सुनील कुमार महला
भूकंप की दृष्टि से हमारा देश बहुत ही संवेदनशील क्षेत्र में आता है।इस क्रम में, भारत ने हाल ही में अपना नया राष्ट्रीय भूकंप जोन मैप जारी किया है।इसके तहत अब पूरे हिमालयी क्षेत्र (जम्मू-कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक) को पहली बार सबसे उच्च जोखिम-जोन- जोन-VI में रखा गया है, क्योंकि भूवैज्ञानिक विश्लेषण और प्लेट टेक्टोनिक्स (जहाँ भारतीय प्लेट लगातार यूरेशियाई प्लेट से 5 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष टकरा रही है) यह दिखाते हैं कि हिमालय में दबाव और भू-स्खलन की संभावना सबसे ज्यादा है।सरल शब्दों में कहें तो हिमालय दुनिया का सबसे ऊँचा और सक्रिय नवीन वलित पर्वत या यूं कहें कि विश्व के सबसे सक्रिय टकराव क्षेत्रों (कोलिजन जोन्स) में से एक है, जो भारतीय और यूरेशियन प्लेटों के अभिसरण (~5 सेमी/वर्ष) के कारण निर्मित हुआ है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि नवीन वलित पर्वत वे पर्वत होते हैं,जो टेक्टॉनिक प्लेटों के हाल के टकराव से धरती की परतों के मुड़कर (वलित होकर) ऊपर उठने से बनते हैं तथा जो भूगर्भीय दृष्टि से अपेक्षाकृत नए, ऊँचे व तीखे रूप में दिखाई देते हैं। गौरतलब है कि नवीन वलित पर्वत दुनिया के सबसे ख़तरनाक क्षेत्रों में माने जाते हैं, क्यों कि यहां दो या अधिक टेक्टॉनिक प्लेटें आपस में लगातार टकराने से यहाँ धरती की परतें हमेशा दबाव में रहती हैं और प्राकृतिक खतरों की संभावना बहुत अधिक रहती है। हाल फिलहाल, नये भूकंप मानचित्र के बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि यह नया भूकंप मानचित्र सिर्फ एक तकनीकी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक तरह से एक राष्ट्रीय चेतावनी है। बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि साल 2025 के नए भूकंप डिज़ाइन कोड में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि पूरा हिमालय क्षेत्र अब ज़ोन–VI में रखा गया है, यानी इसे सबसे खतरनाक भूकंप क्षेत्र माना गया है। गौरतलब है कि पुराने मानचित्रों में हिमालय को जोन IV और V में बांटा गया था, लेकिन वास्तविकता में पूरा हिमालयी बेल्ट समान रूप से गंभीर जोखिम वाला है। वास्तव में, नए मानचित्र में उल्लेख है कि भूकंपीय विक्षोभ अब हिमालयन फ्रंटल थ्रस्ट के दक्षिण तक पहुँच सकता है। मोहंड(उत्तराखंड) के पास से शुरू होने वाला यह क्षेत्र अब उच्च जोखिम श्रेणी में है। इसका मतलब है कि गंगा के मैदानी इलाके के कई हिस्से अब पहले की तुलना में अधिक खतरे में हैं। वास्तव में, पहली बार पूरे हिमालय को एक ही उच्च जोखिम वाले ज़ोन में शामिल किया गया है। इसका मतलब साफ है कि भविष्य में इमारतें, सड़कें और शहरी नियोजन या यूं कहें कि अस्पताल, विद्यालय, पुल, पाइपलाइन और अन्य महत्वपूर्ण संरचनाएँ तैयार करने के लिए पहले से कहीं ज्यादा सावधानी और मजबूत योजनाओं की जरूरत होगी।टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इंडिया अर्थक्वेक ज़ोनिंग मैप-2025 दिखाता है कि अब भारत का करीब 61% भूभाग मध्यम से लेकर बहुत ज्यादा भूकंप-प्रभावित श्रेणी में आता है। राहत की बात यह है कि इस बार मानचित्र पुराने आंकड़ों पर नहीं, बल्कि वर्तमान भू-विज्ञान, धरती की हलचलों और नई वैज्ञानिक स्टडी पर आधारित है। इसलिए इसे कई दशकों में सबसे बड़ा और सबसे आधुनिक सुधार माना जा रहा है। दरअसल,भारतीय मानक ब्यूरो ने नया भूकंप ज़ोनिंग मानचित्र पीएसएचए यानी प्रोबैबिलिस्टिक सीस्मिक हैज़र्ड असेसमेंट मॉडल (संभाव्य भूकंपीय खतरा आकलन) से बनाया है। इसमें जमीन की परतों की मोटाई, प्लेटों के टकराव, फॉल्ट लाइन की गतिविधि, भूकंपीय तरंगों की गति और संभावित अधिकतम भूकंप जैसे कई वैज्ञानिक डेटा का उपयोग किया गया है। इसलिए यह नया मानचित्र पुराने मानचित्रों की तुलना में ज्यादा भरोसेमंद और आधुनिक माना जाता है। यह बात ठीक है कि हिमालय बाहर से शांत दिखता है, लेकिन उसके अंदर लगातार ज़ोरदार भूगर्भीय दबाव बना हुआ है। वहां की फॉल्ट लाइनों यानी कि तीन बड़ी दरारों (फॉल्ट) क्रमशः मेन फ्रंटल थ्रस्ट, मेन बाउंड्री थ्रस्ट तथा मेन सेंट्रल थ्रस्ट, जहां पिछले दो सौ सालों में कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है, में अब बड़े भूकंप लाने की ताकत है, जैसा कि वहां अब बहुत सारा दबाव जमा हो चुका है।