यूजीसी के नए नियम और उनका विरोध : समता के बहाने असामनता का कानूनी जंजाल

New UGC rules and their opposition: A legal tangle of inequality under the guise of equality

प्रमोद भार्गव

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने नए नियम तो उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव दूर करने की दृष्टि से बनाए थे, लेकिन इनके अधिसूचित होते ही असमानता के भेद उजागर हो गए। फलस्वरूप समूचे देश की सवर्ण जातियां आक्रोशित होकर आंदोलन पर उतर आईं। क्योंकि सवर्ण समाज को इसके दुरुपयोग की इस बात को लेकर आशंकाएं हैं कि इन्हें सवर्ण जातियों को परेशान करने के लिए एक कारगर हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। जैसा कि एससी-एसटी कानून के तहत सवर्णों को झूठे मुकदमों में फंसाने का काम किया जाता है। विडंबना है कि अब इन नए नियमों में पिछड़े वर्ग को भी जोड़ दिया गया है। साथ ही कानून में इन वर्गों के छात्र शिक्षक और कर्मचारी भी षामिल कर दिए हैं। नए कानून में नस्ल, पंत, क्षेत्र, लिंग और दिव्यांग्ता के आधार पर भी भेदभाव बरते जाने की शिकायत की जा सकती है। मसलन इस आधार पर किसी भी जाति के छात्र की शिकायत की जा सकती है। यानी छात्रों को परेशान करने का दायरा इस कानून के तहत विस्तृत कर दिया गया है, जबकि 2012 के इसी कानून में ऐसा नहीं था। इसीलिए इस कानून का विरोध केंद्र और राज्यों में सत्तारूढ़ दल के भाजपा नेता, सांसद और विधायक भी कर रहे हैं। क्योंकि कानून में इस बात का कोई उल्लेख नहीं है कि शिकायतकर्ता की शिकायत यदि झूठी पाई जाती है तो उसके विरुद्ध कार्यवाही का कोई प्रविधान नहीं है। समता के बहाने लाए गए ऐसे कानून शिक्षा संस्थानों में जातीय वर्ग संघर्ष के हालात पैदा करने के अलावा समता के कोई उपाय नहीं कर पाएंगे। इस कानून के अधिसूचित होते ही इसके विरोध में बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने त्यागपत्र दे दिया है। यह कानून आ बैल मुझे मार कहावत को चरितार्थ करने वाला है।

जातिगत कटुता बढ़ाने के इस कानून के आते ही देशभर में सवर्ण समाज के आंदोलन को देख केंद्र सरकार की चिंताएं बढ़ गई हैं। सरकार इसका रास्ता ढूंढ़ने में भी जुट गई है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद यूजीसी ने 2012 में लाए गए समानता के नियमों में बदलाव किया है। 2012 में भी न्यायालय के आदेश पर यह कानून बना था। लेकिन इस बार यह बदलाव व्यापक असंतोष का कारण बन गया है। इन नियमों के अंतर्गत प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान में अनिवार्य रूप से समानता समीतियों (इक्विटी कमेटी) का गठन होगा। नियमों का पालन नहीं करने पर संस्थान को डिग्री या कार्यक्रम देने पर यूजीसी ने दंड के प्रावधान किए है। उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नजरिए से इस कानून को 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित भी कर दिया है। अर्थात ये कानून प्रभावशील हो गए है। हालांकि पिछले साल फरवरी 2025 में यूजीसी ने जब नए नियमों का प्रारूप सुझावों के लिए जारी किया था तब इसमें पिछड़ा वर्ग को जाति आधारित भेदभाव से अलग रखा गया था। इस प्रारूप में यह भी प्रस्ताव था कि यदि भेदभाव की शिकायतें झूठीं पाई जाती हैं तो ऐसे शिकायत कर्ताओं को हतोत्साहित करने के साथ जुर्माने का प्रावधान भी था, जिसे वे भविश्य में झूठी शिकायतें न करें। लेकिन जब यह कानून अधिसूचित होने के बाद सार्वजनिक हुआ तो इसमें पिछड़ा वर्ग को षामिल करने के साथ झूठी शिकायतों से संबंधित प्रावधान भी विलोपित कर दिया गया। साथ ही भेदभाव का दायरा बढ़ा दिया गया। भेदभाव को परिभाशित करते हुए कानून में कहा गया है कि यदि छात्र के खिलाफ यदि धर्म, जाति, लिंग क्षेत्र या विकलांगता के आधार पर अनुचित या पक्षपातपूर्ण व्यवहार सवर्ण जाति के छात्र करते हैं तो यह आचरण भेदभाव के दायरे में आएगा। संस्था प्रमुख को नए नियमों के अनुसार दिए उत्तरदायित्वों का समानता बढ़ाने की दृश्टि से पालन करना अनिवार्य होगा।

