- खुद बुझकर बीस दीप जलाने वाली मां
- बीस मासूम सांसों की खातिर जली जीवन-ज्योति
कृति आरके जैन
रानापुर गांव की साधारण-सी मिट्टी पर उस दिन असाधारण इतिहास अंकित हुआ, जब एक सामान्य महिला ने अद्वितीय साहस दिखाकर अपने प्राणों की आहुति दे दी। मध्य प्रदेश के नीमच जिले की कंचनबाई मेघवाल ने मधुमक्खियों के उग्र झुंड के सामने अडिग दीवार बनकर बीस मासूम बच्चों की रक्षा की। वह न कोई सैनिक थीं, न अधिकारी, न योद्धा—फिर भी उस क्षण वे साहस, ममता और त्याग की जीवंत प्रतिमा बन गईं। हजारों डंक सहते हुए भी उन्होंने बच्चों को अपनी बाहों में समेटा, सुरक्षित कमरों तक पहुंचाया और स्वयं पीड़ा के अथाह सागर में डूबती चली गईं। उनका यह बलिदान केवल एक घटना नहीं, बल्कि नारी शक्ति की अमर गाथा है, जो सदियों तक समाज को दिशा और प्रेरणा देती रहेगी।
कंचनबाई का जीवन संघर्षों की कठोर कसौटी पर गढ़ा गया था। पति गंभीर बीमारी से ग्रस्त थे, घर की सारी जिम्मेदारियां पूरी तरह उनके कंधों पर थीं। एक बेटा और दो बेटियों का भविष्य संवारना उनका प्रतिदिन का संकल्प था। आर्थिक तंगी, सामाजिक चुनौतियां और पारिवारिक दायित्व—सब कुछ उन्होंने मुस्कान के साथ निभाया। आंगनवाड़ी केंद्र में भोजन बनाना उनके लिए केवल नौकरी नहीं, बल्कि बच्चों के प्रति स्नेह और सेवा का माध्यम था। वे हर बच्चे को अपने ही परिवार का हिस्सा मानती थीं। उनकी दिनचर्या में थकान थी, पर शिकायत नहीं; पीड़ा थी, पर निराशा नहीं। यही गुण एक साधारण स्त्री को असाधारण ऊंचाइयों तक पहुंचा देता है।
जब मधुमक्खियों का झुंड बच्चों पर टूट पड़ा, तब कंचनबाई पास ही कपड़े धो रही थीं। उन्होंने एक पल भी नहीं सोचा, न अपनी जान की परवाह की, न परिणामों का अनुमान लगाया। बिना किसी शोर, बिना किसी सहायता की प्रतीक्षा किए, वे दौड़ पड़ीं। बच्चों को दरी और तिरपाल में लपेटा, उन्हें ढाल बनाकर भीतर पहुंचाया और स्वयं खतरे के बीच अडिग खड़ी रहीं। यह क्षण महिलाओं की निर्णय क्षमता और मानसिक दृढ़ता का प्रतीक बन गया। संकट की घड़ी में उन्होंने सिद्ध कर दिया कि नारी कभी कमजोर नहीं होती, वह परिस्थिति आने पर सबसे मजबूत और विश्वसनीय कड़ी बन जाती है।
मातृत्व की भावना कंचनबाई के व्यक्तित्व की आत्मा थी। वे केवल अपने बच्चों की ही नहीं, बल्कि पूरे गांव के बच्चों की सजीव मां थीं। आंगनवाड़ी के वे मासूम चेहरे उनके लिए अपने ही परिवार का विस्तार थे। जब खतरा आया, तो उनका हृदय किसी अडिग कवच की तरह बच्चों के सामने खड़ा हो गया। उन्होंने अपने जीवन को तुच्छ समझकर बच्चों के भविष्य को सर्वोपरि रखा। यही मातृत्व का वास्तविक स्वरूप है—जहां स्त्री स्वयं को विस्मृत कर दूसरों का जीवन संवारती है। कंचनबाई ने मातृत्व को केवल जन्म तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे करुणा और संरक्षण का व्यापक, दिव्य रूप दिया।