इसी कारण पूरे हिमालय क्षेत्र को सबसे अधिक भूकंप-जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो हिमालय अब सबसे खतरनाक जोन VI में शामिल किया गया है। पाठकों को बताता चलूं कि ,हिमालय पृथ्वी की सबसे तेज टकराने वाली दो प्लेटों के बीच में है, और भारतीय प्लेट हर साल 5 सेंटीमीटर उत्तर की ओर धकेल रही है। इससे जमीन के अंदर बहुत दबाव बन रहा है।जब यह दबाव अचानक निकलता है, तो बहुत बड़ा भूकंप आता है। इस बार मानचित्र में एक नया प्रावधान भी जोड़ा गया है, जिसके अनुसार अगर कोई शहर दो भूकंपीय ज़ोन की सीमा के पास आता है, तो उसे खुद उच्च श्रेणी वाले ज़ोन में माना जाएगा।इससे कई ऐसे शहर, जो पहले कम जोखिम में समझे जाते थे, अब अधिक संवेदनशील क्षेत्रों की सूची में आ गए हैं। गौरतलब है कि नए भूकंप डिज़ाइन कोड 2025 के लागू होने के बाद सभी नई इमारतों को सख्त भूकंप-रोधी नियमों के तहत बनाना अनिवार्य होगा, ताकि अस्पताल, स्कूल, पुल और अहम ढाँचे बड़े भूकंप में भी काम करते रहें। इसमें भारी उपकरणों की सुरक्षित फिटिंग और भवनों की मजबूती पर विशेष जोर दिया गया है। अब भूकंप का जोखिम सिर्फ धरती कितनी तेज हिल सकती है, इससे ही नहीं तय होगा। इसके साथ यह भी देखा जाएगा कि किसी इलाके में कितनी आबादी रहती है, वहां की अर्थव्यवस्था कितनी महत्वपूर्ण है, इमारतें कितनी पास-पास और कितनी मजबूत हैं, और वह क्षेत्र कितना संवेदनशील है।कुल मिलाकर, भूकंप आने पर वहां कितना नुकसान हो सकता है, इसकी पूरी तस्वीर देखकर खतरे का स्तर तय किया जाएगा। इससे हर शहर के लिए बनाया गया भूकंप-मानचित्र पहले से ज्यादा सटीक, व्यावहारिक और भरोसेमंद होगा। दक्षिण भारत में बदलाव इसलिए कम हैं क्योंकि यह प्रायद्वीपीय इलाका भूगर्भीय रूप से स्थिर माना जाता है और यहां बड़े भूकंप की संभावना अपेक्षाकृत कम होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो अब उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, अरुणाचल और पूर्वोत्तर के सारे पहाड़ी इलाके सबसे ज्यादा खतरे में हैं। दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर), गुजरात (कच्छ), बिहार-नेपाल बॉर्डर भी ऊंचे खतरे में हैं, तथा दक्षिण भारत का कुछ हिस्सा ही कम खतरे में बचा है।इस आलेख में ऊपर चर्चा कर चुका हूं कि भारत के नए भूकंपीय मानचित्र के अनुसार हिमालय क्षेत्र को अब सबसे खतरनाक जोन-6 में रखा गया है, जबकि पहले यह चौथे और पाँचवें जोन में आता था। इसका मतलब है कि यहां बड़े भूकंप का खतरा पहले से ज्यादा माना जा रहा है। भारतीय प्लेट लगातार उत्तर की ओर बढ़कर यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है, जिससे हिमालय की ऊँचाई बढ़ती है और धरती के भीतर दबाव जमा होता है और यही दबाव जब टूटता है, तो भूकंप आता है। नए आकलन के आधार पर अब भारत का लगभग 61% हिस्सा मध्यम से गंभीर भूकंप-जोखिम वाले क्षेत्रों में शामिल हो गया है। पहले जोखिम का आकलन पुराने भूकंपों और सामान्य भूवैज्ञानिक जानकारी पर आधारित था, जबकि नई ज़ोनिंग में भूमिगत भ्रंश लाइनों, संभावित अधिकतम भूकंप और जमीन की वास्तविक स्थिति का वैज्ञानिक रूप से मूल्यांकन किया गया है, इसलिए इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। शायद यही कारण है कि अब इंजीनियरों, नगर-योजकों और सरकार को सलाह दी गई है कि वे पुराने (2016) मानचित्र की जगह नए (2025) मानचित्र के अनुसार ही निर्माण करें। अस्पताल, स्कूल, पुल, पाइपलाइन और अन्य महत्वपूर्ण ढाँचे इस तरह से बनाए जाएँ कि बड़े भूकंप के बाद भी काम करते रहें,क्योंकि आबादी का लगभग 75% हिस्सा संवेदनशील क्षेत्रों में रहता है, इसलिए शहरों की योजना, भवन निर्माण और बसावट के तरीके बदलना अब बहुत जरूरी हो गया है, ताकि भविष्य में जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। अंत में यही कहूंगा कि भूकंप प्रकृति की ऐसी शक्ति है जिस पर हमारा नियंत्रण नहीं, लेकिन वैज्ञानिक प्रगति ने जमीन की वास्तविक स्थिति को समझने और खतरे का बेहतर अनुमान लगाने की क्षमता जरूर बढ़ा दी है। भूकंप कब आएगा, यह बताना आज भी संभव नहीं, पर सावधानी और तैयारी से बड़े नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है। इसलिए वैज्ञानिक आकलन पर भरोसा रखते हुए मजबूत निर्माण, जागरूकता और एहतियाती कदम ही हमारी सबसे बड़ी सुरक्षा हैं। प्रकृति को समझकर, उसके साथ तालमेल रखते हुए ही मनुष्य सुरक्षित और संतुलित विकास की राह पर आगे बढ़ सकता है।





