डॉ विजय गर्ग
समाज की सभ्यता और संवेदनशीलता का सबसे सटीक पैमाना यह है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है। जिन्होंने जीवन भर परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण में योगदान दिया, वही लोग आज अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर उपेक्षा, अकेलेपन और असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। बदलती जीवनशैली, शहरीकरण और पारिवारिक संरचना में आए बदलावों ने बुजुर्गों की स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
बदलती पारिवारिक संरचना और बढ़ती दूरी
संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों ने ले ली है। युवा रोजगार और शिक्षा के कारण बड़े शहरों या विदेशों की ओर पलायन कर रहे हैं। परिणामस्वरूप, माता-पिता गाँवों या पुराने घरों में अकेले रह जाते हैं। तकनीकी रूप से जुड़े होने के बावजूद भावनात्मक दूरी बढ़ रही है। यह दूरी केवल भौतिक नहीं बल्कि मानसिक और सामाजिक भी है।
उपेक्षा के रूप
बुजुर्गों की उपेक्षा कई रूपों में दिखाई देती है—
- भावनात्मक उपेक्षा: उनसे बातचीत न करना, उनकी राय को महत्व न देना।
- आर्थिक उपेक्षा: उनकी आय या पेंशन पर निर्भर रहना, लेकिन उनकी आवश्यकताओं की अनदेखी करना।
- स्वास्थ्य उपेक्षा: नियमित स्वास्थ्य जांच और देखभाल की कमी।
- सामाजिक अलगाव: उन्हें निर्णयों और सामाजिक गतिविधियों से दूर रखना।
ऐसी उपेक्षा उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाती है और मानसिक अवसाद, चिंता तथा असुरक्षा की भावना को जन्म देती है।
सुरक्षा का बढ़ता संकट
अकेले रहने वाले बुजुर्ग अपराधियों के आसान निशाने बनते जा रहे हैं। धोखाधड़ी, चोरी, संपत्ति हड़पने के प्रयास और घरेलू हिंसा जैसी घटनाएँ बढ़ रही हैं। डिजिटल युग में ऑनलाइन ठगी भी एक नई चुनौती बनकर उभरी है, जिसमें बुजुर्ग अक्सर जागरूकता के अभाव में फँस जाते हैं।
सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव
उपेक्षा और असुरक्षा का बुजुर्गों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है। अकेलापन अवसाद, स्मृति समस्याओं और जीवन के प्रति निराशा को जन्म दे सकता है। उन्हें यह महसूस होने लगता है कि वे परिवार और समाज पर बोझ हैं, जबकि वास्तव में वे अनुभव और ज्ञान के अनमोल भंडार होते हैं।
समाधान की दिशा में कदम
- पारिवारिक संवेदनशीलता बढ़ाना
परिवार के सदस्यों को बुजुर्गों के साथ समय बिताना चाहिए, उनकी बात सुननी चाहिए और निर्णयों में उन्हें शामिल करना चाहिए। - सामुदायिक सहयोग तंत्र
स्थानीय स्तर पर वरिष्ठ नागरिक समूह, दिन देखभाल केंद्र और सामुदायिक कार्यक्रम बुजुर्गों को सामाजिक रूप से सक्रिय बनाए रख सकते हैं। - स्वास्थ्य और सुरक्षा व्यवस्था
नियमित स्वास्थ्य जांच, आपातकालीन संपर्क व्यवस्था, और सुरक्षा अलार्म प्रणाली उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है। - कानूनी जागरूकता
भारत में वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए कानून और योजनाएँ उपलब्ध हैं। इनके प्रति जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है ताकि बुजुर्ग अपने अधिकारों का उपयोग कर सकें। - डिजिटल साक्षरता
बुजुर्गों को मोबाइल और इंटरनेट के सुरक्षित उपयोग का प्रशिक्षण देकर उन्हें ऑनलाइन ठगी से बचाया जा सकता है।
निष्कर्ष
बुजुर्ग केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की धरोहर हैं। उनकी उपेक्षा केवल मानवीय संवेदनाओं का ह्रास नहीं बल्कि सामाजिक मूल्यों के पतन का संकेत है। यदि हम एक संवेदनशील और संतुलित समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें बुजुर्गों को सम्मान, सुरक्षा और प्रेम देना होगा।
उनकी मुस्कान और आशीर्वाद ही किसी भी सभ्य समाज की सच्ची पहचान हैं।





