मोबाइल, नशा और तनाव – बचपन पर तीन वार

Mobile phones, drugs and stress – three blows to childhood

“हमारे बच्चे खतरे में हैं – ज़िम्मेदार कौन?”

डॉ. विजय गर्ग

आज का बचपन तीन अदृश्य वार झेल रहा है—मोबाइल की लत, नशे का बढ़ता प्रचलन और तनाव का असामयिक बोझ। कभी जो बचपन खिलौनों, खेल के मैदानों और खुली हंसी में बीतता था, वह आज स्क्रीन की रोशनी, सोशल मीडिया की प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं के दबाव में सिमटता जा रहा है। प्रश्न यह है कि यदि हमारे बच्चे खतरे में हैं तो इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है?

  1. मोबाइल: सुविधा से लत तक

मोबाइल फोन आधुनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। शिक्षा, जानकारी और संचार के लिए यह उपयोगी साधन है। लेकिन जब यही साधन बच्चों के हाथों में अनियंत्रित रूप से पहुंच जाता है, तो वह मनोरंजन से अधिक लत का माध्यम बन जाता है।
घंटों तक गेम खेलना, सोशल मीडिया पर तुलना करना, देर रात तक स्क्रीन देखना—ये सब बच्चों की नींद, आंखों, मानसिक स्वास्थ्य और एकाग्रता पर बुरा प्रभाव डालते हैं। वास्तविक मित्रता की जगह वर्चुअल संबंध ले लेते हैं। परिणामस्वरूप बच्चा धीरे-धीरे परिवार और समाज से कटने लगता है।

  1. नशा: जिज्ञासा से विनाश तक

किशोरावस्था जिज्ञासा और प्रयोग का समय होती है। यदि इस समय सही मार्गदर्शन न मिले तो बच्चे तंबाकू, शराब या अन्य नशे की ओर आकर्षित हो सकते हैं। कई बार यह शुरुआत “सिर्फ एक बार” से होती है, जो आगे चलकर आदत बन जाती है।
नशा न केवल शरीर को कमजोर करता है, बल्कि आत्मविश्वास, चरित्र और भविष्य को भी प्रभावित करता है। यह परिवारों को तोड़ देता है और समाज को खोखला करता है।

  1. तनाव: बचपन से पहले ही बोझ

आज के बच्चे पढ़ाई, प्रतियोगिता और अपेक्षाओं के दबाव में जी रहे हैं। अंक और रैंक उनकी पहचान बन गए हैं। माता-पिता और समाज की ऊँची उम्मीदें कई बार बच्चों पर असहनीय दबाव डाल देती हैं।
तनाव के कारण बच्चों में चिड़चिड़ापन, अवसाद, आत्मविश्वास की कमी और कभी-कभी आत्मघाती विचार तक पनप सकते हैं। बचपन, जो सहजता और आनंद का समय होना चाहिए, चिंता और भय का कारण बन रहा है।

ज़िम्मेदार कौन?

  1. परिवार:
    बच्चों को मोबाइल देकर चुप कराना आसान समाधान है, लेकिन इसके दूरगामी दुष्परिणाम हैं। यदि माता-पिता स्वयं स्क्रीन में डूबे रहें, तो बच्चे भी वही सीखेंगे। संवाद की कमी और समय का अभाव बच्चों को गलत दिशाओं में ले जा सकता है।
  2. समाज और मित्र मंडली:
    साथियों का प्रभाव अत्यंत शक्तिशाली होता है। यदि परिवेश स्वस्थ नहीं है, तो बच्चा जल्दी प्रभावित हो सकता है।
  3. शिक्षा प्रणाली:
    केवल अंकों पर आधारित शिक्षा बच्चों में प्रतिस्पर्धा तो बढ़ाती है, पर जीवन कौशल, नैतिकता और मानसिक संतुलन की शिक्षा पीछे छूट जाती है।
  4. तकनीकी और मनोरंजन उद्योग:
    ऐप्स और गेम्स इस तरह डिज़ाइन किए जाते हैं कि उपयोगकर्ता अधिक से अधिक समय स्क्रीन पर बिताए। बच्चों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर पर्याप्त नियंत्रण की आवश्यकता है।

समाधान की दिशा

  • घर में डिजिटल अनुशासन तय किया जाए—स्क्रीन टाइम सीमित हो।
  • बच्चों के साथ खुला संवाद और गुणवत्तापूर्ण समय बिताया जाए।
  • खेल, संगीत, पुस्तकें और रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए।
  • स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा और परामर्श की व्यवस्था हो।
  • नशे के विरुद्ध जागरूकता और सख्त सामाजिक संदेश दिए जाएं।

निष्कर्ष

बचपन राष्ट्र की नींव है। यदि यह नींव ही कमजोर हो जाए तो भविष्य भी डगमगा जाएगा। मोबाइल, नशा और तनाव—ये तीनों मिलकर बच्चों के मन और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाल रहे हैं।

ज़िम्मेदार केवल कोई एक नहीं—परिवार, समाज, शिक्षा व्यवस्था और हम सभी हैं। यदि हम समय रहते सचेत हो जाएं, तो बचपन को फिर से मुस्कुराने का अवसर मिल सकता है।