विशाल कुमार सिंह
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जिस वैश्विक व्यवस्था का निर्माण हुआ, उसकी नींव सहयोग, बहुपक्षीय संस्थाओं, साझा मानदंडों और इस विश्वास पर टिकी थी कि सामूहिक प्रयासों के माध्यम से बड़े पैमाने पर संघर्षों को रोका जा सकता है और वैश्विक चुनौतियों का समाधान किया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, हथियार नियंत्रण संधियाँ और जलवायु परिवर्तन से जुड़े समझौते इसी सहयोगात्मक भावना के प्रतीक थे। इन संस्थाओं के माध्यम से विश्व को एक ऐसी दिशा देने का प्रयास हुआ, जहाँ संवाद और नियमों के आधार पर समस्याओं का समाधान हो। किंतु हाल के वर्षों में यह वैश्विक व्यवस्था धीरे-धीरे बिखरती हुई दिखाई देने लगी है। इस क्षरण का एक प्रमुख कारण शक्तिशाली देशों, विशेषकर डोनाल्ड ट्रंप से जुड़ी नेतृत्व शैली के अंतर्गत अमेरिका द्वारा बहुपक्षवाद के स्थान पर एकपक्षीय नीति को प्राथमिकता देना रहा है। इस बदलाव ने वैश्विक स्थिरता, आपसी विश्वास और शासन प्रणाली पर गहरे प्रभाव डाले हैं।
वैश्विक व्यवस्था के विखंडन का सबसे स्पष्ट संकेत अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में घटता विश्वास है। अमेरिका ने ऐतिहासिक रूप से इन संस्थाओं के निर्माण और संचालन में केंद्रीय भूमिका निभाई है, यहाँ तक कि तब भी जब वह उनके कुछ निर्णयों से सहमत नहीं रहा। लेकिन हालिया वर्षों में इन संस्थाओं के प्रति खुला संदेह देखने को मिला, जहाँ उन्हें सहयोग के मंच के बजाय राष्ट्रीय संप्रभुता पर अंकुश लगाने वाले ढाँचे के रूप में प्रस्तुत किया गया। पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकलना, विश्व स्वास्थ्य संगठन की आलोचना करना और विश्व व्यापार संगठन की विवाद निपटान व्यवस्था की अनदेखी करना यह संकेत देता है कि जब नियम असुविधाजनक लगें, तो उन्हें नजरअंदाज किया जा सकता है। इससे उन संस्थाओं की वैधता कमजोर होती है, जिनका अस्तित्व ही शक्तिशाली देशों की भागीदारी और समर्थन पर निर्भर करता है।
जलवायु परिवर्तन नीति इस विखंडन को और भी स्पष्ट रूप से सामने लाती है। जलवायु परिवर्तन एक ऐसी वैश्विक समस्या है, जिसका समाधान कोई एक देश अकेले नहीं कर सकता। जब अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं से दूरी बनाई, तो इससे सामूहिक प्रयासों की गति धीमी पड़ी और अन्य देशों को भी अपनी जिम्मेदारियों में ढील देने का अवसर मिला। यद्यपि अमेरिका के भीतर कई राज्य, शहर और निजी संस्थाएँ स्वतंत्र रूप से जलवायु संरक्षण के प्रयास करती रहीं, फिर भी मजबूत संघीय नेतृत्व के अभाव ने वैश्विक स्तर पर विश्वास को कमजोर किया। परिणामस्वरूप सहयोग में खालीपन पैदा हुआ और जलवायु कूटनीति एक एकीकृत प्रयास के बजाय असमान और बिखरी हुई प्रतिबद्धताओं का समूह बन गई।
व्यापार और आर्थिक संबंध भी इस बदलाव से गहराई से प्रभावित हुए हैं। युद्धोत्तर आर्थिक व्यवस्था का उद्देश्य संरक्षणवाद को कम करना और परस्पर निर्भरता को बढ़ावा देना था, इस विश्वास के साथ कि व्यापार शांति और समृद्धि को बढ़ाता है। किंतु शुल्कों, व्यापार युद्धों और “अमेरिका फर्स्ट” जैसी नीतियों ने इस सोच को चुनौती दी। मित्र और प्रतिद्वंद्वी देशों के साथ व्यापार विवादों ने रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और आर्थिक नीति के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया। इसके परिणामस्वरूप स्थिर और पूर्वानुमेय व्यापार नियमों पर विश्वास घटा, आपूर्ति शृंखलाएँ राजनीतिक रंग लेने लगीं और देशों ने वैश्विक ढाँचों पर निर्भर रहने के बजाय क्षेत्रीय या द्विपक्षीय समझौतों की ओर रुख करना शुरू कर दिया। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रतिस्पर्धी गुटों में बँटती चली गई।
