समता, श्रम और सद्भाव का संदेश : पूज्य गुरु रविदास

Message of equality, labor and harmony: Revered Guru Ravidas

अजय कुमार बियानी

भारत केवल भौगोलिक सीमाओं से बना देश नहीं है, बल्कि यह ऋतुओं की संवेदनशीलता, त्योहारों की रंगत, महापुरुषों की स्मृतियों, साधना की परंपरा और राष्ट्र के लिए सर्वस्व अर्पण करने वाली चेतना का जीवंत संगम है। यही कारण है कि यहाँ हर जयंती केवल तिथि नहीं, बल्कि विचार और मूल्य की पुनर्स्मृति होती है। एक फरवरी को मनाई जाने वाली पूज्य गुरु रविदास जी की जयंती भी इसी सांस्कृतिक परंपरा का सशक्त उदाहरण है, जिसे नई पीढ़ी को गहराई से समझने की आवश्यकता है।
गुरु रविदास जी का जीवन और विचार भारतीय समाज को भीतर से झकझोरने वाले थे। उन्होंने ऐसे समय में समता और मानवीय गरिमा की बात की, जब समाज ऊँच-नीच और भेदभाव की जकड़न में था। उनके लिए भक्ति का अर्थ केवल कर्मकांड नहीं था, बल्कि श्रम, ईमानदारी और समानता से जुड़ा जीवन ही सच्ची साधना थी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मन की पवित्रता और आचरण की सच्चाई ही ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग है।

नई पीढ़ी के लिए गुरु रविदास जी का संदेश आज और भी प्रासंगिक हो गया है। तकनीक, प्रतिस्पर्धा और तेज़ रफ्तार जीवन के बीच मनुष्य कहीं न कहीं संवेदना और संतुलन खोता जा रहा है। ऐसे समय में गुरु रविदास जी यह स्मरण कराते हैं कि व्यक्ति की पहचान उसके जन्म से नहीं, उसके कर्म और चरित्र से होती है। समाज तभी मजबूत बनता है जब हर व्यक्ति को सम्मान, अवसर और न्याय मिले।

भारत की आत्मा विविधता में एकता की भावना से बनी है। ऋतुएँ बदलती हैं, त्योहार आते-जाते हैं, पर मूल भाव वही रहता है—सह-अस्तित्व। गुरु रविदास जी ने इसी सह-अस्तित्व को अपने विचारों का आधार बनाया। उनका सपना ऐसा समाज था जहाँ न कोई ऊँचा हो, न नीचा; जहाँ श्रम को ही सबसे बड़ा सम्मान माना जाए।

गुरु रविदास जी की वाणी केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार का घोष है। उन्होंने आत्मा और परमात्मा के मिलन को बाहरी आडंबर से मुक्त कर, मानवता की सेवा से जोड़ा। यही कारण है कि उनकी जयंती केवल किसी एक वर्ग या समुदाय की नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र की धरोहर है।

आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी गुरु रविदास जी को केवल जयंती तक सीमित न रखे, बल्कि उनके विचारों को जीवन में उतारे। जब हम भेदभाव से ऊपर उठकर श्रम का सम्मान करेंगे, तभी उनके सपनों का भारत साकार होगा। यही गुरु रविदास जी को सच्ची श्रद्धांजलि है और यही भारत की सनातन चेतना का सार।