तेल, तनाव और विकास दर: ‘युद्ध-भय’ का भारतीय परिदृश्य

Oil, tension and growth: The Indian war-fear scenario

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

भारत का ‘युद्ध-भय’ सिंड्रोम अब किसी मनोवैज्ञानिक शब्दकोश की परिभाषा भर नहीं, बल्कि 21वीं सदी के भारत की आर्थिक नब्ज बन चुका है। जैसे ही पश्चिम एशिया में बारूद सुलगता है, मुंबई के दलाल स्ट्रीट पर घबराहट छा जाती है। मार्च 2026 में ईरान-अमेरिका-इजराइल संघर्ष ने इस आशंका को चरम तक पहुँचा दिया, जब ब्रेंट क्रूड 82 डॉलर के ऊपर निकल गया और होर्मुज स्ट्रेट पर जहाज़ों की लंबी कतारें दिखने लगीं। वैश्विक एजेंसियों की रिपोर्टों के मुताबिक 4.5 ट्रिलियन डॉलर की भारतीय अर्थव्यवस्था, जो हाल तक नियंत्रित महंगाई और तेज़ वृद्धि का उदाहरण मानी जा रही थी, अचानक बाहरी झटकों से डगमगाने लगी। यह महज आर्थिक उतार-चढ़ाव नहीं; यह सामूहिक मानस का संकट है—निवेशक जोखिम समेटते हैं, रुपया दबाव झेलता है और आम उपभोक्ता को पेट्रोल पंप पर मिलता बिल आने वाले कल की चिंता जता देता है। वैश्वीकरण की चमक के पीछे छिपी यह असुरक्षा हर बार सामने आ जाती है।

इस ‘युद्ध-भय’ की जड़ें नई नहीं हैं। 1991 का खाड़ी संकट, जब इराक ने कुवैत पर चढ़ाई की, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को लगभग खाली कर गया और आर्थिक उदारीकरण का द्वार मजबूरी में खुला। 1973 के योम किप्पुर युद्ध ने तेल को हथियार बना दिया था और तब भी भारत ने आयात-निर्भरता की भारी कीमत चुकाई। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान कच्चा तेल 120 डॉलर तक जा पहुँचा, महंगाई 7 प्रतिशत से ऊपर निकली और मौद्रिक सख्ती बढ़ानी पड़ी। हर बार पैटर्न एक-सा रहा—कहीं दूर युद्ध, और यहाँ विकास दर पर प्रहार। इतिहास लगातार चेताता रहा कि ऊर्जा, उर्वरक और आपूर्ति शृंखलाओं में अत्यधिक बाहरी निर्भरता हमें असुरक्षित करती है, फिर भी संकट टलते ही हम सामान्यता के भ्रम में लौट आते हैं। यही चूक ‘युद्ध-भय’ को स्थायी मनःस्थिति में बदल देती है।

2026 का पश्चिम एशियाई संघर्ष इसी पैटर्न का समकालीन रूप है। भारत के लगभग 17 प्रतिशत निर्यात उसी क्षेत्र की ओर जाते हैं और एक करोड़ से अधिक प्रवासी वहाँ से रेमिटेंस भेजते हैं। यदि तनाव लंबा चला, तो तेल 100 डॉलर के पार निकल सकता है, जिससे चालू खाते का घाटा फैलेगा और विकास की गति पर दबाव बढ़ेगा। लॉजिस्टिक्स लागत में उछाल और बीमा प्रीमियम में वृद्धि व्यापारिक मार्जिन को निगल जाती है। वित्तीय बाजारों में जोखिम-प्रतिकूलता बढ़ती है और पूंजी उभरते बाजारों से सुरक्षित ठिकानों की ओर सिमटती है। इस पूरी प्रक्रिया में भारत की ‘स्वीट स्पॉट’ अर्थव्यवस्था—जहाँ महंगाई काबू में और विकास संतुलित था—अचानक असंतुलन की तरफ झुक जाती है। युद्ध भले सीमाओं से दूर हो, पर ऊर्जा मार्गों और पूंजी प्रवाह के जरिये वह हमारे बजट और जेब पर दस्तक दे देता है।

