निर्मल रानी
अमेरिका,इस्राईल व ईरान के बीच छिड़े युद्ध के बीच पूरा विश्व कच्चे तेल व गैस की आपूर्ति को लेकर चिंतित है। युद्ध छिड़ते ही भारत में भी इसका प्रभाव साफ़ नज़र आने लगा। अमेरिका,इस्राईल व ईरान युद्ध के कारण ईरान के नियंत्रण वाले स्ट्रेट ऑफ़ हारमूज़ में शिपिंग रुक गई है ।ग़ौरतलब है कि भारत मध्य पूर्व से अपनी 60 से लेकर 90% तक एल पी जी गैस व कच्चे तेल का आयात इसी मार्ग से करता है। स्ट्रेट ऑफ़ हारमूज़ जल मार्ग बाधित होने के कारण ही सरकार ने घरेलू गैस उपयोगको प्राथमिकता देते हुये कामर्शियल सिलेंडर की आपूर्ति लगभग बंद कर दी है। साथ ही घरेलू सिलेंडर के दाम में 60 रुपये जबकि कमर्शियल में 115 रूपये तक की बढ़ोतरी की भी की गयी है। इस दौरान रसोई गैस के लिये जगह जगह लोगों की क़तारें देखने को मिलीं। कहीं कहीं से तो ब्लैक मार्केटिंग की ख़बरें भी सुनाई दीं। लोगों में गैस की क़िल्लत की शंका से दहशत फैल गयी।
इससे विशेषकर व्यवसायिक क्षेत्र सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ क्योंकि लगभग 90% होटल-रेस्तरां कमर्शियल एल पी जी सिलेंडर पर निर्भर हैं। राष्ट्रीय रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने इसे एक ऐसा संकट बताया जो 5.7 ट्रिलियन रुपये टर्नओवर और 80 लाख नौकरियों वाले वर्ग को ख़तरे में डाल रहा है। देश के अनेक होटल्स व रेस्तरां में मेन्यू में कटौती करते हुये रोटी, डोसा, पूरी, फ़्राई सामग्री, चाय-कॉफ़ी , हॉट ड्रिंक्स आदि हटा दिए गए। इसके बजाये केवल राइस-दाल, सैंडविच या कोल्ड ड्रिंक्स आदि ही परोसे जा रहे हैं। उदाहरण स्वरूप बेंगलुरु व चेन्नई सहित तमिलनाडु में हज़ारों छोटे रेस्त्रां पूरी तरह या कहीं कहीं आंशिक रूप से बंद हो गये । बेंगलुरु होटल एसोसिएशन के अनुसार इस संकट से औसतन 25-30प्रतिशत का राजस्व घाटा हुआ है। सबसे ज़्यादा मार भोपाल में पड़ी जहाँ 40प्रतिशत व्यापार प्रभावित हुये। कई लोगों ने तो अपनी दुकानें भी बंद कर दीं। कुछ होटल व रेस्त्रां इंडक्शन या इलेक्ट्रिक ओवन का प्रयोग करने लगे हैं। अचानक इंडक्शन की बढ़ती मांग के चलते कई जगहों से तो इंडक्शन व स्टोव के भी आउट ऑफ़ स्टॉक होने की ख़बरें आई हैं।
इस संकट का सामना करने के लिये सरकार द्वारा रिफ़ाइनरी उत्पादन 25प्रतिशत तक बढ़ने का समाचार है। जबकि कुछ राज्यों में केरोसिन व कोयला आपूर्ति करने की अस्थायी अनुमति भी दी गयी है । यदि आगे भी यही स्थिति बानी रही तो रेस्टोरेंट इंडस्ट्री में बड़े पैमाने पर बंदी और बेरोज़गारी का ख़तरा है। संकट की इस घड़ी में देश के अनेक नेता संसद से सड़कों तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2018 में विश्व जैव ईंधन दिवस के अवसर पर बेंगलुरु में आयोजित एक कार्यक्रम में दिये गये उस ‘दिव्य ज्ञान ‘ को याद कर रहे हैं जिसमें उन्होंने एक ऐसे चायवाले की कहानी सुनाई थी जो नाले से निकलने वाली गैस से चाय बनाता था। इस कार्यक्रम में उन्होंने बायो ईंधन की संभावनाओं पर बात करते हुए एक चाय वाले की कहानी का ज़िक्र किया था जो गंदे नाले से निकलने वाली गैस का इस्तेमाल करके चाय बनाता था। उन्होंने बताया था कि -‘ एक छोटे शहर में नाले के पास चाय का ठेला लगाने वाला कोई व्यक्ति था। उस नाले से दुर्गंध और गैस निकलती थी, तो उसने सोचा कि इस गैस का इस्तेमाल क्यों न करें। उसने एक बर्तन को उल्टा करके उसमें छेद किया, पाइप डाला, और नाले की गैस को पाइप के ज़रिए अपने चूल्हे तक पहुंचाया। फिर उसी गैस से चाय बनाने लगा। मोदी जी ने इसे “सिंपल सी टेक्नोलॉजी” कहा और बायो ईंधन की क्षमता का उदाहरण दिया।
