मनोज कुमार मिश्र
आबादी के बोझ से दबी दिल्ली को बचाने और बनाने का सबसे कारगर हथियार एनसीआर(राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) योजना बन सकती है। राजीव गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने 1985 में बोर्ड का गठन किया। दिल्ली के अलावा हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान इसके सदस्य बनाए गए। एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी इसके सदस्य सचिव बनाए गए। केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय के अधीन बोर्ड बना। वह तीन नवंबर, 1988 से काम करना शुरु किया। यह बहुत कारगर इसलिए नहीं हुआ क्योंकि इसके पास कारवाई करने का कोई ठोस अधिकार न था। यह योजना बनने के साथ ही फेल हो गई। यह बात 1996 में बोर्ड के सदस्य सचिव रहे ओमेश सहगल ने कही। वे दिल्ली में एसडीएम से लेकर मुख्य सचिव तक के पद पर काम कर चुके हैं। वे खुद अब इसको कारगर तरीके से लागू किए जाने की उम्मीद लगाए हुए हैं। उनका कहना था कि तब केन्द्र और एनसीआर के सभी राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी, अब भाजपा की सरकार है। इतना ही नहीं तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली को माडल शहर बनाने की घोषणा की है। दिल्ली के लिए करोड़ों के सौगात की घोषित हुई है।
राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में और वोट की राजनीति में पिछड़ने के भय से पहले की सरकारों ने दिल्ली पर आबादी के बोझ को कम करने के फैसले लिए लेकिन उस पर अमल नहीं हो पाया। सत्तर के दशक में करीब पचास बड़े सरकारी दफ्तर दिल्ली से बाहर ले जाने का फैसला हुआ। एक को उसमें से गए ही गिनती के, जो गए भी उनके मुख्य दफ्तर से ज्यादा उनके दिल्ली शाखा दफ्तर बड़ा होता गया। तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दो बार में दिल्ली की तब की सभी अनधिकृत कालोनियों को नियमित करवा दिया था। उसी के बाद उन सरकारी दफ्तरों को दिल्ली के बाहर ले जाने का फैसला किया, जिनको दिल्ली में होना जरूरी नहीं हैं। इतना ही नहीं उनके चलते हजारों कर्मचारी और दूसरे लोग दिल्ली में बेवजह रहना पड़ता। यह फैसला भी राजनीतिक दबाव से ठीक लागू नहीं पाया। दिल्ली में बढ़ रही बेहिसाब आबादी से केवल मकान और रोजगार का संकट नहीं बढ़ रहा है बल्कि इसका असर बिजली-पानी की आपूर्ति से लेकर प्रदूषण को बढ़ाने पर हो रहा है। दिल्ली का क्षेत्रफल 1915 से आज तक 1483 वर्ग किलोमीटर ही है लेकिन आबादी 2 लाख38 हजार से बढ़कर करीब तीन करोड़ हो गई। इतना ही नहीं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र(एनसीआर) की कुल आबादी चार करोड़ से ज्यादा हो गई है। दिल्ली की सीमा बढ़ने की कोई संभावना नहीं दिख रही है। ऐसे में दिल्ली पर से आबादी का दबाव कम करने और हर साल औसत बाहर से आकर दिल्ली में बसने वाली करीब पांच लाख की अतिरिक्त आबादी को दिल्ली में आने से रोकने के लिए दिल्ली जैसी सुविधा दिल्ली के बाहर उपलब्ध कराना सरकारों के लिए बड़ी चुनौती है। ऐसा न होने पर दिल्ली में मूलभूत सुविधाओं का संकट तो बढ़ता ही जाएगा, प्रदूषण की समस्या और बड़ी और स्थाई होती जाएगी।
