प्रफुल्ल पलसुलेदेसाई
मुंबई के स्थानीय निकाय चुनाव (बीएमसी) के परिणामों के बीच एक आंकड़ा चुपचाप सतह पर उभर आया है—23 हिंदी भाषी पार्षदों का निर्वाचन। पहली नज़र में यह केवल एक संख्यात्मक उपलब्धि लग सकती है, जिसे चुनावी अंकगणित के शौकीन लोग अपनी डायरियों में दर्ज कर लेंगे। लेकिन यदि महानगर की दशकों पुरानी राजनीति की परतों को उघाड़कर देखा जाए, तो यह आंकड़ा उस ‘मराठी मानुस’ और ‘भूमिपुत्र’ की राजनीति के लिए एक गंभीर विचारणीय बिंदु है, जिस पर इस शहर का पूरा ढांचा खड़ा रहा है। यहाँ रुककर सोचना पड़ता है कि क्या यह केवल एक जनसांख्यिकीय बदलाव का परिणाम है, या यह मुंबई की उस पहचान का नया स्वरूप है, जहाँ अब भाषा और भूगोल की दीवारें राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के सामने ढह रही हैं।
हैरानी की बात यह नहीं है कि 23 हिंदी भाषी पार्षद जीत कर आए हैं; हैरानी इस बात में है कि यह उस शहर में हुआ है जहाँ कभी बाहरी बनाम स्थानीय का मुद्दा चुनावी जीत-हार की सबसे बड़ी गारंटी माना जाता था। मुंबई, जो अपनी बनावट में मिनी-इंडिया है, अक्सर अपनी राजनीति में संकुचित रही है। लेकिन इन परिणामों ने संकेत दिया है कि अब मतदाता केवल प्रतीकों को नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व को चुन रहा है। यहाँ यह प्रश्न सहज नहीं है कि क्या ये 23 चेहरे केवल हिंदी भाषी समाज की नुमाइंदगी कर रहे हैं, या वे उस व्यापक प्रवासी दर्द और उम्मीद के प्रतीक बन गए हैं, जिसे अब नज़रअंदाज़ करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए संभव नहीं रहा।
यहाँ एक संशय बना रहता है कि क्या यह जीत वास्तव में भाषाई सौहार्द का प्रमाण है या केवल चुनावी मजबूरी का? यदि हम पिछले कुछ दशकों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि देखें, तो साठ और अस्सी के दशक की मुंबई एक अलग ही मिजाज़ में थी। तब भाषाई पहचान एक हथियार थी। लेकिन समय के साथ, जब महानगर का आर्थिक भूगोल बदला, तो राजनीतिक समीकरणों को भी झुकना पड़ा। 23 हिंदी भाषियों का सदन में पहुँचना यह दर्शाता है कि अब ‘उत्तर भारतीय’ मतदाता केवल एक ‘वोट बैंक’ नहीं रह गया है जो किसी एक दल की बपौती हो। वह अब स्वयं ‘निर्णायक’ और ‘नेतृत्वकर्ता’ की भूमिका में आने की ललक रखता है।