ऊर्जा क्षेत्र इस सिंड्रोम की सबसे नाजुक नस है। भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है और उसका बड़ा हिस्सा होर्मुज मार्ग से गुजरता है। रणनीतिक भंडार सीमित समय तक ही सहारा दे सकते हैं; लंबा व्यवधान उद्योग, परिवहन और कृषि की लागत बढ़ा देगा। ईंधन महँगा होता है तो ट्रकों का भाड़ा बढ़ता है, कारखानों की लागत चढ़ती है और अंततः किराने की दुकानों पर दाम बढ़ जाते हैं। यही क्रम ‘ऊर्जा झटके’ को ‘मुद्रास्फीति तूफान’ में बदल देता है। विकसित भारत 2047 का स्वप्न सस्ती और स्थिर ऊर्जा पर आधारित है; यदि हर वैश्विक टकराव पर हमारी ऊर्जा सुरक्षा हिलती है, तो यह सपना बार-बार कसौटी पर होगा। विविधीकरण—चाहे नवीकरणीय ऊर्जा हो या नए आपूर्तिकर्ता—अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता है।

महंगाई और रुपया इस भय के सबसे स्पष्ट संकेतक हैं। तेल में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी चालू खाते के घाटे को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा देती है और आयात बिल को फुला देती है। रुपया दबाव झेलता है तो विदेशी ऋण महँगा हो जाता है और

कंपनियों की बैलेंस शीट प्रभावित होती है। केंद्रीय बैंक को ब्याज दरों के माध्यम से संतुलन साधना पड़ता है, जिससे कर्ज महँगा और निवेश धीमा पड़ सकता है। अंततः इसका भार आम नागरिक उठाता है—ईंधन, खाद्य और रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम बढ़ते हैं। ‘युद्ध-भय’ इसलिए भी गहरा है क्योंकि यह अदृश्य कर की तरह काम करता है; बिना किसी घरेलू नीति-चूक के, वैश्विक संघर्ष हमारी क्रय शक्ति को कम कर देता है।

पूंजी बाजार इस मनोविज्ञान को सबसे तेजी से प्रतिबिंबित करते हैं। अनिश्चितता बढ़ते ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेश सिमटता है, इक्विटी सूचकांक गिरते हैं और नई परियोजनाओं के लिए पूंजी जुटाना कठिन हो जाता है। भारत का बाजार आकार भले पाँच ट्रिलियन डॉलर के करीब पहुँच गया हो, पर तेल-आधारित झटके इसे वैश्विक साथियों से पीछे धकेल सकते हैं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी जोखिम आकलन के नए मानकों पर कसा जाता है। जब वैश्विक फंड प्रबंधक भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम बढ़ाते हैं, तो उभरती अर्थव्यवस्थाएँ पहले झटका खाती हैं। एक युद्ध की खबर हजारों अंकों की गिरावट में बदल जाती है और विकास कथा पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। यही वह क्षण है जब ‘युद्ध-भय’ आर्थिक वास्तविकता का रूप ले लेता है।

आखिर हर संकट अपने भीतर समाधान का बीज भी छिपाए रहता है। यह परिदृश्य केवल असहायता का चित्र नहीं, बल्कि तैयारी और परिवर्तन की पुकार है। सरकारें ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण, रणनीतिक भंडार के विस्तार और नवीकरणीय निवेश के माध्यम से जोखिम सीमित करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। कूटनीतिक संतुलन भी अनिवार्य है, ताकि सभी पक्षों के साथ ऊर्जा और व्यापारिक रिश्ते सुरक्षित रह सकें। आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से दूरी नहीं, बल्कि लचीले वैश्विक एकीकरण की समझदारी भरी नीति है। यदि हम इतिहास से सबक लेकर आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करें, घरेलू विनिर्माण को प्रतिस्पर्धी बनाएं और वित्तीय अनुशासन बनाए रखें, तो ‘युद्ध-भय’ स्थायी नियति नहीं रहेगा। अन्यथा हर वैश्विक टकराव हमारी अर्थव्यवस्था की नसों पर दबाव बनाता रहेगा। यह सिंड्रोम चेतावनी भी है और अवसर भी—चुनाव हमारा है कि हम भय में सिमटें या उसे नीतिगत सुधार की शक्ति में रूपांतरित कर दें।