इसी तरह प्रदूषण और भीड़ को कम करने के लिए सालों पहले अदालत ने साफ तौर पर दिल्ली में उद्योग लगाने पर पाबंदी लगाई थी। माना गया कि केवल सेवा क्षेत्र के उद्योग(काम)-स्कूल, अस्पताल, होटल इत्यादि ही दिल्ली में लगेंगे। वास्तव में ऐसा हुआ नहीं। ओमेश सहगल एनसीआर के सफल न होने का एक बड़ा कारण मानते हैं कि बोर्ड के पास कोई ठोस अधिकार है ही नहीं। वह किसी को सजा दे ही नहीं सकती। इसलिए योजना कागजों पर ही रही और बेहिसाब तरीके से आबादी बढ़ती गई। इतना ही नहीं कोई राज्य सरकार दिल्ली के उपयोग के लिए अपनी जमीन देना तो दूर अपने राज्य सरकार के अधिकारों में कोई हस्तक्षेप नहीं करने देती। सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि पूरे एनसीआर ही नहीं पड़ोसी शहरों के लोग नागरिक सुविधाओं के लिए दिल्ली आने पर मजबूर हैं। हवाई अड्डा(अब जेवर में शुरू होने वाला है), बड़े रेलवे स्टेशन, बड़े अस्पताल, बढ़िया स्कूल-कालेज के लिए तो लोगों को दिल्ली ही आना पड़ रहा है। लोग आएंगे तो गाड़ियां आएंगी। उससे प्रदूषण बढ़ेगा।
इसलिए बिना ठोस योजना और राजनीतिक इच्छा शक्ति के दिल्ली पर से आबादी का बोझ कम ही नहीं हो सकता। वे कहते हैं कि दो बार दिल्ली की अनधिकृत कालोनियों को नियमित किया गया। जब वे मुख्य सचिव थे तब पता नहीं कैसे एरियल सर्वे में एक भी अनधिकृत कालोनी नहीं दिखी और आज यह संख्या तीन हजार पार कर गई। सवाल है कि यह सारी कालोनियां या दिल्ली के हर इलाके में अनधिकृत निर्माण कैसे और किसने किए, इस पर ठोस कारवाई हुए बिना दिल्ली को बचाया नहीं जा सकता है।
इसी तरह दिल्ली विकास प्राधिकरण(डीडीए) की स्थापना 1959 में दिल्ली को व्यवस्थित करने की योजना बनाने के लिए की गई। मकान बना कर बेचना उसने अपना मुख्य काम बना लिया। धीरे-धीरे उसके मास्टर प्लान बेकार साबित होने लगे और वह एक बड़ा बिल्डर जैसा बन गया। दुनिया के अमीर देश-अमेरिका और चीन बिजली बचाने के लिए अंतरिक्ष में डाटा सेंटर बना रहे हैं। अपने देश में अभी तक एक दूसरे राज्य से बिजली-पानी खरीदने-बेचने में ही लगे हुए हैं। दिल्ली अपनी जरूरत का केवल दस फीसदी पानी अपने से जुटा पाती है। बाकी के लिए तो दूसरे राज्यों पर ही निर्भरता है। फिर भी लगातार दिल्ली में पानी का संकट बना ही हुई है। हिमाचल प्रदेश के रेणुका बांध से दिल्ली को पानी मिलने का भरोसा सालों से मिल रहा है। यह कैसे संभव है कि दूसरे राज्य अपने पानी न लेकर सारा ही पानी दिल्ली को देने लगेंगे।
बदलाव की उम्मीद इसलिए है कि एनसीआर योजना के समय दिल्ली और पड़ोस के राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी तो अभी हर जगह भाजपा की सरकार है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बार-बार दिल्ली को बेहतर बनाने की घोषणा करते रहे हैं। दिल्ली पर यातायात का दबाव घटाने के लिए मोदी सरकार ने ईस्टर्न पेरिफेरियल एक्सप्रेसवे, वेस्टर्न पेरिफेरियल एक्सप्रेसवे, दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे और दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे बनाया। दिल्ली मेट्रो रेल दिल्ली और एनसीआर में 295 किलोमीटर तक बन चुका है। चौथे चरण में इसमें करीब 48 किलोमीटर और जुड़ जाएगा। इस पर भी काम शुरू हो गया है। दिल्ली मेट्रों से हर रोज यात्रा करने वालों की औसत संख्या पचास लाख से ऊपर है। यह संख्या 70 लाख भी पार कर जाती है। दिल्ली-मेरठ नमो भारत रेल कोरिडोर के बाद दिल्ली- करनाल और दिल्ली- अरवल कोरिडोर बनने वाला है। इन सभी का लाभ तो दिल्ली को होगा ही।
