गोपेन्द्र नाथ भट्ट
भारत में मकर संक्रांति का नाम आते ही सबसे पहले जिन दो शहरों की पतंगबाजी याद आती है, वे हैं जयपुर और अहमदाबाद। दोनों शहरों में पतंग उड़ाना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि परंपरा, सामाजिक उत्सव और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। हालांकि उद्देश्य एक है आसमान में रंग बिखेरनाvलेकिन दोनों शहरों की पतंगबाजी की शैली, वातावरण और स्वरूप में स्पष्ट भिन्नताएँ दिखाई देती हैं।
जयपुर की पतंगबाजी यानी छतों से उठता पारिवारिक उल्लास है जयपुर में पतंगबाजी का उत्सव पूरी तरह घरेलू और सामूहिक रूप में नजर आता है। मकर संक्रांति के दिन सुबह से ही घरों की छतें गुलजार हो जाती हैं। परिवार के सभी सदस्यभीबुजुर्ग, युवा और बच्चे एक साथ छत पर जुटते हैं। महिलाओं द्वारा बनाए गए तिल-गुड़ के लड्डू, गजक और खिचड़ा उत्सव में मिठास घोल देते हैं। जयपुर की पतंगबाजी की पहचान है वो काटा…! की गूंज। जैसे ही किसी की पतंग कटती है, पूरे मोहल्ले में उत्साह की लहर दौड़ जाती है। यहां पतंगबाजी में प्रतिस्पर्धा जरूर होती है, लेकिन वह अधिकतर सौहार्दपूर्ण और मनोरंजक होती है। जयपुर में पतंगों के रंग अपेक्षाकृत पारंपरिक और कलात्मक होता हैं। साधारण कागज़ की पतंगें, जिन पर स्थानीय डिज़ाइन या सादे रंग होते हैं। हालांकि हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव ने यहां भी नई शैलियों और आकृतियों को लोकप्रिय बनाया है।
मकर संक्रांति आते ही जयपुर की असली पहचान बनती है पतंगबाजी यानी जयपुर की छतों से आसमान तक उत्सव पतंगबाजी। सुबह से लेकर शाम तक शहर की लगभग हर छत पर पतंगें उड़ती दिखाई देती हैं। नीले आसमान में लाल, पीली, हरी और नीली पतंगों का नज़ारा ऐसा लगता है मानो किसी चित्रकार ने आकाश को कैनवास बना दिया हो। वो काटा! की गूंज, तालियों की आवाज़ और बच्चों की खिलखिलाहट पूरे शहर को एक बड़े मेले में बदल देती है। जयपुर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव ने इस उत्साह को वैश्विक पहचान देता है। देश-विदेश से आने वाले पतंगबाज़ अपनी कलात्मक और विशाल पतंगों से दर्शकों को आकर्षित करते हैं। यह आयोजन पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ जयपुर की सांस्कृतिक छवि को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करता है।
अहमदाबाद को देश की पतंग राजधानी कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यहां मकर संक्रांति पर पतंगबाजी एक बड़े पैमाने के आयोजन का रूप ले लेती है। अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव के कारण यह शहर वैश्विक स्तर पर पहचान बना चुका है।वहीं गुजरात में अहमदाबाद की पतंगबाजी में प्रतिस्पर्धा बेहद तीव्र होती है। यहां पतंग उड़ाना एक कला और रणनीति माना जाता है। पतंगबाज़ महीनों पहले से तैयारी करते हैं, खास किस्म का मांझा और संतुलित पतंगें तैयार की जाती हैं। आकाश में एक साथ हजारों पतंगें उड़ती दिखाई देती हैं, जिससे शहर का दृश्य अद्भुत हो जाता है।अहमदाबाद में छतों के अलावा सार्वजनिक स्थलों, रिवरफ्रंट और खुले मैदानों पर भी आयोजन होते हैं, जो इसे एक महानगर स्तर का उत्सव बनाते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी अपने मुख्यमंत्रित्व काल में जाने माने फिल्मी सितारों को गुजरात आमंत्रित कर इस त्यौहार को परवान पर चढ़ाया था
दोनों शहरों की पतंगबाजी निराली है।जयपुर की पतंगबाजी में लोक-संगीत, ढोल-नगाड़े और पारिवारिक हंसी का माहौल अधिक दिखाई देता है, वहीं अहमदाबाद में प्रतिस्पर्धा, कौशल और तकनीक पर जोर होता है। जयपुर में पतंगबाजी का आनंद मोहल्लों तक सीमित रहता है, वहीं अहमदाबाद में यह पूरे शहर और पर्यटन से जुड़ा आयोजन बन चुका है। भिन्नताओं के बावजूद दोनों शहरों की पतंगबाजी में एक समान तत्व है सामूहिक उल्लास और परंपरा का सम्मान। दोनों ही जगह मकर संक्रांति सूर्य उपासना, दान-पुण्य और मिठाइयों के साथ मनाई जाती है। साथ ही अब दोनों शहरों में सुरक्षित और पर्यावरण- अनुकूल पतंगबाजी को बढ़ावा देने की पहल भी दिखने लगी है। साथ चीनी माजे पर प्रतिबंध तथा छतों से गिरने की दुर्घटनाएं भी कम हुई है।
