म होने से समुद्री जीवों पर असर पड़ता है और मछलियों की संख्या कम हो जाती है, जिससे मछुआरों की आजीविका प्रभावित होती है।

धरती के गर्म होने का कारण यह है कि सूर्य से आने वाली ऊर्जा और अंतरिक्ष में लौटने वाली गर्मी के बीच संतुलन बिगड़ गया है। कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें गर्मी को वायुमंडल में रोक लेती हैं। क्या यह चिंताजनक बात नहीं है कि आज कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर 423 पीपीएम तक पहुंच गया है, जो करीब 20 लाख साल में सबसे ज्यादा है, और मीथेन का स्तर औद्योगिक समय से पहले की तुलना में 266 प्रतिशत बढ़ चुका है। फैक्ट्रियों, बिजलीघरों और वाहनों से निकलने वाला धुआँ इन गैसों को बढ़ा रहा है। कोयला, पेट्रोल और डीजल जलाने से भी प्रदूषण बढ़ता है। पेड़ों की कटाई, धान की खेती और पशुओं से निकलने वाली मीथेन गैस भी तापमान बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती है। शहरों में कंक्रीट और लोहे की इमारतें ज्यादा गर्मी सोखती हैं, जिससे ‘हीट आइलैंड प्रभाव’ पैदा होता है और शहर ज्यादा गर्म हो जाते हैं।

इस बढ़ती गर्मी(ग्लोबल वार्मिंग) के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर बढ़ रहा है और मौसम अनियमित हो गया है। लू (हीटवेव) की घटनाएं बढ़ रही हैं और कई शहरों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। रिपोर्ट के अनुसार, धरती की अतिरिक्त ऊर्जा का लगभग 91 प्रतिशत हिस्सा महासागर सोख रहे हैं और पिछले साल यानी कि वर्ष 2025 में समुद्र का तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। 1993 के मुकाबले समुद्र का जलस्तर लगभग 4.3 इंच (11 सेंटीमीटर) बढ़ चुका है। हिमालय के ग्लेशियर पिघलने से गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के स्रोत प्रभावित हो रहे हैं और मुंबई व कोलकाता जैसे तटीय शहरों पर डूबने का खतरा बढ़ रहा है। 2015 से 2025 तक के 11 साल सबसे गर्म साल रहे हैं और ग्रीनहाउस गैसें पिछले 8 लाख सालों में सबसे ज्यादा स्तर पर पहुंच चुकी हैं। महासागर तेजी से गर्म हो रहे हैं, समुद्री बर्फ घट रही है और ग्लेशियर पहले से ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं।

सच तो यह है कि धरती का तापमान बढ़ना कहीं न कहीं मुख्य रूप से मानव गतिविधियों का ही परिणाम है। अगर हमने समय रहते कदम नहीं उठाए, तो भविष्य में जीवन बहुत कठिन हो जाएगा। इसलिए जरूरी है कि हम धरती पर उपलब्ध सभी संसाधनों का समझदारी से विवेकपूर्ण व सीमित उपयोग करें, पेड़ों को बचाएं, प्रदूषण कम करें और अपनी जीवनशैली को बदलें। हमें ‘सतत विकास’(सस्टेनेबल डेवलपमेंट) को अपनाना होगा और प्रकृति के साथ मिलकर चलना होगा। यह धरती हमें विरासत में नहीं मिली है, बल्कि यह हमारे बच्चों से लिया गया एक उधार है, जिसे हमें सुरक्षित लौटाना है।