अशोक भाटिया
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना लगभग तय है। वे आज गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में राज्यसभा चुनाव नामांकन भरेंगे। नीतीश कुमार आज अपने समर्थकों के साथ सुबह करीब साढ़े 11 बजे बिहार विधानसभा पहुंचेंगे, जहां वे नामांकन भरकर चुनाव संबंधी औपचारिकताएं पूरी करेंगे। सवाल यह उठता है कि क्या यह सब विधानसभा के चुनाव से पहले से ही तय था यां बाद में हालत बदले । यह यक्ष प्रश्न ऐसा है कि जैसे कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा जिसका उत्तर आज तक खोजे नहीं मिला है ।
बताया जाता है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में जीत के साथ ही भारतीय जनता पार्टी के सीएम बनाने की चर्चा थी। भाजपा नहीं बना सकी। उसने कहा कि नीतीश कुमार के नाम पर चुनाव लड़ा, वही बनेंगे। नीतीश की चाहत नहीं थी, फिर भी बने। अनबन अंदर-अदर चली। नतीजा कि नीतीश कुमार निकल कर महागठबंधन के सीएम बन गए। वहां गए तो चर्चा निकली कि नीतीश तेजस्वी यादव को कुछ दिन में अपनी कुर्सी दे देंगे। यहां भी असहज हुए तो वापस भाजपा के साथ आ गए। उन्हें दिन-रात धोने वाले भाजपाई फिर नीतीश के पीछे हो गए। फिर राष्ट्रपति चुनाव आया तो नीतीश का नाम उछाला गया। उप राष्ट्रपति चुनाव आया तो नाम उछाला गया। लोकसभा चुनाव में शांति रही, क्योंकि इससे नीतीश भड़क सकते थे। विधानसभा चुनाव में भी उसी तरह का माहौल रहा। अब जैसे ही सबकुछ ठीक हुआ और राज्यसभा चुनाव आया तो उनके राज्यसभा सांसद बनने की बात उछाली गई। क्या यह संभव है? नहीं तो क्यों?
होलिका दहन की शाम से नीतीश कुमार के बेटे निशांत को राज्यसभा भेजने की चर्चा उठाई गई। यह शुरुआत थी। जबकि, हकीकत यह है कि अब तक नीतीश की छवि परिवारवादी नहीं रही है। कहा गया कि नीतीश पार्टी की कमान निशांत को देंगे, इसलिए राज्यसभा भेजेंगे। और, अगर बिहार की राजनीति करानी होगी तो विधान परिषद् में उतारेंगे। वह चर्चा होली के दिन थम गई। नई बात निकली कि नीतीश कुमार अब राज्यसभा जाएंगे। एक सांसद बनकर रिटायर होंगे, क्योंकि वह अपने बेटे को बिहार का उप मुख्यमंत्री बनाने के लिए तैयार हो गए हैं और मुख्यमंत्री की कुर्सी भाजपा के खाते में छोड़ देंगे। लेकिन, सच यह है कि जब-जब इस तरह की बात अंदरूनी राजनीति में उठी है तो नीतीश कुमार की जगह भाजपा को ही नुकसान हुआ है। दबाव की राजनीति से तंग आकर दो बार नीतीश भाजपा का साथ छोड़ महागठबंधन में जा चुके हैं और उसी तरह दोनों ही बार दबाव से ही परेशान होकर भाजपा के साथ आ चुके हैं।
जब राष्ट्रपति या उप राष्ट्रपति के लिए उनका नाम उड़ाया गया था तो भी मीडिया ने इसका खंडन किया था। वजह यह थी कि नीतीश केंद्र की राजनीति छोड़ बिहार के विकास के नाम पर यहां आए थे। बीमारी की चर्चाओं और अलग-अलग तरह की गतिविधियों में दिखने के बावजूद बिहार के विकास कार्यों को लेकर सक्रिय दिखते हैं। ऐसे में संन्यास के लिए वह राज्यसभा सांसद बनकर उसी सदन में बैठें, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों- ऐसा संभव नहीं दिखता है। फिर भी चूंकि बार-बार नीतीश कुमार से एग्जिट प्लान मांगने की चर्चा बार-बार उठती रही है, इसलिए ऐसी खबरें निकलती हैं और वही वायरल भी होती हैं।
चाणक्य इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिकल राइट्स एंड रिसर्च के अध्यक्ष सुनील कुमार सिन्हा कहते हैं कि “बिहार में कभी होली पर मजाकिया खबरों के साथ अखबार पेज प्रकाशित करते थे। सोशल मीडिया और आधुनिक मीडिया के दौर में यह जिम्मेदारी अखबारों ने अपने कंधे से हटा दी है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी छीनकर उन्हें राज्यसभा भेजा जा रहा है। इसकी संभावना दिख नहीं रही थी । नीतीश अचरज में डालने वाला काम करते रहे हैं, लेकिन जिस व्यक्ति ने दो बार नरेंद्र मोदी के खिलाफ बिगुल फूंका और फिर पीएम के सामने झुक कर दिखते हुए भी बिहार की राजनीति में अपनी मजबूत स्थिति लेकर रहे हैं- उनके राज्यसभा सांसद बनकर संन्यास लेने की बात स्वीकार करना संभव नहीं दिखता है।
चर्चा को हवा देने में नीतीश कुमार के कुछ करीबियों का भी नाम आ रहा है। उसके बाद से सभी प्रमुख नेताओं का मोबाइल संपर्क से बाहर है। कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार ने राज्यसभा चुनाव के लिए भी फॉर्म भी भरा है। चर्चा है कि नीतीश के एक करीबी मंत्री ने किसी को कह दिया कि निशांत और नीतीश ने राज्यसभा फॉर्म भरा है, इसमें से ही किसी पर फैसला होगा। वहीं, दूसरी तरफ होली के दिन मुख्यमंत्री आवास में होलियाना माहौल रहा। बैठकें उस तरह से नहीं हुईं, जैसी इतने बड़े फैसले को लेकर होती है। विधायकों को पटना नहीं बुलाया गया है।
