
डॉ. राजाराम त्रिपाठी
(पर्यावरण, कृषि व ग्रामीण अर्थशास्त्र विशेषज्ञ)
- काली-मिर्च क्रांति:छत्तीसगढ़ से वैश्विक बाजार तक,
- सिंधु घाटी सभ्यता में मिले हैं काली-मिर्च के अवशेष, आर्य द्रविड़ थ्योरी पर उठे सवाल
- लंदन और यूरोपीय बाजारों में सोने के भाव बिकती थी भारत की काली मिर्च।
- डॉलर,यूरो तथा रुपए की करेंसी की तरह भी होता था काली-मिर्च का उपयोग,
- कैंसर के इलाज में ‘हरी काली मिर्च’ है जबरदस्त तरीके से लाभकारी,
काली मिर्च, जिसे ‘ब्लैक गोल्ड’, काला सोना अथवा काला-मोती जैसे नामों से भी जाना जाता है, प्राचीन काल से भारत की शान रही है। इसका मूल निवास मलाबार तट को माना जाता है। काली मिर्च के भौतिक अवशेष सिंधु घाटी सभ्यता में भी मिले हैं, इससे आर्य-द्रविड़ सभ्यता तथा परस्पर संघर्ष की बड़े जतन से स्थापित थ्योरी ही चरमरा गई है। प्राच्य वांग्मय में विशेष कर आयुर्वेद में इसके महत्व तथा विभिन्न प्रकार के उपयोगों का वर्णन प्राप्त हुए हैं।
शायद आपको यह जानकर हैरानी हो कि काली-मिर्च का इस्तेमाल पहले करेंसी के तौर पर भी किया जाता रहा है। एक दौर ऐसा भी था जब भारत की काली मिर्च लंदन तथा यूरोपीय बाजारों में सोने के भाव बिकती थी।
काली मिर्च न केवल मसाले के रूप में बल्कि अनमोल औषधीय गुणों के कारण भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके तीखे स्वाद और सुगंध से भोजन का स्वाद बढ़ता है, वहीं यह पाचन तंत्र को मजबूत करती है, सर्दी-खांसी, गले की खराश और श्वसन झंझट झोंककरसंबंधी समस्याओं में राहत देती है। आयुर्वेद में इसे “मारिच” कहा जाता है और यह वात, कफ और पित्त दोषों को संतुलित करने में सहायक है। आधुनिक शोधों में इसे एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-बैक्टीरियल गुणों से भरपूर पाया गया है, जिससे यह प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करती है। इसके अलावा, काली मिर्च का उपयोग त्वचा की समस्याओं, वजन नियंत्रण, और मधुमेह प्रबंधन में भी किया जाता है। हाल ही में अब तक लाइलाज कैंसर के इलाज में जैविक हरी काली-मिर्च को अत्यंत प्रभावकारी पाया गया है।
सदियों सदियों तक दक्षिण भारत, विशेषकर केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु, इसकी खेती और वैश्विक व्यापार का प्रमुख केंद्र रहा है। लेकिन जलवायु परिवर्तन, रोग-कीट, बाढ़ और बाजार के उतार-चढ़ाव ने केरल जैसे पारंपरिक उत्पादक क्षेत्रों में उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित किया है। पिछले एक दशक में केरल में काली मिर्च की खेती में 15% की गिरावट आई, और उत्पादन में 25% की कमी देखी गई। इससे भारत का वैश्विक बाजार में दबदबा कमजोर हुआ है।
ऐसे समय में, छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के कोंडागांव क्षेत्र में विकसित “दंतेश्वरी काली मिर्च-16” (MDBP-16) ने काली मिर्च उत्पादन में एक नई क्रांति ला दी है। डॉ. राजाराम त्रिपाठी के नेतृत्व में 30 वर्षों के अथक परिश्रम और अनुसंधान का परिणाम यह उन्नत किस्म MDBP-16 है, जिसे 2024 में भारत-सरकार द्वारा पंजीकृत और मान्यता प्राप्त हुई। यह किस्म सूखे और कठोर परिस्थितियों में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन करती है, जिससे कम पानी वाले क्षेत्रों में काली मिर्च की खेती का सपना साकार हो रहा है।
MDBP-16 की एक विशेषता यह है कि यह परंपरागत किस्मों की तुलना में चार गुना अधिक उपज देती है। यह न केवल रोग-प्रतिरोधी है बल्कि इसकी उच्च गुणवत्ता और सुगंध वैश्विक बाजार में भारतीय काली मिर्च की पहचान को पुनर्स्थापित कर रही है।
डॉ. त्रिपाठी द्वारा विकसित “नेचुरल ग्रीनहाउस” मॉडल किसानों के लिए वरदान साबित हो रहा है। यह मॉडल पारंपरिक 40 लाख से तैयार होने वाले एक एकड़ की पॉलीहाउस की तुलना में केवल ₹2 लागत पर प्राकृतिक रूप से पौधों को अनुकूल पर्यावरण प्रदान करता है। पेड़ों से बने इस ग्रीनहाउस का उपयोग वर्टिकल फार्मिंग के लिए भी किया जा रहा है, जिसमें ऑस्ट्रेलियन टीक के पेड़ों पर 50 फीट की ऊंचाई तक काली मिर्च उगाई जाती है। यह तकनीक छोटे किसानों को एक एकड़ भूमि में 50 एकड़ के बराबर उत्पादन देने में सक्षम बनाती है, जिससे उनकी आय कई गुना बढ़ सकती है।
वर्तमान में MDBP-16 का उत्पादन मध्य भारत, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, झारखंड, हरियाणा और पंजाब के किसानों के लिए उपलब्ध है। यह किस्म भारत के मसाला क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है, जिससे भारत पुनः काली मिर्च का वैश्विक राजा बन सकता है।
भारत में 2024-25 के लिए काली मिर्च का कुल उत्पादन 78,000 टन अनुमानित है, लेकिन यदि MDBP-16 जैसी उन्नत किस्में व्यापक रूप से अपनाई जाती हैं, तो यह आंकड़ा कई गुना बढ़ सकता है।
छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र, जो 44% जंगलों से आच्छादित है, काली मिर्च की खेती के लिए प्राकृतिक रूप से अनुकूल है। यह क्षेत्र न केवल मसालों की खेती के लिए उपयुक्त है बल्कि औषधीय पौधों और हर्बल उत्पादों का भी केंद्र बन सकता है। भारत के कृषि परिदृश्य में छत्तीसगढ़ का यह योगदान भारतीय मसालों की श्रेष्ठता और विविधता को वैश्विक बाजार में पुनः स्थापित करेगा।
डॉ. राजाराम त्रिपाठी का सपना है कि भारत के किसान उच्च गुणवत्ता वाली काली मिर्च का उत्पादन करें और दुनिया के बाजारों में इसकी धाक जमाएं। MDBP-16 ने यह सिद्ध कर दिया है कि परंपरागत सीमाओं को पार कर नवाचार, अनुसंधान और प्रतिबद्धता से भारत फिर से काली मिर्च के वैश्विक व्यापार का नेतृत्व कर सकता है। अंत में हम कह सकते हैं की भारत के फिर से सोने की चिड़िया कहलाने और विश्व गुरु बनने का रास्ता काली-मिर्च तथा मसालों एवं जड़ी बूटियों की खेतों से होकर ही जाता है।