यूजीसी भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक संस्था है। इसकी स्थापना 1956 में संसद में एक अधिनियम पारित करके उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए किया गया था। लेकिन लगता है की इस कानून से ये संस्थान अब वर्ग संघर्श के अखाड़े बन सकते है। क्योंकि मात्र शिकायत के आधार पर यह कैसे तय होगा कि वाकई सवर्ण छात्र ने भेदभाव का आचरण किया है ? इस कानून से यह भी प्रतिबिंबित है कि भेदभाव या जातिसूचक अनर्गल टिप्पणियां केवल उच्च वर्ग के छात्र ही करते हैं। जबकि अब आरक्षण का लाभ पाकर सरकारी नौकरियों में आए दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के माता-पिता की संतानें भी आपत्तिजनक आचरण सवर्णों से करने लगे हैं। चरित्र में अहंकार ओहदा और धन बढ़ने से भी आता है। अतएव इस कानून के नतीजे वैसे ही दुरुपयोग का अधार बन सकते हैं, जैसे कि अनुसूचित जाति व जनजातियों के उत्पीड़न के साथ दहेज और यौन हिंसा को प्रतिबंधित करने वाले कानून बने हुए हैं। सभी जातियों की आर्थिक रूप से सक्षम हुई महिलाएं भी अब इन कानूनों का दुरुपयोग करते लगातार सामने आ रही हैं। ऐसे में यह कानून समता की बजाय असमानता को ही बढ़ावा देगा।

दुनिया के मानव सभ्यता के इतिहास में धर्म, नस्ल, जाति, शिक्षा और आर्थिक हैसियत के आधार पर भेद होता है, जो एक ऐसा कलंक है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसीलिए डॉ भीमराव आंबेडकर ने साफ शब्दों में कहा था कि ‘सामाजिक न्याय जातिविहीन सामाजिक संरचना से ही संभव है।’ लेकिन आज भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में नस्ल, धर्म और जाति गरिमा को उकसाया जाकर उसे मजबूत करने के उपक्रम चल रहे हैं। भारतीय नेता जातीय चेतना उभारकर जातीय दंभ को महिमामंडित करने का काम कर रहे हैं। ऐसे में संविधान निर्माता के साथ-साथ समाज निर्माण के अग्रदूत डॉ आंबेडकर के साझा विरासत और सामूहिक जीवन षैली के वैचारिक सूत्रों को अमल में लाना सामाजिक समरसता के लिए बेहद जरुरी है। हम समरसता के इन उपायों को जमीन पर उतारने की बजाय असमानता की कानूनी इबारतें लिखकर जातीय भेद को बढ़ावा दे रहे हैं। ऐसा ही उपाय यूजीसी ने इस नए कानून में कर दिया है।

देखने में आ रहा है कि भारतीय संवैधानिक संसदीय लोकतंत्र,जातीय लोकतंत्र में बदलता जा रहा है। आज ज्यादातर क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का आधार जातीयता है। भाजपा भी यूजीसी कानून के जरिए इसी रास्ते पर चलती दिखाई दे रही है। ऐसे कानूनी उपायों को बढ़ावा देने से जातिगत दलों का वजूद भारतीय लोकतंत्र में और बढेगा।़ इस्लाम आधारित दल भी मजबूत होंगे। यह स्थिति देश के भविश्य के लिए खतरनाक तो है ही, संविधान की भावना सामाजिक न्याय के विरुद्ध भी है ? इसीलिए डॉ आंबेडकर ने सिखों और मुसलमानों में जो सामूहिक जीवन-शैली है, उसे अपनाने की सलाह हिंदुओं को दी थी। जिससे समानता, एकजुटता और जातिविहीनता समाज का वैकल्पिक दृश्टिकोण देश के सामने पेश आ सके। दलितों और वंचितों को संविधान के प्रजातांत्रिक मूल्यों से जोड़ने का यह एक कारगर उपाय था। लेकिन दुर्भाग्य से देश में जाति प्रथा की जड़ें कथित कानूनी उपायों से मजबूत की जा रही हैं, जो देश की संप्रभुता एवं अखंडता के लिए घातक हैं।