यह सोचना दिलचस्प है कि इन 23 पार्षदों में से कितने अपनी भाषा की वजह से जीते और कितने अपनी उस कार्यशैली की वजह से, जिसने भाषाई सीमाओं को पार कर लिया। मुंबई के उपनगरों—कांदिवली, मलाड, घाटकोपर या कुर्ला—की गलियों में जब कोई हिंदी भाषी प्रत्याशी मराठी भाषियों के बीच जाकर वोट मांगता है और जीतता है, तो वह एक नई सामाजिक संविदा (Social Contract) लिख रहा होता है। यह उस पुराने नैरेटिव को चुनौती है कि मुंबई केवल एक विशिष्ट भाषाई समूह की जागीर है। पर क्या यह बदलाव बिना किसी तनाव के हुआ है? कहना कठिन है। कई बार ऐसी जीतें सतह के नीचे एक अनकही असुरक्षा को भी जन्म देती हैं, जिसे राजनीतिक दल अक्सर अपनी सुविधा के अनुसार हवा देते हैं।
यहाँ रुककर विश्लेषण करना होगा कि इन विजयी उम्मीदवारों का राजनीतिक वितरण क्या है। यदि वे अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों से आए हैं, तो इसका अर्थ है कि हिंदी भाषी समाज अब राजनीतिक रूप से जागरूक और विभाजित है। वह किसी एक झंडे के नीचे बंधा हुआ नहीं है। लेकिन यदि यह रुझान किसी एक विशिष्ट दल की ओर अधिक है, तो यह मुंबई के ‘शक्ति-संतुलन’ में एक स्थायी बदलाव का संकेत है। यह उस ‘कॉस्मोपॉलिटन’ दावे की परीक्षा है जो मुंबई दुनिया के सामने करती रही है।
एक और आयाम जो अक्सर चर्चा से छूट जाता है, वह है ‘प्रवासी श्रमिक’ से ‘नगर नियंता’ तक का सफर। जो वर्ग कभी शहर की रफ़्तार में केवल ईंधन का काम करता था, वह अब इंजन के केबिन में बैठने की जिद कर रहा है। यह लोकतांत्रिक परिपक्वता का लक्षण है। लेकिन यहाँ एक सूक्ष्म डर भी है—क्या यह भाषाई ध्रुवीकरण को और तेज़ करेगा? क्या भविष्य के चुनावों में हम पार्टियों को ‘मराठी बनाम हिंदी’ के आधार पर टिकट बांटते देखेंगे? यदि ऐसा होता है, तो यह समावेशिता के उस विचार की हार होगी जो इस शहर की आत्मा है।
इतिहास गवाह है कि जब भी किसी बड़े महानगर में प्रतिनिधित्व का ढांचा बदलता है, तो वहां की मूल राजनीतिक संस्कृति में एक प्रकार का घर्षण (Friction) पैदा होता है। न्यूयॉर्क या लंदन के उदाहरण हमारे सामने हैं। मुंबई भी उसी दौर से गुज़र रही है। 23 हिंदी भाषी पार्षदों का होना एक नई वास्तविकता है, जिसे न तो खारिज किया जा सकता है और न ही केवल उत्सव की तरह मनाया जाना चाहिए। इसे उस चश्मे से देखने की ज़रूरत है जहाँ विकास और नागरिक सुविधाएँ भाषा के मोहताज न हों।
अंतिम प्रश्न तो यह है कि क्या ये 23 पार्षद बीएमसी के उस विशाल और जटिल तंत्र में अपनी स्वतंत्र पहचान बना पाएंगे? क्या वे उन संकरी गलियों और चॉलों की आवाज़ बन पाएंगे जहाँ से वे निकलकर आए हैं, या वे भी उसी सत्ता-तंत्र का हिस्सा बन जाएंगे जहाँ भाषा केवल चुनावी रैलियों का आभूषण बनकर रह जाती है?
