विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान पर विरोधी दल भड़के

Opposition parties lash out at the special summary revision drive

अशोक भाटिया

इस समय उत्तर प्रदेश में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान की सरगर्मी चल रही है। इसमें वोटरों से एसआईआर फार्म 6 जनवरी तक भरवाने थे। इसके बाद ड्राफ्ट वोटर लिस्‍ट जारी की गई थी। लेकिन इस लिस्‍ट में भी कुछ लोगों के नाम नहीं जुड़ पाए थे। कुछ ऐसे भी लोग थे जिनके नाम या दूसरी जानकारी सही नहीं प्रकाशित हुईं। अब दावे और आपत्तियां प्राप्त करने की अवधि 6 जनवरी से 6 फरवरी तक निर्धारित की गई है। जबकि, पहले ये तिथियां 16 दिसंबर से 15 जनवरी तक थी। इसी तरह से अब 6 जनवरी से 27 फरवरी तक नोटिस चरण, गणना प्रपत्रों पर निर्णय, दावे और आपत्तियों का निस्तारण किया जाएगा। उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन 6 मार्च को किया जाएगा।

पर अब मतदाता सूची से नाम कटवाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-7 को लेकर बड़ा विवाद छिड़ गया है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने एक्स पर एक पोस्ट के जरिए इस मुद्दे को उठाया है, जिसमें उन्होंने फॉर्म 7 के दुरुपयोग को बड़ा षड्यंत्र करार दिया। वहीं, कांग्रेस ने भी चुनाव आयोग को पत्र लिखकर कई राज्यों में फॉर्म 7 के माध्यम से योग्य मतदाताओं के नाम हटाने की संगठित साजिश का आरोप लगाया है। ये विशेष रूप से एससी, एसटी, अल्पसंख्यक समुदायों और बुजुर्गों के नाम काटे जाने का आरोप लगा रहे हैं। अखिलेश यादव ने पोस्ट में लिखा कि चुनाव आयोग, न्यायालय और मीडिया से इस महाघोटाले की जांच की मांग की जा रही है।

फॉर्म 7 भारत के निर्वाचन प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) द्वारा वोटर लिस्ट में संशोधन के लिए उपलब्ध कराया जाता है। यह फॉर्म मुख्य रूप से किसी मतदाता के नाम को वोटर लिस्ट से हटाने के लिए इस्तेमाल होता है। किसी मतदाता की मौत, डुप्लीकेट नाम, स्थानांतरण या कोई अन्य वैध आधार हो तो कोई दूसरा व्यक्ति इस फॉर्म को भरकर उसका नाम कटवा सकते हैं। कोई भी व्यक्ति फॉर्म 7 भरकर किसी अन्य मतदाता के नाम पर आपत्ति दर्ज करा सकता है, जिसके बाद चुनाव अधिकारी जांच कर नाम हटा सकते हैं। हालांकि, नियमों के मुताबिक फॉर्म में आपत्तिकर्ता का नाम, पता और हस्ताक्षर अनिवार्य हैं।

लेकिन हालिया आरोपों में कहा जा रहा है कि फॉर्म 7 को पहले से छपवाकर, फर्जी हस्ताक्षरों के साथ बड़े पैमाने पर जमा किया जा रहा है। अखिलेश यादव ने अपने पोस्ट में कहा कि गांवों में ऐसे फॉर्म भेजे जा रहे हैं, जहां शिकायतकर्ता का कोई अता-पता नहीं है। इससे पीड़ित मतदाता को पता ही नहीं चलता कि उसका नाम काटा जा रहा है। कांग्रेस ने भी दावा किया कि कई मामलों में फर्जी नाम, गलत ईपीआईसी नंबर और अमान्य मोबाइल नंबर इस्तेमाल हो रहे हैं। कुछ आपत्तिकर्ताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्होंने कभी फॉर्म भरा ही नहीं।

अखिलेश यादव ने अपने एक्स हैंडल से पोस्ट किया कि यह साजिश विशेष रूप से पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समाज को निशाना बना रही है। उन्होंने कहा कि फर्जी हस्ताक्षरों से विपक्ष के समर्थकों के नाम काटे जा रहे हैं। यादव ने न्यायालय, निर्वाचन आयोग और पत्रकारों से इस षड्यंत्र का संज्ञान लेने की अपील की। साथ ही न्यूज चैनलों और अखबारों से इस महाघोटाले का पर्दाफाश करने की मांग की। उन्होंने स्थानीय यूट्यूबरों और लोकल न्यूज कर्मियों से भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए भंडाफोड़ करने को कहा।

उन्होंने वादा किया कि वह उन्हें देश-प्रदेश के सामने लाएंगे। ये आरोप ऐसे समय में आए हैं कई राज्यों चुनाव हो रहे हैं। अखिलेश का कहना है कि अल्पसंख्यक समुदायों के नाम बड़े स्तर पर काटे जा रहे हैं, जिससे विपक्ष की वोट बैंक प्रभावित हो सकती है।