बस मोदी के इसी बयान को देश के विपक्षी नेताओं व युवाओं द्वारा न केवल याद किया जा रहा है बल्कि देश में सैकड़ों जगहों से इसी फ़ार्मुले से चाय बनाने की नाकाम कोशिश करते हुये अनेक लोगों की वीडिओ भी वायरल हो रही हैं। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने तो सुल्तानपुर में बाक़ायदा नाली में पाइप डालकर गैस चूल्हा जलाने का प्रयास भी किया, लेकिन चूल्हा नहीं जला। उन्होंने कहा, “मोदी जी कहते हैं नाली की गैस से चाय बनाओ, लेकिन यह संकट मोदी सरकार ही लाई है।” कुछ लोगों ने व्यंग्य किया कि प्रधानमंत्री के ‘ज्ञान ‘ से प्रभावित व प्रेरित तमाम “लोग नाले की गैस से चाय बनाने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया मीम्स और रील्स में “अनपढ़ राजा” कहकर मोदी का मज़ाक़ उड़ाया गया, जहां नाली की गैस से चाय बनने का असफल प्रयास प्रदर्शित किया गया। मोदी के इसी ‘दिव्य ज्ञान ‘ के पुराने वीडियो शेयर व रीशेयर करते हुये उन पर व्यंग्य कसे गए। विपक्ष ने तो इस संकट को सरकार की असफल विदेश नीति और तैयारी की नाकामी बताया है।
तृणमूल कांग्रेस सांसद व पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आज़ाद ने लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “नाले की गैस से चाय बनाने” वाले पुराने बयान का व्यंग्यात्मक उल्लेख करते हुए सरकार पर तीखा तंज़ किया और गैस संकट पर सवाल उठाए। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि अगर प्रधानमंत्री की इस “गटर गैस” वाली सोच को गंभीरता से लेकर उस पर शोध किया होता, तो आज देश में एलपीजी की ऐसी कमी और सिलेंडर के दामों में यह भारी बढ़ोतरी नहीं देखनी पड़ती। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि सरकार दावा करती है कि कोई बड़ा संकट नहीं है, तो फिर एलपीजी सिलेंडर के दाम क्यों बढ़ाए गए हैं और ग़रीब व मध्यम वर्ग पर इतना बोझ क्यों डाला जा रहा है। कई जगह तो पुलिस वालों को उन युवकों को रोकते हुये भी देखा गया जो नाले से गैस निकालने का प्रदर्शन करते हुये प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दिए गये इस ‘ दिव्य ज्ञान ‘ की खिल्ली उड़ा रहे थे।
सवाल यह है कि कोई साधारण व्यक्ति यदि इस तरह की बातें करे तो उसकी इतनी चर्चा भी न हो परन्तु जब देश के सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति इस तरह का ‘ज्ञान’ बांटने लगे तो उसका मज़ाक़ उड़ाया जाना स्वभाविक है। इसके अलावा भी मोदी इसतरह की अनेक बातें कर चुके हैं जोकि तथ्यात्मक व वैज्ञानिक रूप से ग़लत साबित हुई हैं। बादल में रडार का काम न करने का उनका दावा भी ऐसा ही एक ‘दिव्यज्ञान ‘ था जिसका पूरी दुनिया ने ख़ासकर वैज्ञानिकों ने काफ़ी मज़ाक़ उड़ाया था। ऐसे ग़ैरतार्किक व अवैज्ञानिक तर्क देने से पहले किसी भी ज़िम्मेदार व्यक्ति को यह ज़रूर सोचना चाहिये कि ‘इस तरह क्यों थूकिये कि मुंह पर वापस आये ‘ ?