मुंबई अब उस मोड़ पर है जहाँ उसके ‘उत्तर’ की धड़कनें ‘पश्चिम’ के तट पर उतनी ही स्पष्ट सुनाई दे रही हैं जितनी कभी स्थानीय मराठी गौरव की गूंज हुआ करती थी। यह एक हाइब्रिड पहचान का उदय है। पर क्या यह नई पहचान मुंबई को और अधिक उदार बनाएगी या इसे छोटे-छोटे भाषाई टापुओं में बांट देगी? इसका उत्तर शायद इन 23 पार्षदों के अगले पांच साल के कामकाज और सदन में उनके आचरण में छिपा है। फिलहाल, मुंबई ने एक नया रास्ता चुना है, लेकिन वह रास्ता किधर ले जाएगा, यह अभी भी एक अनसुलझी पहेली है।
मुंबई के राजनीतिक भूगोल में आए इस बदलाव को और गहराई से समझने के लिए हमें उन ‘चुनावी घोषणापत्रों’ और ‘वार्ड-स्तरीय संवेदनशीलता’ की परतों को उघाड़ना होगा, जहाँ अब शब्दों का चयन केवल वोट पाने के लिए नहीं, बल्कि अस्तित्व बचाने के लिए किया जा रहा है।
यहाँ रुककर सोचना पड़ता है कि आने वाले समय में राजनीतिक दल अपने ‘घोषणापत्र’ (Manifesto) कैसे तैयार करेंगे? अब तक की परिपाटी यह रही है कि पार्टियाँ एक ‘मराठी संस्करण’ निकालती थीं और औपचारिकता के लिए उसका हिंदी अनुवाद कर दिया जाता था। लेकिन अब 23 हिंदी भाषी पार्षदों की मौजूदगी यह संकेत दे रही है कि आने वाले समय में घोषणापत्र केवल अनूदित नहीं होंगे, बल्कि उन्हें ‘सांस्कृतिक रूप से रि-डिजाइन’ करना होगा।
घोषणापत्रों का नया व्याकरण: प्रतीकों की होड़
आने वाले चुनावों में हम देखेंगे कि राजनीतिक दल अब केवल ‘विकास’ की बात नहीं करेंगे, बल्कि वे ‘प्रतीकों के संतुलन’ का एक नया खेल खेलेंगे। जहाँ एक ओर छत्रपति शिवाजी महाराज और बाला साहेब ठाकरे का संदर्भ अनिवार्य होगा, वहीं दूसरी ओर छठ पूजा, उत्तर भारतीय तीज-त्योहारों और भाषाई गौरव को भी समान स्थान देना होगा। यह प्रश्न सहज नहीं है—क्या यह सांस्कृतिक समावेशिता है या केवल चुनावी पाखंड?
हैरानी की बात यह नहीं है कि घोषणापत्रों में हिंदी का प्रयोग बढ़ेगा; हैरानी इस बात में होगी कि कैसे कट्टर क्षेत्रीय दल अपनी ‘भूमिपुत्र’ वाली छवि को बचाते हुए इस नए मतदाता वर्ग को अपने साथ जोड़ेंगे। शायद आने वाले समय में घोषणापत्र ‘द्विभाषी’ (Bilingual) होने के बजाय ‘द्वि-सांस्कृतिक’ (Bi-cultural) हो जाएं, जहाँ मुंबई के कोलीवाड़ों की समस्याओं के ठीक बगल में उन बस्तियों की समस्याओं का जिक्र हो जहाँ की मुख्य भाषा हिंदी या उसकी उपबोलियाँ हैं।
वार्ड-स्तरीय संवेदनशीलता: एक नया माइक्रो-मैनेजमेंट
मुंबई के उन खास वार्डों को देखिए—जैसे मलाड का मालवानी, उपनगरों के मानखुर्द-गोवंडी बेल्ट, या मुलुंड और कांदिवली के हिस्से। यहाँ भाषाई संतुलन इतना नाजुक है कि एक छोटा सा बयान भी पूरे समीकरण को बिगाड़ सकता है। इन 23 पार्षदों की जीत ने यह साबित किया है कि अब ‘लोकल बॉडी’ चुनावों में माइक्रो-मैनेजमेंट का दौर शुरू हो चुका है।
यहाँ एक संशय बना रहता है: क्या यह भाषाई प्रतिनिधित्व विकास के कार्यों में बाधक बनेगा? अक्सर देखा गया है कि जब पार्षद किसी विशिष्ट भाषाई आधार पर जीतता है, तो उसका ध्यान केवल अपने ‘समूह’ तक सीमित हो जाता है। यदि कुर्ला या घाटकोपर का कोई पार्षद केवल ‘हिंदी भाषियों का नेता’ बनकर रह गया, तो उस वार्ड का जो मूल मराठी या अन्य भाषाई ढांचा है, वह खुद को उपेक्षित महसूस करने लगेगा। यह ‘असुरक्षा’ मुंबई के सामाजिक ताने-बाने के लिए सबसे बड़ा जोखिम है।
सत्ता का नया ‘पावर सेंटर’
बीएमसी के गलियारों में अब तक ‘मराठी’ वह भाषा थी जिसमें निर्णय लिए जाते थे और आदेश दिए जाते थे। लेकिन अब सदन के भीतर और स्थायी समितियों (Standing Committees) में हिंदी भाषी पार्षदों की बढ़ती संख्या भाषा के इस पदानुक्रम (Hierarchy) को चुनौती देगी। यह सोचना दिलचस्प है कि क्या भविष्य में बीएमसी की कार्यवाही में हिंदी को वह आधिकारिक दर्जा मिल पाएगा जो अब तक केवल अनौपचारिक था?