अब ट्विस्ट सिर्फ नीतीश का जाना नहीं, बल्कि बिहार को मिलने वाला ‘पहला’ बीजेपी मुख्यमंत्री और नीतीश की विरासत संभालने आ रहे उनके बेटे निशांत कुमार हैं। क्या अगले एक हफ्ते में बिहार में सत्ता का पूरा गणित बदल जाएगा? आइए समझते हैं।
राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन वापसी की आखिरी तारीख 9 मार्च है। अगर महागठबंधन ने छठा उम्मीदवार नहीं उतारा, तो एनडीए के सभी पांचों उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिए जाएंगे। कयास हैं कि इसी दिन नीतीश कुमार सीएम पद से इस्तीफा दे सकते हैं। अगर चुनाव हुआ, तो 16 मार्च की रात तक तस्वीर साफ हो जाएगी।
1 मार्च को ही नीतीश कुमार 75 वर्ष के हो गए हैं। हाल के दिनों में उनके स्वास्थ्य को लेकर उठते सवालों और कुछ सार्वजनिक घटनाओं ने सरकार की छवि पर असर डाला है। चर्चा है कि चुनाव के समय ही बीजेपी-जेडीयू के बीच ‘डील’ हुई थी कि नीतीश चुनाव बाद पद छोड़ देंगे। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि नीतीश केंद्र में मंत्री बनते हैं या सिर्फ राज्यसभा सांसद बनकर रहेंगे।
अगर नीतीश कुमार राज्यसभा जाते हैं तो सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि आखिर बिहार का नया मुख्यमंत्री कौन बनेगा। बिहार में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री बनने की राह हमवार होती दिख रही है। रेस में दो नाम सबसे आगे हैं। पहला उपमुख्यमंत्री और प्रदेश की राजनीति के बड़े चेहरे सम्राट चौधरी का, वहीं दूसरा नाम केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय का चल रहा है।राय को अमित शाह का करीबी माना जाता है।इस पूरी कहानी का सबसे रोचक पहलू नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार का राजनीति में प्रवेश है। माना जा रहा है कि अगले एक-दो दिन में वे जेडीयू की सदस्यता लेंगे और उन्हें उपमुख्यमंत्री जैसा बड़ा पद देकर पार्टी की विरासत सौंपी जा सकती है।भले ही बीजेपी सीएम पद के लिए तैयार बैठी हो, लेकिन जेडीयू के भीतर एक धड़ा अभी भी अपने नेता को ही मुख्यमंत्री बनाए रखने के लिए जोर डाल रहा है। एनडीए विधायकों की बैठक में ही इस ‘पावर शिफ्ट’ पर अंतिम मुहर लगेगी।
सूत्रों के अनुसार दो महीने पहले बीजेपी के शीर्ष नेताओं के साथ दिल्ली में बिहार जेडीयू के वरिष्ठ नेताओं और कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक हुई थी। इसमें ट्रांजिशन के बारे में विस्तार से चर्चा हुई थी। साथ ही टाइम लाइन पर भी बात की गई थी। यह तय हुआ था कि राज्य सभा के चुनाव के समय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सम्मानजनक विदाई दे दी जाए। खुद नीतीश कुमार भी कई बार यह बात बीजेपी नेतृत्व को बता चुके थे कि वे अब लंबे समय तक यह जिम्मेदारी नहीं निभाना चाहते। इसके बाद बीजेपी की ओर से भी सहमति दे दी गई। इससे पहले ऐसा हो चुका है कि बीजेपी से कम सीटें आने के बावजूद बीजेपी ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया था। इस बार के विधानसभा चुनाव में जनता ने नीतीश कुमार के नाम पर जबरदस्त समर्थन दिया। इसके बाद यह तय था कि वे ही फिर से मुख्यमंत्री बनेंगे। हालांकि उनकी सेहत को लेकर तब भी चिंताएं व्यक्त की जाती रही थीं।
अभी विधानसभा में स्थिति यह है कि अगर जनता दल यूनाइटेड को हटा दें तो बीजेपी के पास चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा को मिला कर 117 विधायक हैं। यह बहुमत के आंकड़े से केवल पांच कम है। यानी बीजेपी जेडीयू के बिना भी सरकार चलाने की स्थिति में है। हालांकि बीजेपी नेता साफतौर पर कहते हैं कि यह अकल्पनीय है क्योंकि बीजेपी और जेडीयू दोनों ने ही मिलकर चुनाव लड़ा था और बीजेपी किसी भी सूरत में जेडीयू के बिना सरकार नहीं बनाना चाहती है। वे यह भी कहते हैं कि केंद्र में मोदी सरकार के स्थायित्व के लिए भी जेडीयू का समर्थन आवश्यक है। यह जरूर है कि इसी बिना पर बीजेपी बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाना चाहती है और अभी तक के संकेतों के अनुसार ऐसा ही होने जा रहा है।