कांग्रेस ने भी चुनाव आयोग को लिखी चिट्ठी में फॉर्म 7 के दुरुपयोग को संगठित तरीके से चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा बताया हैं । पार्टी ने राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम और केरल जैसे राज्यों से शिकायतें मिलने का जिक्र किया। असम को सबसे गंभीर बताया गया, जहां लाखों वोटरों को निशाना बनाया जा रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि एससी, एसटी, अल्पसंख्यक और 60 साल से ऊपर के बुजुर्गों को विशेष रूप से टारगेट किया जा रहा है।पार्टी ने दावा किया कि इसमें भाजपा से जुड़े बूथ लेवल एजेंट्स (बीएलए) की भूमिका सामने आ रही है। क्लेम्स एंड ऑब्जेक्शंस के तहत लाखों फॉर्म जमा हो रहे हैं, लेकिन कई में आपत्तिकर्ता की पहचान साफ नहीं। कांग्रेस ने कहा कि अगर इसे नहीं रोका गया तो यह चुनावी लाभ के लिए मताधिकार छीनने की बड़ी साजिश है।

कांग्रेस ने अपनी चिट्ठी में रेप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपुल एक्ट, 1950 का हवाला दिया, जिसमें फॉर्म 7 केवल मौत, डुप्लीकेशन या वैध कारणों के लिए है। गलत जानकारी देने पर सजा का प्रावधान है। पार्टी ने चुनाव आयोग से तुरंत जांच शुरू करने, दोषियों की पहचान, फॉर्म दुरुपयोग में शामिल लोगों पर कार्रवाई और गलत तरीके से हटाए गए नामों को बहाल करने की मांग की।

फॉर्म 7 भारत निर्वाचन आयोग द्वारा जारी किया गया एक कानूनी आवेदन है। इसका मुख्य उद्देश्य पंजीकृत मतदाताओं को औपचारिक रूप से निम्नलिखित जानकारी देना है:मतदाता सूची में किसी अन्य व्यक्ति का नाम शामिल करने के प्रस्तावित प्रस्ताव पर आपत्ति जताएं। उनका नाम हटाने का अनुरोध करें।मृत्यु, स्थानांतरण या दोहराव जैसे विशिष्ट कारणों से किसी अन्य व्यक्ति का नाम हटाने का अनुरोध करें।

दरअसल फॉर्म 7 का उपयोग तब किया जाना चाहिए जब:एक मतदाता को सूची में कोई गलती या पुरानी प्रविष्टि (जैसे किसी मृत व्यक्ति का नाम) दिखाई देती है।उस व्यक्ति ने अपना निवास स्थान बदल लिया है (स्थायी रूप से दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में स्थानांतरित हो गया है)।इसमें डुप्लिकेट या त्रुटिपूर्ण प्रविष्टियाँ मौजूद हैं, या किसी व्यक्ति का पंजीकरण गलत तरीके से किया गया है (उदाहरण के लिए, नाबालिग या नागरिक नहीं)।केवल निर्वाचन क्षेत्र के पंजीकृत मतदाता ही फॉर्म 7 दाखिल कर सकते हैं , और प्रत्येक आवेदन में नाम हटाने या आपत्ति का कारण स्पष्ट रूप से बताना आवश्यक हून चाहिए ।आवेदन जमा करने के बाद, विवरणों का सत्यापन किया जाता है। मतदाता पंजीकरण अधिकारी मामले की समीक्षा करता है, सहायक दस्तावेज़ मांग सकता है या मौके पर सत्यापन कर सकता है, और फिर आवेदन को स्वीकार या अस्वीकार करने का निर्णय लेता है। आवेदक को पावती प्राप्त होती है और उसे परिणाम की जानकारी दी जाती है, जिससे प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।

निष्पक्ष चुनावों के लिए सटीक मतदाता सूचियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। प्रपत्र 7 मतदाताओं को मतदाता सूची से त्रुटियों, पुरानी या फर्जी प्रविष्टियों को हटाकर निष्पक्षता बनाए रखने का अधिकार देता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि केवल योग्य मतदाता ही मतदान कर सकें, जिससे भारत का लोकतंत्र स्वतंत्र, निष्पक्ष और सुदृढ़ बना रहता है।

इसके लिए जो दिशा निर्देश है उसके अनुसार केवल पंजीकृत मतदाता ही फॉर्म 7 का उपयोग करके मतदाता सूची में किसी व्यक्ति के नाम जोड़े जाने पर आपत्ति जता सकते हैं या किसी का नाम (स्वयं का नाम सहित) हटा सकते हैं।अपना नाम, ईपीआईसी नंबर और मोबाइल नंबर (या किसी रिश्तेदार का) भरें। सही कारण पर निशान लगाएं, जैसे मृत्यु, स्थानांतरण, दोहरी नागरिकता या गैर-नागरिकता, और उस व्यक्ति का विवरण प्रदान करें जिसके खिलाफ आप आपत्ति जता रहे हैं।सूचना के सत्य होने की पुष्टि करने वाले घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करना या झूठा बयान देना लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत दंडनीय रहेगा ।