समर्पण कंचनबाई के जीवन का मूल मंत्र था। स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष के रूप में वे गांव की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में निरंतर लगी रहती थीं। वे दूसरों के दुख को अपना दुख समझती थीं और सहायता को अपना पवित्र कर्तव्य। आंगनवाड़ी में बच्चों के लिए भोजन बनाना उनके लिए सेवा और समर्पण का माध्यम था। उन्होंने कभी अपनी परेशानियों को सामने नहीं रखा, बल्कि हर परिस्थिति में दूसरों को प्राथमिकता दी। मधुमक्खियों के हमले के समय भी उनका समर्पण चरम पर था—अपने जीवन की आहुति देकर उन्होंने समाज को बचाया। यही त्याग नारी को सभ्यता की सशक्त रीढ़ बनाता है।
करुणा और संवेदनशीलता कंचनबाई की आत्मा में गहराई से रची-बसी थी। वे हर पीड़ा को महसूस करती थीं, हर आंसू का मौन अर्थ समझती थीं। बच्चों की चीखें उनके हृदय को चीर गईं और उन्होंने बिना विलंब अपने प्राणों की बाजी लगा दी। हजारों डंक उनके शरीर को घायल करते रहे, लेकिन उनकी चेतना बच्चों की सुरक्षा में अडिग लगी रही। यह करुणा महिलाओं का वह अमूल्य गुण है जो संसार को मानवीय बनाता है। जब समाज कठोर होता है, तब नारी की संवेदना उसे संतुलन और संवेदना प्रदान करती है। कंचनबाई ने यह सिद्ध किया कि करुणा कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है।
सहनशीलता कंचनबाई की पहचान थी। जीवन की कठिनाइयों—आर्थिक संकट, पति की बीमारी, पारिवारिक जिम्मेदारियां—को उन्होंने मौन साहस के साथ सहा। कभी हार नहीं मानी, कभी पीछे नहीं हटीं। मधुमक्खियों के डंक उनकी त्वचा को जलाते रहे, लेकिन उनका संकल्प अडिग और अचल रहा। यह सहनशीलता महिलाओं को टूटने नहीं देती, बल्कि उन्हें भीतर से और अधिक मजबूत बनाती है। वे दर्द को हृदय में समेटकर भी दूसरों को मुस्कान देती हैं। कंचनबाई की कहानी हमें सिखाती है कि सहनशीलता से ही सच्चा साहस और आत्मबल जन्म लेता है।
कंचनबाई की वीरता आज पूरे क्षेत्र के लिए जीवंत प्रेरणा बन चुकी है। उन्होंने दिखाया कि नेतृत्व केवल पद से नहीं, बल्कि निःस्वार्थ कर्म से पैदा होता है। स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष के रूप में वे पहले ही नेतृत्व कर रही थीं, लेकिन उस दिन उन्होंने जीवन और मृत्यु के बीच खड़े होकर सच्चा नेतृत्व दिखाया। गांव के लोग अब जागरूक हो रहे हैं, सुरक्षा उपायों की मांग कर रहे हैं और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी महसूस कर रहे हैं। उनकी शहादत ने समाज को गहराई से सोचने पर मजबूर किया है कि वास्तविक नायक वास्तव में कौन होते हैं।
आज आवश्यकता है कि समाज और सरकार कंचनबाई जैसे बलिदानों को केवल भावनात्मक श्रद्धांजलि तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें सम्मान और स्थायी सुरक्षा में बदलें। उनके परिवार को आर्थिक सहायता, पेंशन, बच्चों की शिक्षा और रोजगार की ठोस व्यवस्था मिलनी चाहिए। यह सहायता दया नहीं, बल्कि एक वीरांगना को दिया गया सच्चा सम्मान होगी। जब हम ऐसी महिलाओं को उचित मान्यता देंगे, तभी समाज में साहस और सेवा की भावना सशक्त होगी। कंचनबाई की शहादत हमें यह सिखाती है कि नारी के गुण—साहस, करुणा, समर्पण, मातृत्व और सहनशीलता—ही सभ्यता की वास्तविक पूंजी हैं। उनकी स्मृति में हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम ऐसी बेटियों, माताओं और बहनों के सम्मान की रक्षा करेंगे और उनके त्याग को कभी विस्मृत नहीं होने देंगे।





