दिलीप कुमार पाठक
आज 11 जनवरी 2026 को जब अयोध्या में प्रभु श्री राम के दिव्य विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ (तिथि अनुसार) मनाई जा रही है, तो यह केवल एक मंदिर का उत्सव नहीं, बल्कि उन मानवीय मूल्यों का पर्व है जो सदियों से भारतीय समाज को जोड़े हुए हैं। श्री राम का व्यक्तित्व किसी भौगोलिक सीमा या विशेष विचारधारा तक सीमित नहीं है; वे एक ऐसी ‘मर्यादा’ के प्रतीक हैं जो हर मनुष्य के लिए अनुकरणीय है। आज का दिन आत्मचिंतन का है कि हम उनके जीवन से उन सूत्रों को कैसे निकालें जो आज के आधुनिक और अशांत समाज को नई दिशा दे सकें।
प्रभु श्री राम का आध्यात्मिक पक्ष हमें ‘भीतर के रावण’ को जीतने की प्रेरणा देता है। अध्यात्म की दृष्टि में राम का अर्थ है—वह जो कण-कण में रमण करता है। जब हम राम की बात करते हैं, तो हम एक ऐसे चरित्र की बात करते हैं जिसमें धैर्य, करुणा और न्याय का अद्भुत संतुलन है। आज के आपाधापी भरे दौर में, जहाँ मानसिक तनाव और रिश्तों में बिखराव बढ़ रहा है, राम का संयम हमें सिखाता है कि विषम परिस्थितियों में भी अपनी मर्यादा और विवेक को कैसे जीवित रखा जाए। उनका जीवन संदेश देता है कि शक्ति का वास्तविक अर्थ दूसरों पर अधिकार करना नहीं, बल्कि दूसरों की रक्षा और सेवा करना है। सामाजिक सरोकार की दृष्टि से देखें तो श्री राम का चरित्र समावेशी समाज की सबसे सुंदर आधारशिला है। वनवास के दौरान उन्होंने राजसी वैभव को त्यागकर समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े लोगों को गले लगाया। निषादराज के साथ उनकी मित्रता, शबरी के जूठे बेर खाना और वंचित शक्तियों को संगठित करना यह दर्शाता है कि राम ‘अंत्योदय’ के प्रथम प्रणेता थे। उनका प्रेम किसी जाति, वर्ग या संप्रदाय का मोहताज नहीं था। आज के समाज को, जहाँ दूरियां बढ़ रही हैं, राम के इस ‘समरसता’ वाले स्वरूप की सबसे अधिक आवश्यकता है। वे सिखाते हैं कि समाज तभी सशक्त होता है जब वह भेदभाव से ऊपर उठकर एक-दूसरे का संबल बनता है।
महिलाओं के प्रति प्रभु राम का दृष्टिकोण सम्मान और गरिमा की पराकाष्ठा है। अहिल्या का उद्धार हो या माता शबरी का सम्मान, राम ने सदैव स्त्री शक्ति को उनकी योग्यता और भक्ति के आधार पर सर्वोच्च स्थान दिया। उन्होंने सिद्ध किया कि एक आदर्श समाज वही है जहाँ नारी की गरिमा सुरक्षित हो और उसे निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्राप्त हो। आज जब हम महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो राम का चरित्र हमें याद दिलाता है कि स्त्री के प्रति सम्मान केवल शब्दों में नहीं, बल्कि आचरण में होना चाहिए। राम का व्यक्तित्व यह संदेश देता है कि एक पुरुष की असली महानता उसकी शक्ति में नहीं, बल्कि स्त्री की गरिमा के प्रति उसकी संवेदनशीलता में निहित है।
राम का ‘रामराज्य’ केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं थी, बल्कि वह एक ‘कल्याणकारी समाज’ का सपना था, जहाँ “दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज नहिं काहुहि ब्यापा” (अर्थात जहाँ किसी को कोई कष्ट न हो)। यह विचार हर मनुष्य के लिए एक समान सुखद है, क्योंकि हर धर्म का अंतिम लक्ष्य शांति और लोक-कल्याण ही है। राम सबके हैं क्योंकि वे ‘करुणा’ के सागर हैं। उनका व्यक्तित्व एक ऐसे पुल की तरह है जो अलग-अलग विचारों को आपस में जोड़ता है। राम का अर्थ संघर्ष नहीं, बल्कि संवाद और समन्वय है, जो आज की विभाजित दुनिया को एकता के सूत्र में पिरो सकता है। प्रभु राम का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि न्याय केवल शक्तिशाली के लिए नहीं, बल्कि निर्बल के लिए भी सुलभ होना चाहिए। उनकी न्यायप्रियता में शत्रु के प्रति भी शिष्टाचार और सम्मान का भाव छिपा है, जो हमें सिखाता है कि वैचारिक मतभेदों के बावजूद मानवीय गरिमा को बनाए रखा जा सकता है। आज जब हम इस दूसरी वर्षगांठ का आनंद ले रहे हैं, तो हमें अपने पर्यावरण और प्रकृति के प्रति भी उसी प्रेम का संकल्प लेना चाहिए जो राम ने अपने वनवास के दौरान दिखाया था। उन्होंने प्रकृति के हर जीव और वृक्ष को अपना मित्र माना, जो आज के वैश्विक पर्यावरण संकट के दौर में सबसे बड़ी सीख है।
अंततः, राम की भक्ति का वास्तविक अर्थ उनके आदर्शों को अपने आचरण में उतारना है। यदि हम अपने हृदय में क्षमा, त्याग और परोपकार के दीप जला सकें, तो वही इस उत्सव की सार्थकता होगी। राम हमें एक बेहतर इंसान बनने की राह दिखाते हैं—एक ऐसा इंसान जो दुख में विचलित न हो और सुख में निरहंकारी रहे। आइए, इस पावन अवसर पर हम घृणा और द्वेष को त्यागकर एक ऐसे समाज की रचना करें, जहाँ प्रेम ही धर्म हो और सेवा ही ईश्वर की सच्ची इबादत। राम का नाम तभी सार्थक होगा जब हम उनके बताए ‘प्रेम के पथ’ पर चलकर समस्त मानवता को एक परिवार मानेंगे।
जय सियाराम!