सुरक्षा और कूटनीति का क्षेत्र भी इन परिवर्तनों से अछूता नहीं रहा। दीर्घकालिक गठबंधनों और सुरक्षा प्रतिबद्धताओं पर सवाल उठाने वाली बयानबाजी ने उन सहयोगी देशों के विश्वास को कमजोर किया, जो दशकों से अमेरिकी आश्वासनों पर निर्भर थे। जब सहयोगियों को किसी अग्रणी शक्ति की विश्वसनीयता पर संदेह होने लगता है, तो वे वैकल्पिक साझेदारियाँ तलाशने या आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ाते हैं। इससे हथियारों की होड़, क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा और अस्थिर सुरक्षा वातावरण को बढ़ावा मिल सकता है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकार मानदंडों के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया उस नैतिक नेतृत्व को भी कमजोर करता है, जो कभी वैश्विक सहयोग की आधारशिला था।
राष्ट्रवादी और लोकलुभावन राजनीति का उभार इस विखंडन का कारण भी है और परिणाम भी। घरेलू राजनीतिक विमर्श में जब अंतरराष्ट्रीय सहयोग को लाभ के बजाय बोझ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो वह मतदाताओं के एक वर्ग को भले ही आकर्षित करे, लेकिन इसके वैश्विक दुष्परिणाम होते हैं। जब शक्तिशाली देश अल्पकालिक घरेलू हितों के आधार पर निर्णय लेते हैं, तो वैश्विक शासन प्रणाली कमजोर पड़ती है। अन्य देश भी इसी राह पर चल सकते हैं, जिससे सहयोग के स्थान पर लेन-देन आधारित और स्वार्थपूर्ण संबंधों की दुनिया उभरती है। ऐसी व्यवस्था महामारी, जलवायु परिवर्तन और तकनीकी जोखिम जैसी दीर्घकालिक और जटिल चुनौतियों से निपटने में अक्षम होती है।
फिर भी, विखंडन का अर्थ पूर्ण पतन नहीं है। जहाँ कुछ संस्थाएँ कमजोर हुई हैं, वहीं कुछ ने स्वयं को परिस्थितियों के अनुसार ढाल लिया है। मध्य शक्तियों, क्षेत्रीय समूहों और गैर-राज्य अभिनेताओं के नेतृत्व में सहयोग के नए रूप सामने आ रहे हैं। वैज्ञानिक संस्थानों, जलवायु नेटवर्कों और मानवीय संगठनों का निरंतर कार्य यह दर्शाता है कि बहुपक्षवाद अभी भी जीवित है, भले ही दबाव में हो। असली चुनौती यह है कि क्या प्रमुख शक्तियाँ यह समझने को तैयार होंगी कि आज के समय में नेतृत्व का अर्थ प्रभुत्व नहीं, बल्कि समन्वय, विश्वसनीयता और जिम्मेदारी है।
वैश्विक व्यवस्था का विखंडन एक प्रकार के दृष्टि-संकट को दर्शाता है। प्रश्न यह नहीं है कि पुरानी व्यवस्था पूर्ण थी या नहीं, वह निश्चय ही अपूर्ण थी, बल्कि यह है कि क्या विश्व सहयोग को त्याग कर बिना किसी व्यवहार्य विकल्प के आगे बढ़ सकता है। यदि शक्तिशाली राष्ट्र संकीर्ण राष्ट्रवाद में सिमट जाते हैं, तो वैश्विक समस्याएँ और अधिक गंभीर होंगी तथा अस्थिरता बढ़ेगी। बहुपक्षवाद में विश्वास की पुनर्स्थापना के लिए साझा कमजोरियों को स्वीकार करना और सुसंगत, सिद्धांतनिष्ठ संवाद के माध्यम से भरोसे का पुनर्निर्माण आवश्यक है। वैश्विक व्यवस्था का भविष्य इसी पर निर्भर करेगा कि क्या सहयोग को फिर से एक शक्ति के रूप में देखा जाएगा, न कि एक बोझ के रूप में।





