स्क्रीन के उस पार गिरती ज़िंदगियाँ

Lives falling across the screen

प्रफुल्ल पलसुलेदेसाई

गाज़ियाबाद की हालिया घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या भारत का डिजिटल विस्तार, विशेषकर ऑनलाइन गेमिंग का तेज़ी से बढ़ता प्रभाव, पर्याप्त सामाजिक और नीतिगत निगरानी के साथ आगे बढ़ रहा है। तीन नाबालिग बहनों की मृत्यु और उसी समय हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में एक किशोर की आत्महत्या को केवल व्यक्तिगत त्रासदियों के रूप में देखना वास्तविकता से मुँह मोड़ना होगा। ये घटनाएँ उस संरचनात्मक चूक की ओर इशारा करती हैं, जिसमें तकनीक तो तेज़ी से आगे बढ़ गई, लेकिन उसके दुष्प्रभावों से निपटने की तैयारी पीछे छूट गई।

गाज़ियाबाद में नौवीं मंज़िल से कूदकर जान देने वाली तीनों बहनें बारह, चौदह और सोलह वर्ष की थीं। यह उम्र वह होती है, जहाँ भावनात्मक अस्थिरता, पहचान की तलाश और बाहरी प्रभावों के प्रति आकर्षण सबसे अधिक होता है। प्रारंभिक सूचनाओं के अनुसार, वे एक ऑनलाइन कोरियन गेम में अत्यधिक संलग्न थीं और उसी आभासी दुनिया को भविष्य के रूप में देखने लगी थीं। यह तथ्य अपने आप में कोई अपराध नहीं है, लेकिन यह अवश्य दर्शाता है कि किशोर मन किस तरह डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से प्रभावित हो रहा है—और किस हद तक।

लगभग उसी समय कुल्लू में पंद्रह वर्षीय छात्र द्वारा आत्महत्या की खबर सामने आई। बताया गया कि वह अपने एक विदेशी ऑनलाइन मित्र से बिछड़ने के बाद अवसाद में था। यह घटना यह स्पष्ट करती है कि आभासी रिश्ते अब केवल मनोरंजन या समय बिताने का साधन नहीं रहे, बल्कि कई मामलों में वे भावनात्मक सहारे का स्थान लेने लगे हैं। जब यह सहारा अचानक टूटता है, तो परिणाम घातक हो सकते हैं।

इन घटनाओं को जोड़कर देखने पर यह साफ़ होता है कि समस्या केवल ‘गेमिंग की लत’ तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक सामाजिक और नीतिगत चुनौती है। झाबुआ, भोपाल, इंदौर और देश के अन्य हिस्सों से समय-समय पर सामने आई घटनाएँ बताती हैं कि डिजिटल दुनिया, विशेषकर बिना नियंत्रण के उपयोग की स्थिति में, किशोरों को सामाजिक अलगाव, भावनात्मक असुरक्षा और जोखिमपूर्ण व्यवहार की ओर धकेल सकती है।

यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि ऑनलाइन गेमिंग या तकनीक अपने आप में शत्रु नहीं हैं। तकनीक ने शिक्षा, संचार और सूचना के क्षेत्र में अभूतपूर्व अवसर दिए हैं। लेकिन जब यही तकनीक बिना उम्र-आधारित सीमाओं, बिना समय-सीमा और बिना मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा तंत्र के बच्चों तक पहुँचती है, तो वह विकास के साधन से खतरे के उपकरण में बदल सकती है। दिल्ली के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारिख पहले ही यह चेतावनी दे चुके हैं कि अत्यधिक स्क्रीन-निर्भरता किशोरों में आवेग नियंत्रण को कमज़ोर करती है और जोखिम का आकलन करने की क्षमता को प्रभावित करती है। हालिया घटनाएँ इस चेतावनी को अनदेखा किए जाने की कीमत दर्शाती हैं।

इस पूरे परिदृश्य में परिवार की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे अकेला दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। यह सही है कि आज कई घरों में संवाद की कमी है और स्मार्टफोन बच्चों की चुप्पी का आसान समाधान बन गया है। यह भी सच है कि अचानक सख्ती—बिना संवाद के—टकराव को जन्म देती है। लेकिन इन पारिवारिक चुनौतियों को व्यापक नीतिगत विफलता से अलग नहीं किया जा सकता। जब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों के लिए स्पष्ट सुरक्षा मानक ही नहीं होंगे, तो परिवारों से चमत्कार की अपेक्षा करना अव्यावहारिक है।

यहीं सरकार और समाज की भूमिका कसौटी पर आती है। ऑनलाइन गेमिंग उद्योग को केवल राजस्व और स्टार्टअप सफलता के चश्मे से देखना अब पर्याप्त नहीं है। यह एक ऐसा क्षेत्र बन चुका है, जिसका सीधा प्रभाव बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। केवल परामर्श या एडवाइजरी जारी करने से काम नहीं चलेगा। आवश्यकता है एक सख्त और स्पष्ट नियामक ढाँचे की, जिसमें गेमिंग ऐप्स के लिए अनिवार्य आयु-सत्यापन, समय-सीमा, इन-ऐप खर्च पर नियंत्रण और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चेतावनियाँ शामिल हों।

विद्यालयों को भी अपनी भूमिका सीमित पाठ्यक्रम तक नहीं रखनी चाहिए। डिजिटल साक्षरता, मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता और काउंसलिंग को औपचारिक शिक्षा प्रणाली का हिस्सा बनाना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। इसी तरह, समाज को भी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कलंक को तोड़ना होगा, ताकि समय रहते सहायता ली जा सके।

गाज़ियाबाद और कुल्लू की घटनाएँ हमें यह सोचने पर विवश करती हैं कि बच्चों और किशोरों के लिए बनाया जा रहा डिजिटल परिवेश कितना असुरक्षित और अनियंत्रित होता जा रहा है। यह अब केवल सामाजिक चिंता का विषय नहीं रहा, बल्कि एक स्पष्ट नीतिगत चुनौती बन चुका है। ऐसे में सरकार और समाज को अब ‘सलाह’ और ‘चेतावनी’ के दायरे से बाहर निकलकर ‘कानून’ और ‘करुणा’ के बीच एक ठोस सेतु खड़ा करना होगा—ऐसा सेतु, जो एक ओर सख्त नियमन और जवाबदेही सुनिश्चित करे, और दूसरी ओर बच्चों की मानसिक संवेदनशीलता, संवाद और संरक्षण को केंद्र में रखे। यदि यह संतुलन अब भी नहीं बनाया गया, तो तकनीक का अनियंत्रित विस्तार आने वाले समय में और अधिक परिवारों को ऐसी त्रासदियों के सामने खड़ा कर सकता है।