शिव-शक्ति से सीखें परवरिश का पाठ, ‘परफेक्ट पेरेंटिंग’ के लिए अपनाएं ये 4 नियम

Learn parenting lessons from Shiva-Shakti, follow these 4 rules for 'perfect parenting'

अजय कुमार बियानी

महाशिवरात्रि केवल उपवास, पूजा और रात्रि-जागरण का पर्व नहीं है; यह आत्ममंथन और जीवन-मूल्यों को समझने का भी अवसर है। जब हम आदर्श दांपत्य और संतुलित परिवार की बात करते हैं, तो अनायास ही भगवान शिव और माता पार्वती का स्मरण होता है। कैलाश पर विराजमान यह दिव्य दंपति केवल आध्यात्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि पारिवारिक जीवन के उत्कृष्ट आदर्श भी हैं। उनके परिवार में विविध स्वभाव, अलग-अलग दृष्टिकोण और विशिष्ट व्यक्तित्व हैं, फिर भी सामंजस्य और संतुलन बना रहता है। यही संतुलन आज की “परफेक्ट पेरेंटिंग” के लिए सबसे बड़ा पाठ है।

आधुनिक समय में माता-पिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है—प्रतिस्पर्धा, तकनीक और बदलते सामाजिक मूल्यों के बीच बच्चों का संतुलित विकास। ऐसे में शिव-शक्ति का जीवन हमें चार महत्वपूर्ण नियम सिखाता है, जिन्हें अपनाकर हम बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की नींव रख सकते हैं।

पहला नियम है—स्वीकार्यता और सम्मान। भगवान शिव तपस्वी, सरल और विरक्त स्वभाव के हैं, वहीं माता पार्वती सौम्यता, स्नेह और गृहस्थ जीवन की ऊर्जा का प्रतीक हैं। दोनों के स्वभाव अलग हैं, पर परस्पर सम्मान अटूट है। यह हमें सिखाता है कि माता-पिता के बीच पारस्परिक सम्मान ही बच्चे के व्यक्तित्व का पहला विद्यालय होता है। जब बच्चा घर में संवाद, सम्मान और धैर्य देखता है, तो वही संस्कार उसके भीतर स्थायी रूप से बस जाते हैं। माता-पिता यदि एक-दूसरे को नीचा दिखाते हैं, तो बच्चे का आत्मविश्वास भी प्रभावित होता है। इसलिए परिवार में मतभेद हो सकते हैं, पर मनभेद नहीं होने चाहिए।

दूसरा नियम है—व्यक्तित्व की स्वतंत्रता। शिव परिवार के दोनों पुत्रों का स्वभाव भिन्न है। एक ओर गणेश बुद्धि, विवेक और शांति के प्रतीक हैं, तो दूसरी ओर कार्तिकेय साहस, गति और नेतृत्व के। माता-पिता ने दोनों को उनके स्वभाव के अनुरूप विकसित होने दिया। आज के अभिभावकों के लिए यह सबसे बड़ा संदेश है कि हर बच्चा अलग है। तुलना करना, दूसरों के बच्चों से प्रतिस्पर्धा कराना या अपनी अधूरी इच्छाओं का बोझ उन पर डालना उचित नहीं। बच्चे की रुचि और क्षमता को पहचानकर उसे उसी दिशा में आगे बढ़ने देना ही सच्ची परवरिश है।

तीसरा नियम है—अनुशासन और करुणा का संतुलन। शिव का स्वरूप हमें अनुशासन, संयम और आत्मनियंत्रण की शिक्षा देता है, जबकि पार्वती का मातृत्व करुणा और स्नेह का प्रतीक है। परवरिश में केवल कठोरता या केवल लाड़-प्यार, दोनों ही संतुलित विकास के लिए पर्याप्त नहीं। जहां आवश्यकता हो, वहां स्पष्ट सीमाएं तय करनी चाहिए, पर साथ ही बच्चे को यह विश्वास भी होना चाहिए कि गलती होने पर उसे मार्गदर्शन मिलेगा, तिरस्कार नहीं। अनुशासन भय से नहीं, विश्वास से उपजना चाहिए।

