शक्तिपीठ माँ कामाख्या देवी मंदिर जहाँ सृष्टि की साधना होती है और मौन भी मंत्र बन जाता है
विनोद कुमार सिंह
धन्य है भारत की वह पवित्र धरा, जहाँ धर्म और अध्यात्म केवल मूर्तियों,मंत्रों,फूल-प्रसाद ,चढावों और कर्मकांडों तक सीमित नहीं रहते,बल्कि मानव चेतना की गहराइयों में उतरकर जीवन-दर्शन का रूप ले लेते हैं।भारत की असली पहचान उसी जीवंत परंपरा में रची-बसी है,जो प्रश्नों से भयभीत नहीं होती,बल्कि उन्हें साधना की सर्वोच्च अवस्था में रूपांतरित कर देती है।यही कारण है कि भारतीय दर्शन में देवी-देवता केवल पूजनीय प्रतीक नहीं, बल्कि सृष्टि की मूल ऊर्जा के साक्षात स्रोत माने गए हैं। इसी निर्भीक स्वीकार्यता का सबसे रहस्यमय,साहसी और वैचारिक प्रतीक है -शक्तिपीठ माँ कामाख्या।
नीलांचल पर्वत की गोद में,असम के गुवाहाटी नगर में स्थित माँ कामाख्या का यह दिव्य धाम केवल एक मंदिर नहीं,बल्कि भारतीय चेतना का वह शिखर है,जहाँ श्रद्धा,तंत्र,इतिहास और स्त्री-शक्ति एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। यह वह स्थल है जहाँ न देवी की कोई मूर्ति है, न कोई साकार प्रतिमा -यहाँ पूजा होती है सृष्टि के मूल स्रोत की,साक्षात योनि की। वही योनि,जिसे आधुनिक समाज ने कभी अश्लीलता में बदल दिया,तो कभी लज्जा और निषेध के आवरण में ढक दिया।किंतु भारतीय सभ्यता की गहराई यहाँ उद्घोष करती है कि स्त्री-शरीर,रक्त और सृजन अपवित्र नहीं,बल्कि पूज्य हैं।
विगत दिनों,हमें अपने कुछ मीडिया मित्रों के संग इस अलौकिक आध्यात्मिक यात्रा का सौभाग्य प्राप्त हुआ।दो दिवसीय प्रवास के दौरान पहले दिन माँ के तीन बार दर्शन का अवसर मिला,किंतु स्थानीय श्रद्धालुओं की मान्यता के अनुसार, मुख्य दर्शन और साधना की पूर्णता तब मानी जाती है जब गर्भगृह के उस पवित्र स्थल का साक्षात्कार हो, जहाँ माता सती की रजस्वला शक्ति का पतन हुआ था।इसी भाव के साथ,दूसरे दिन प्रातःकालीन बेला में हम मंदिर पहुँचे।लंबी कतारें, प्रतीक्षा और धैर्य—इन सबके बाद जो क्षण मिला,वह केवल दर्शन नहीं था,वह आत्मा के भीतर उतरती हुई एक शांति थी,जिसे शब्दों में बाँध पाना कठिन है।इसी अनुभूति को यह आलेख स्वर देने का विनम्र प्रयास है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार,राजा दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव के अपमान से आहत होकर माता सती ने यज्ञकुंड में आत्मदाह कर लिया। शोक और क्रोध से व्याकुल शिव उनके निष्प्राण शरीर को लेकर तांडव करने लगे।सृष्टि के विनाश को रोकने हेतु भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51भागों में विभक्त किया।जहाँ-जहाँ ये अंग गिरे,वहीं शक्तिपीठ स्थापित हुए। कामाख्या वह पवित्र स्थल है जहाँ माता सती की योनि गिरी।यही कारण है कि यह शक्तिपीठ अन्य सभी शक्तिपीठों से भिन्न,अधिक साहसी और अधिक वैचारिक है। यहाँ पूजा सौंदर्य की नहीं,बल्कि सृजन के मूल तत्व की होती है।
माँ कामाख्या को कामेश्वरी कहा गया है – इच्छा की देवी।इच्छा,जो सृष्टि का पहला स्पंदन है।बिना इच्छा न जीवन संभव है, न सृजन।यही कारण है कि कामाख्या केवल भक्ति का स्थल नहीं,बल्कि साधना का केंद्र है।तंत्र,जिसे अज्ञान और भय के कारण लंबे समय तक विकृत रूप में प्रस्तुत किया गया,वस्तुतः शक्ति के विज्ञान का नाम है।कामाख्या उसी तांत्रिक चेतना का मूल केंद्र है,जहाँ साधना का उद्देश्य शक्ति को समझना और साधना है,न कि उसका दुरुपयोग।
