प्रफुल्ल पलसुलेदेसाई
यह केवल शिक्षा का प्रश्न नहीं रह जाता—यह सत्ता, दिशा और भविष्य की परिभाषा का प्रश्न बन जाता है। जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग जैसे नियामक संस्थान अपनी नियम-पुस्तिकाएँ पलटते हैं, तो वे सिर्फ पाठ्यक्रम नहीं बदलते; वे चुपचाप यह तय करते हैं कि कौन सोचेगा, कैसे सोचेगा और किन सीमाओं के भीतर सोचेगा। कक्षा की चारदीवारी से बाहर, ये निर्णय समाज की बौद्धिक रीढ़ पर दबाव डालते हैं—कभी उसे सीधा करने के नाम पर, कभी उसे अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ने के लिए। शिक्षा तब राष्ट्र की रीढ़ कम और नीतियों का उपकरण अधिक बन जाती है।
हाल के वर्षों में यूजीसी द्वारा पेश किए गए नए नियम—चाहे वे प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस (PoP) की नियुक्ति हो, एफएचई (विदेशी उच्च शिक्षा संस्थान) का भारत में प्रवेश हो, या फिर फैकल्टी भर्ती के संशोधित मानक—अकादमिक गलियारों से निकलकर राजनीतिक अखाड़े का हिस्सा बन गए हैं। यह विवाद केवल ‘शिक्षा की गुणवत्ता’ का नहीं है, बल्कि यह ‘शिक्षा पर नियंत्रण’ और ‘विचारधारा के वर्चस्व’ की उस लड़ाई का विस्तार है, जहाँ सत्ता और स्वायत्तता आमने‑सामने खड़ी हैं।
इस पूरे विवाद के केंद्र में यह भ्रम बार‑बार लौटता है कि यूजीसी ने आखिर जुड़ा क्या है। नए विनियम किसी अमूर्त नैतिक अपील तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्होंने उच्च शिक्षा संस्थानों के रोज़मर्रा के प्रशासन में कुछ ठोस हस्तक्षेप किए हैं। सबसे पहला बदलाव यह है कि अब जातिगत भेदभाव की शिकायत का अधिकार केवल अनुसूचित जाति और जनजाति तक सीमित नहीं रहा। अन्य पिछड़ा वर्ग को भी औपचारिक रूप से इसी श्रेणी में शामिल किया गया है, जिससे शिकायत का दायरा और संस्थागत निगरानी—दोनों विस्तृत हो गए हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण जोड़ ‘समान अवसर केंद्र’ और ‘समता समिति’ की अनिवार्यता है। हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में इन संरचनाओं का गठन अब वैकल्पिक नहीं रहा। ये समितियाँ केवल परामर्शी निकाय नहीं हैं; इन्हें निगरानी, जाँच और रिपोर्टिंग का अधिकार दिया गया है, और इन्हें नियमित अंतराल पर यूजीसी को रिपोर्ट भेजनी होती है। इससे पहली बार परिसर के भीतर भेदभाव को एक सतत प्रशासनिक प्रक्रिया के रूप में दर्ज करने की व्यवस्था बनी है।
तीसरा नया तत्व शिकायत‑प्रक्रिया की समयबद्धता है। 24 घंटे के भीतर बैठक, सीमित समय में रिपोर्ट और अनुपालन न होने पर संस्थान के विरुद्ध कठोर दंड—ये प्रावधान पहले इस रूप में मौजूद नहीं थे। यहीं से असहजता जन्म लेती है, क्योंकि अब भेदभाव का प्रश्न केवल नैतिक या सामाजिक नहीं, बल्कि सीधे संस्थान की मान्यता और भविष्य से जुड़ जाता है।
इन जोड़ो का प्रभाव यह है कि यूजीसी का दख़ल अब केवल मानक तय करने तक सीमित नहीं रहा। वह परिसर के आंतरिक व्यवहार, संवाद और निर्णय‑प्रक्रिया तक पहुँच गया है। इसी कारण यह नियम शिक्षा सुधार से आगे बढ़कर सत्ता, भरोसे और राजनीतिक संतुलन का विषय बन गया है।
यूजीसी के नए नियम को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। यह असंतोष अब केवल छात्र‑समूहों या सामाजिक संगठनों तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों के भीतर भी उभरने लगा है। माना जा रहा है कि इन नियमों को लेकर भारतीय जनता पार्टी के अंदर से ही विरोध की आवाज़ें सामने आ रही हैं। राज्य और ज़िला स्तर के कुछ पदाधिकारियों के इस्तीफ़े, खुले पत्र और सार्वजनिक असहमति इस बात की ओर संकेत करते हैं कि मामला प्रशासनिक सुधार से आगे बढ़कर राजनीतिक चुनौती का रूप ले चुका है।
बीजेपी के भीतर जनरल कैटेगरी से जुड़े कई नेता और कार्यकर्ता इन नियमों को अपने समर्थक आधार के लिए असहज मान रहे हैं। उनका तर्क है कि समानता के नाम पर बनाए गए इस ढाँचे से ‘रिवर्स भेदभाव’ का खतरा पैदा होता है, जिसमें सामान्य वर्ग के छात्र और शिक्षक स्वयं को संदेह और निगरानी के दायरे में महसूस कर सकते हैं। पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि उन्हें अपने समर्थकों को यह समझाना कठिन हो रहा है कि ये नियम किस तरह सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करेंगे। यदि वे चुप रहते हैं, तो समर्थक नाराज़ होते हैं; और यदि विरोध करते हैं, तो पार्टी‑अनुशासन पर सवाल उठते हैं।
यह असमंजस ऐसे समय में उभर रहा है जब कई राज्यों में विधानसभा चुनाव सामने हैं। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में, जहाँ जातीय संतुलन राजनीति का संवेदनशील आधार रहा है, इस मुद्दे ने विशेष तूल पकड़ लिया है। ब्राह्मण समाज और अन्य जनरल कैटेगरी समूहों के बीच पहले से मौजूद नाराज़गी के साथ यह विवाद जुड़ता दिखाई देता है। पार्टी के भीतर ही बने अनौपचारिक समूह और बैठकों की ख़बरें इस बेचैनी को और स्पष्ट करती हैं।
बीजेपी के सामने चुनौती दोहरी है। यदि वह नियमों में ढील या वापसी का संकेत देती है, तो एससी‑एसटी और अन्य वंचित समूहों की ओर से विरोध का सामना करना पड़ सकता है। और यदि वह मौजूदा स्वरूप में नियमों का बचाव करती है, तो अपने पारंपरिक समर्थक आधार में असंतोष बढ़ने का जोखिम है। पहले भी कुछ नीतिगत फ़ैसलों की वापसी को लेकर सरकार को आलोचना झेलनी पड़ी है, और यही स्मृति इस बार भी निर्णय‑प्रक्रिया को जटिल बना रही है।
इस तरह यूजीसी के नए नियम अब केवल उच्च शिक्षा के प्रशासनिक प्रश्न नहीं रहे। वे उस राजनीतिक संतुलन की परीक्षा बनते जा रहे हैं, जिसमें समानता, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के उद्देश्य को चुनावी गणित और सामाजिक भरोसे के साथ साधना पड़ता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस असहजता को संवाद और संशोधन से सुलझाती है, या यह मुद्दा शिक्षा से निकलकर खुली राजनीतिक रेखाओं पर खिंच जाता है।