चौथा नियम है—मूल्यों की जड़ें और आधुनिकता की शाखाएं। शिव परिवार में आध्यात्मिकता है, पर साथ ही जीवन के व्यावहारिक पक्ष भी हैं। यह हमें सिखाता है कि बच्चों को केवल परंपराओं से बांधना या केवल आधुनिकता में ढकेल देना, दोनों ही अतिशय हैं। उन्हें अपनी संस्कृति, नैतिक मूल्यों और परिवार की विरासत से परिचित कराना आवश्यक है, पर साथ ही नई सोच, विज्ञान और तकनीक के प्रति भी खुलापन रखना चाहिए। जड़ों से जुड़े रहकर ही शाखाएं आकाश छू सकती हैं।

आज “परफेक्ट पेरेंटिंग” की परिभाषा अक्सर महंगे स्कूल, अतिरिक्त कक्षाएं और तकनीकी सुविधाओं तक सीमित हो गई है।

पर सच्ची परवरिश केवल संसाधनों से नहीं, वातावरण से बनती है। बच्चा वही सीखता है, जो वह रोज देखता और अनुभव करता है। यदि घर में संवाद है, समय है और साझा क्षण हैं, तो वही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है।

महाशिवरात्रि का पर्व हमें यह भी याद दिलाता है कि शिव और शक्ति का संबंध पूरकता का है, प्रतिस्पर्धा का नहीं। आज के परिवारों में पति-पत्नी यदि एक-दूसरे के सहयोगी बनें, तो बच्चों को स्थिर और सुरक्षित वातावरण मिलता है। संयुक्त निर्णय, साझा जिम्मेदारियां और एक-दूसरे के प्रयासों की सराहना—ये छोटे कदम बच्चों के मन में गहरी सुरक्षा का भाव पैदा करते हैं।

एक और महत्वपूर्ण पहलू है—आध्यात्मिक आधार। इसका अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और नैतिकता है। यदि बच्चे को सत्य, करुणा और जिम्मेदारी जैसे मूल्यों का अभ्यास घर से मिलता है, तो वह जीवन की चुनौतियों का सामना अधिक दृढ़ता से कर पाता है। माता-पिता स्वयं यदि इन मूल्यों का पालन करें, तो बच्चे बिना उपदेश के ही सीख जाते हैं।

शिव-शक्ति का परिवार हमें यह भी सिखाता है कि कठिनाइयां जीवन का हिस्सा हैं। संघर्षों के बीच धैर्य बनाए रखना और समाधान खोजते रहना ही परिपक्वता है। बच्चों को हर समस्या से बचाकर रखना संभव नहीं, पर उन्हें समस्याओं का सामना करना सिखाना संभव है। यही वास्तविक सशक्तिकरण है।

अंततः, “परफेक्ट पेरेंटिंग” कोई तैयार सूत्र नहीं, बल्कि निरंतर सीखने की प्रक्रिया है। शिव-शक्ति का आदर्श हमें यह बताता है कि प्रेम, सम्मान, संतुलन और मूल्यों का समन्वय ही स्वस्थ परिवार की आधारशिला है। महाशिवरात्रि के इस पावन अवसर पर यदि हम इन चार नियमों—स्वीकार्यता, स्वतंत्रता, संतुलित अनुशासन और मूल्यों की जड़ें—को अपने जीवन में उतार लें, तो न केवल हमारे बच्चे उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ेंगे, बल्कि हमारा परिवार भी सच्चे अर्थों में सुख, शांति और समृद्धि का केंद्र बन जाएगा।

जब घर में शिव का संयम और शक्ति का स्नेह साथ-साथ हो, तब परवरिश केवल जिम्मेदारी नहीं, एक पवित्र साधना बन जाती है। यही साधना आने वाली पीढ़ी को संस्कार, आत्मविश्वास और संवेदनशीलता का उपहार देती है। यही महाशिवरात्रि का सच्चा संदेश है, और यही आदर्श पेरेंटिंग की दिशा।