“विकसित भारत @2047” के लिए संस्थागत वाद-प्रबंधन सुदृढ़ करने पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित

National Conference on Strengthening Institutional Debate Management for a “Developed India @2047” Held

प्रमोद शर्मा

नई दिल्ली : “विकसित भारत @2047 के लिए संस्थागत वाद-प्रबंधन को सशक्त बनाना” विषय पर सरकारी मुकदमों के कुशल एवं प्रभावी प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन आज Bharat Mandapam में किया गया। कार्यक्रम में केंद्र सरकार के सचिवों, वरिष्ठ अधिकारियों, विधि अधिकारियों और विभिन्न मंत्रालयों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

सम्मेलन में केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) Arjun Ram Meghwal की गरिमामयी उपस्थिति रही। इस अवसर पर कैबिनेट सचिव T. V. Somanathan, भारत के अटॉर्नी जनरल R. Venkataramani, सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta, न्याय विभाग के सचिव Niraj Verma तथा विधि कार्य विभाग के सचिव Rajiv Mani भी उपस्थित रहे।

चार प्रमुख विषयों पर मंथन

सम्मेलन में मुकदमेबाजी की वर्तमान स्थिति और चुनौतियों पर चार प्रमुख क्षेत्रों में चर्चा की गई—

  • सेवा, पेंशन एवं रोजगार संबंधी मामले
  • इंफ्रास्ट्रक्चर, मुआवजा एवं अनुबंध विवाद
  • राजकोषीय, कर एवं राजस्व मामले
  • नियामक, प्रवर्तन एवं अनुपालन संबंधी मुकदमे

चर्चा के दौरान यह सामने आया कि सेवा मामलों में एकरूपता के अभाव और समय पर निर्णय लागू न होने से अनावश्यक एवं दोहराव वाले मुकदमे बढ़ रहे हैं। विभिन्न मंत्रालयों द्वारा अलग-अलग कानूनी रुख अपनाने तथा अपील दायर करने की प्रवृत्ति को “डिफॉल्ट प्रतिक्रिया” के रूप में अपनाने पर भी चिंता व्यक्त की गई।

अवसंरचना एवं मुआवजा मामलों पर विशेष जोर

इंफ्रास्ट्रक्चर और भूमि मुआवजा मामलों में बढ़ती ब्याज देनदारियों तथा मध्यस्थता निर्णयों को नियमित रूप से चुनौती देने की प्रवृत्ति पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि ऐसे मामलों में वित्तीय जोखिम का पूर्व आकलन किया जाए और केवल महत्वपूर्ण कानूनी या वित्तीय प्रभाव वाले मामलों में ही अपील दायर की जाए।

प्रमुख सिफारिशें

  • सम्मेलन में मुकदमों को कम करने और समयबद्ध निपटान सुनिश्चित करने के लिए कई सुझाव दिए गए—
  • अपील दायर करने के लिए स्पष्ट एवं सुसंगत मानदंड तय किए जाएँ।
  • प्रत्येक मंत्रालय में मुकदमों के समन्वित प्रबंधन हेतु एक नामित अधिकारी नियुक्त किया जाए।
  • न्यायालय के आदेशों का समयबद्ध अनुपालन सुनिश्चित किया जाए, ताकि अवमानना और पुनरावृत्ति वाले मामलों में कमी आए।
  • भूमि एवं अवसंरचना विवादों में पूर्व-विवाद मध्यस्थता (ADR) को संस्थागत रूप दिया जाए।
  • उच्च-मूल्य अनुबंध संबंधी निर्णयों में अनिवार्य विधिक परीक्षण (लीगल वेटिंग) किया जाए।

जिम्मेदार मुकदमेबाजी की प्रतिबद्धता

सम्मेलन ने यह पुनः स्पष्ट किया कि भारत सरकार जिम्मेदार और अनुशासित मुकदमेबाजी को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। अनावश्यक मुकदमों में कमी, समयबद्ध कार्रवाई और वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र को मजबूत करना सरकार की प्राथमिकता है।

यह पहल न केवल न्यायिक प्रणाली पर भार कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि “विकसित भारत @2047” के लक्ष्य की प्राप्ति और सुशासन को सुदृढ़ करने की दिशा में भी एक ठोस कदम मानी जा रही है।