यह बदलाव केवल संख्या बल का नहीं है, यह उस ‘पूंजी’ और ‘श्रम’ के राजनीतिकरण का है जो हिंदी भाषी समाज दशकों से मुंबई को दे रहा है। लेकिन यहाँ एक गंभीर प्रश्न उठता है—क्या ये 23 पार्षद वास्तव में अपनी स्वतंत्र वैचारिकता का उपयोग करेंगे, या वे अपनी-अपनी पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व के हाथों की कठपुतली बनकर रह जाएंगे? यदि वे केवल ‘रबर स्टैम्प’ बने रहते हैं, तो यह संख्या मात्र एक सांख्यिकीय भ्रम (Statistical Illusion) बनकर रह जाएगी।
समावेशिता बनाम पहचान का संकट
आने वाले वर्षों में मुंबई की राजनीति का सबसे बड़ा तनाव ‘समावेशिता’ और ‘पहचान’ के बीच होगा। राजनीतिक दलों के लिए चुनौती यह होगी कि वे कैसे एक ‘हिंदी भाषी’ को टिकट दें बिना अपने ‘मराठी’ आधार को नाराज किए। यह संतुलन साधना एक कसरती खेल की तरह है।
शायद आने वाला दौर ‘हाइब्रिड राजनीति’ का होगा, जहाँ नेता का नाम और भाषा भले ही उत्तर भारतीय हो, लेकिन उसका राजनीतिक व्यवहार और प्रतिबद्धता पूरी तरह ‘मुंबईकर’ वाली होगी। यह उस पुराने नैरेटिव की विदाई होगी जिसमें कहा जाता था कि “उत्तर भारतीय केवल पैसा कमाने आते हैं और वोट डालकर चले जाते हैं।” अब वे ठहर रहे हैं, वे शासन कर रहे हैं, और वे नियम बना रहे हैं।
मुंबई ने हमेशा से खुद को बदला है। 23 हिंदी भाषी पार्षदों का निर्वाचन इस महानगर के निरंतर बदलते डीएनए का एक नया अध्याय है। यह अध्याय गौरव का होगा या संघर्ष का, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि ये प्रतिनिधि स्वयं को ‘हिंदी भाषियों का पार्षद’ मानते हैं या ‘मुंबई का पार्षद’।
अंत में, यह प्रश्न खुला रह जाता है कि क्या आने वाली बीएमसी रिपोर्टों में हम केवल सड़कों और गटरों के निर्माण का हिसाब देखेंगे, या हम एक ऐसी नई राजनीतिक संस्कृति का उदय देखेंगे जहाँ भाषा अब विभाजन का जरिया नहीं, बल्कि संवाद का सेतु बन चुकी होगी? फिलहाल तो, मुंबई की सत्ता की चाबी उन हाथों में भी पहुँच चुकी है जिनकी लकीरें उत्तर के मैदानों से शुरू होकर अरब सागर के किनारों पर खत्म होती हैं। और यह हकीकत अब किसी भी घोषणापत्र की सबसे पहली पंक्ति होगी।