इतिहास भी इस मंदिर की जीवंतता का साक्षी है।माना जाता है कि इसका मूल स्वरूप अत्यंत प्राचीन था।16वीं शताब्दी में कोच राजा बिस्वा सिंह ने इसका पुनर्निर्माण कराया।बाद में राजा नारायण और वीर चिलराय ने 1565 में इसका जीर्णोद्धार कर इसे राजाश्रय प्रदान किया।अहोम शासकों और कोचबिहार के राजवंशों ने भी इसे संरक्षण दिया।1897 के विनाशकारी भूकंप ने मंदिर को गहरी क्षति पहुँचाई,किंतु आस्था ने एक बार फिर इसे खड़ा कर दिया।यह केवल पत्थरों का पुनर्निर्माण नहीं था,यह भारतीय चेतना की पुनर्स्थापना थी।
कामाख्या मंदिर की सबसे चर्चित और विवादास्पद परंपरा अंबुबाची पर्व है।आषाढ़ मास में तीन से चार दिनों तक मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। मान्यता है कि इस अवधि में देवी रजस्वला होती हैं।यह बंद होना निषेध का प्रतीक नहीं,बल्कि सम्मान का संकेत है।यह मौन अशुद्धि का नहीं,बल्कि सृजन-काल का मौन है -जब प्रकृति स्वयं विश्राम करती है और मनुष्य को प्रतीक्षा का अर्थ सिखाती है।इन दिनों के बाद गर्भगृह में रखा गया श्वेत वस्त्र लाल हो जाता है,जिसे अंबुबाची वस्त्र के रूप में प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाता है।यह वस्त्र केवल कपड़ा नहीं, बल्कि उस दर्शन का प्रतीक है,जो स्त्री-रक्त को जीवन का स्रोत मानता है,न कि कलंक।
माँ कामाख्या का मंदिर यह भी स्पष्ट करता है कि भारतीय आस्था कभी उन्मादी नहीं रही।यहाँ बलि की परंपरा है, किंतु उसमें भी मर्यादा है। मादा पशुओं की बलि निषिद्ध है और मनोकामना पूर्ण होने पर कन्या- भोजन कराया जाता है।यही संतुलन भारतीय संस्कृति की आत्मा है,जहाँ श्रद्धा विवेक से अलग नहीं होती।
मंदिर परिसर में दशमहाविद्याओं के मंदिर और भगवान शिव के पाँच स्वरूप—कामेश्वर,सिद्धेश्वर, केदारेश्वर,अमृतेश्वर और अघोरेश्वर—इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि कामाख्या केवल दर्शन का स्थल नहीं,बल्कि साधकों की साधना- स्थली है।यहाँ आने वाले अघोरी, तांत्रिक और साधु किसी चमत्कार की तलाश में नहीं,बल्कि स्वयं के भीतर की सीमाओं को तोड़ने की साधना में लीन रहते हैं।यही कारण है कि कामाख्या को लेकर भय, आकर्षण और रहस्य -तीनों एक साथ चलते हैं।
आज के भारत में,जहाँ स्त्री-शरीर को लेकर गहरा दोहरापन व्याप्त है -एक ओर देवी-पूजन,दूसरी ओर दमन -माँ कामाख्या एक असहज प्रश्न बनकर खड़ी होती हैं।यह धाम पूछता है कि जब सृष्टि का मूल स्त्री है,तो उसी स्त्री को अपवित्र क्यों ठहराया गया?यह मंदिर उस औपनिवेशिक और विकृत मानसिकता को चुनौती देता है, जिसने भारतीय समाज को उसकी मूल चेतना से काट दिया।
माँ कामाख्या कोई पर्यटन स्थल नहीं,कोई सनसनीखेज कथा नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा का वह शिखर है,जहाँ मौन भी साधना बन जाता है।यह हमें स्मरण कराता है कि सच्ची साधना आँख मूँदकर मान लेने में नहीं,बल्कि सत्य को स्वीकार करने के साहस में है -चाहे वह सत्य कितना ही असहज क्यों न हो।
यही कारण है कि माँ कामाख्या का यह धाम केवल असम की पहचान नहीं,बल्कि उस भारत का प्रतीक है, जो सत्य से डरता नहीं,जो स्त्री-शक्ति को केवल शब्दों में नहीं,बल्कि दर्शन में पूजता है,और जो सृष्टि के मूल स्रोत को नमन करने का साहस रखता है।





