नेट नहीं, सन्नाटा, सुरक्षित ऑफलाइन

No internet, silence, safe offline

डॉ विजय गर्ग

एक सुबह देश जागता है और पाता है—नेट नहीं है। मोबाइल हाथ में है, लेकिन आवाज़ गायब। न कोई चेतावनी, न कोई समय-सीमा। बस एक आधिकारिक वाक्य—‘यह निर्णय अचानक नहीं, आवश्यक है।’ जनता समझ जाती है—जब भी ‘आवश्यक’ कहा जाता है, तब कुछ न कुछ चुपचाप छीन लिया जाता है।

नोटबंदी में जेब खाली हुई थी, अब दिमाग़। तब लोग लाइन में खड़े थे, अब सन्नाटे में। फर्क बस इतना है कि तब असुविधा दिखती थी, अब उसी को शांति कहा जा रहा है।

बैंक एप बंद हैं, यूपीआई ठप है, टिकट कैंसिल हैं, काम अटका हुआ है। सरकार आश्वासन देती है—घबराइए नहीं, ऑफ़लाइन विकल्प मौजूद हैं। वही ऑफ़लाइन विकल्प, जिन्हें पिछले एक दशक में ‘डिजिटल इंडिया’ के नाम पर धीरे-धीरे ख़त्म कर दिया गया था। अब वही विकल्प राष्ट्र के उद्धारक बताए जा रहे हैं।

टीवी स्टूडियो पूरी क्षमता से चल रहे हैं। एंकर गर्व से बताते हैं—नेटबंदी देशहित में है। बहस हाई-स्पीड नेटवर्क और सेटेलाइट के सहारे जारी है। पैनलिस्ट समझाते हैं—इंटरनेट ने युवाओं को बिगाड़ दिया था, उन्हें सवाल पूछने की आदत लगा दी थी। अब देश सही दिशा में लौट रहा है—ख़ामोशी की ओर।

सरकारी आदेश आते हैं—ऑनलाइन सेवाएं अस्थायी रूप से स्थगित। लेकिन आवेदन केवल ऑनलाइन ही स्वीकार होंगे। शिकायत के लिए वेबसाइट है, हेल्पलाइन है—जो नेट आने पर काम करेगी। प्रशासन संतुष्ट है—प्रणाली पूरी तरह चालू है, बस जनता डिस्कनेक्ट है।

व्यापार सुबक रहा है। स्टार्टअप रुक गए हैं। शेयर बाज़ार अनुमान और बयान के सहारे सांस ले रहा है। सरकार कहती है—देश भावनाओं से चलता है, डेटा से नहीं। निवेशक पूछते हैं—स्थिरता कहां है? जवाब मिलता है—स्थिरता सत्ता में है।

शिक्षा व्यवस्था में भी सुधार हो गया है। ऑनलाइन क्लास बंद, डिजिटल लाइब्रेरी बंद। बच्चों को किताबें दे दी गई हैं—ऐसी किताबें, जिनमें सवाल कम हैं और उत्तर पहले से तय। सरकार प्रसन्न है—अब सोचने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।

लोकतंत्र भी हल्का महसूस कर रहा है। कोई ट्रेंड नहीं, कोई ट्वीट नहीं, कोई वायरल वीडियो नहीं। आधिकारिक बयान आता है—देश में पूर्ण शांति है। शांति का मतलब साफ़ है—कोई देख नहीं रहा, इसलिए कुछ हो ही नहीं रहा।

उपलब्धियां गिनाई जाती हैं। नेटबंदी से अफ़वाहें रुकीं, विरोध रुका, आलोचना रुकी। डिजिटल गिरफ़्तारी की ज़रूरत नहीं पड़ी, क्योंकि डिजिटल नागरिक ही नहीं बचे। यह तकनीकी निर्णय नहीं, नागरिक प्रशिक्षण कार्यक्रम है। धीरे-धीरे जनता अभ्यस्त हो जाती है।

लोकतंत्र में सबसे सुरक्षित नागरिक वही होता है—जो ऑफ़लाइन हो।