जयपुर की पतंगबाजी जहां पारिवारिक अपनत्व और लोकसंस्कृति का प्रतीक है, वहीं अहमदाबाद की पतंगबाजी भव्यता, प्रतिस्पर्धा और वैश्विक पहचान का उदाहरण। दोनों ही अपने-अपने ढंग से भारतीय सांस्कृतिक विविधता को आकाश में रंगों के रूप में उकेरती हैं। यही विविधता भारत की असली खूबसूरती है।
जयपुर का लोहड़ी उत्सव भी है प्रसिद्ध
राजस्थान की राजधानी जयपुर, जिसे गुलाबी नगरी के नाम से जाना जाता है, केवल ऐतिहासिक धरोहरों और राजसी स्थापत्य के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यहां मनाए जाने वाले त्योहार भी इसकी जीवंत संस्कृति को नई ऊँचाइयाँ देते हैं। सर्दियों के अंतिम चरण में आने वाले लोहड़ी और मकर संक्रांति जयपुर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में विशेष स्थान रखते हैं। इन पर्वों के साथ जुड़ी पतंगबाजी इस शहर को कुछ दिनों के लिए रंगों, संगीत और उल्लास के खुले मंच में बदल देती है।
लोहड़ी जिसे आग, आस्था और सामूहिक उल्लास का त्यौहार माना जाता है। लोहड़ी मुख्य रूप से पंजाब का लोकपर्व माना जाता है, लेकिन जयपुर जैसे बहुसांस्कृतिक शहर में यह पर्व अब पूरे उत्साह से मनाया जाने लगा है। 13 जनवरी की शाम होते ही शहर की कॉलोनियों, अपार्टमेंट परिसरों, होटलों और रिसॉर्ट्स में अलाव जल उठते हैं। लोग अग्नि के चारों ओर एकत्र होकर तिल, मूंगफली, रेवड़ी, पॉपकॉर्न और गुड़ अर्पित करते हैं। यह अग्नि सर्दियों की विदाई और नई ऊर्जा के स्वागत का प्रतीक मानी जाती है।
जयपुर में लोहड़ी का विशेष आकर्षण पंजाबी लोकगीतों पर होने वाला भांगड़ा और गिद्धा है। पारंपरिक वेशभूषा में सजे युवक-युवतियाँ, ढोल की थाप पर नाचते हुए, वातावरण को पूरी तरह उत्सवमय बना देते हैं। कई परिवारों में नवविवाहित जोड़ों और नवजात शिशुओं के लिए लोहड़ी विशेष रूप से मनाई जाती है, जो सामाजिक मेल-जोल और पारिवारिक एकता को मजबूत करती है।
लोहड़ी के अगले दिन आने वाली मकर संक्रांति धार्मिक और खगोलीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण की शुरुआत मानी जाती है। सूर्य, दान और परिवर्तन का पर्व मकर संक्रांति जयपुर वासियों का प्रिय त्यौहार है। जयपुर में प्रातःकाल लोग स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देते हैं और दान-पुण्य करते हैं। तिल, गुड़, कंबल और गर्म वस्त्रों का दान विशेष पुण्यदायी माना जाता है। राजस्थानी परंपरा में मकर संक्रांति के दिन विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। तिल-गुड़ के लड्डू, गजक, घेवर, खिचड़ा और बाजरे की रोटी इस पर्व की पहचान हैं। तिल-गुड़ खाओ, मीठा-मीठा बोलो की भावना सामाजिक रिश्तों में मिठास घोल देती है और आपसी सौहार्द को बढ़ावा देती है। मकरसंक्रांति के दिन बहन बेटियों को घर बुला कर उन्हें वस्त्र देना और मिठाइयां खिलाने का रिवाज भी है।लोहड़ी, मकर संक्रांति और पतंगबाजी केवल त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक निरंतरता के प्रतीक हैं। ये पर्व परिवार, पड़ोस और समाज को एक साथ जोड़ते हैं। साथ ही, बदलते समय में पर्यावरण और सुरक्षा को लेकर जागरूकता भी बढ़ रही है।अब लोग पर्यावरण-अनुकूल पतंगों और सुरक्षित मांझे के उपयोग पर जोर देने लगे हैं।जयपुर में लोहड़ी की अग्नि, मकर संक्रांति की आध्यात्मिकता और पतंगबाजी का रंगीन उल्लास तीनों मिलकर सर्दियों के अंत को यादगार बना देते हैं। यह समय परंपरा और आधुनिकता के सुंदर संगम का प्रतीक है, जहाँ लोक संस्कृति जीवित रहती है और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ती है। जयपुर और अहमदाबाद के लिए ये पर्व केवल तिथियाँ नहीं, बल्कि उत्सव, पहचान और सामूहिक आनंद का उत्सव हैं।