दिल्ली की समस्या यह है कि दिल्ली का अपना ज्यादा कुछ नहीं है। मौसम भी पड़ोसी राज्यों पर निर्भर है। इतना ही नहीं दिल्ली अपनी जरूरतों को पूरा करने के संसाधनों के लिए भी दूसरे राज्यों पर निर्भर है। 1911 में दिल्ली देश की राजधानी बनी तब दिल्ली की आबादी करीब 2,38 हजार थी, जो 1947 में बढ़कर 6,95 हजार हो गई थी। अब आबादी करीब तीन करोड़ है और एनसीआर की कुल आबादी की करीब साढ़े चार करोड़ हो गई है। एनसीआर की आबादी भी मूल रूप से दिल्ली की आबादी ही है। दिल्ली से बाहर बसने वाले ज्यादातर लोग आज भी दिल्ली से ही जुड़े हुए हैं। उनमें ज्यादातर के कारोबार या नौकरी दिल्ली में ही है। राजधानी बनने के बाद 1915 में यमुना पार के 65 गांव दिल्ली में जुड़े। तब से दिल्ली का इलाका 1483 किलोमीटर ही बना हुआ है। निकट भविष्य में इसमें बढ़ोतरी होने की संभावना नहीं दिख रही
डीडीए(दिल्ली विकास प्राधिकरण) को सहयोग देने के लिए डीडीए की तरह ही केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय के अधीन एनसीआर बनाने की योजना तो 1962 में ही बनी लेकिन उसका गठन 1985 में हो पाया और बोर्ड 1988 में काम करना शुरु किया। केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री इसके अध्यक्ष और दिल्ली के उप राज्यपाल के अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के मुख्यमंत्री इसके सदस्य बनाए गए। एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी इसके सदस्य सचिव होते हैं। योजना के लागू होने के समय ही दिल्ली में अनुमान से अधिक आबादी हो गई थी। एनसीआर के शहरों और दिल्ली के बीच में एक किलोमीटर का गलियारा हरियाली के लिए छोड़ना था। यानि एनसीआर बसना था दिल्ली से हट कर वे बस गए दिल्ली से सटकर। इतना ही नहीं दिल्ली में एक तरह से हर किसी को हर जगह एक तरह से अवैध निर्माण करने की छूट दे दी गई। जो योजनाएं पहले से बनी उसमें तो केवल खामियां ही खामियां हैं। दुनिया के सबसे महंगे इलाके कनाट प्लेस में हर वर्ग के सरकारी कर्मचारियों के लिए फ्लैट बना दिए गए। यह तो मान भी लिया जाए कि गरीब लोगों को खाली जगह पर मुफ्त में सरकार आवास उपलब्ध करवाए लेकिन अमीरों की कई-कई करोड़ की एक-एक अवैध सैनिक फार्म हाउस को भी न तोड़ा जाए, यह समझ से परे है।
एनसीआर के गठन के समय इसे दिल्ली के 1483 के अलावा हरियाणा के छह जिलों के 13,413,उत्तर प्रदेश के चार जिलों के 10,885 और राजस्थान के 4,493 यानि 30, 240 वर्ग किलोमीटर इलाके को एनसीआर में शामिल किया गया। तब योजना थी कि 2001 में दिल्ली की हो जाने वाली 1,32 लाख आबादी में से 20 लाख आबादी को इन इलाकों में भेजा जाए। इसके लिए इन सभी जगहों में दिल्ली जैसी सुविधा उपलब्ध कराई जाए। ऐसा कुछ भी नहीं हो पाया और दिल्ली की आबादी लगातार बढ़ती गई। यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है। अगर यह सिलसिला न रुका तो दिल्ली को बचाना कठिन होता जाएगा।





