पंडित दीनदयाल उपाध्याय एकात्म मानववाद के प्रणेता

Pandit Deendayal Upadhyay, the founder of Integral Humanism

वासुदेव देवनानी

भारतीय राजनीति और चिंतन पर अमिट छाप छोड़ने वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पुण्य तिथि हमें उनके विचारों, सिद्धांतों और राष्ट्रसेवा के समर्पित जीवन को स्मरण करने का अवसर देती है। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक मौलिक चिंतक, संगठनकर्ता और भारतीय संस्कृति के प्रखर व्याख्याता थे। उनका जीवन सादगी, ईमानदारी और राष्ट्रनिष्ठा का प्रेरक उदाहरण रहा है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर 1916 को उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के नगला चंद्रभान (अब दीनदयाल धाम) में हुआ था। बचपन में ही माता-पिता के निधन के कारण उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन विपरीत परिस्थितियों ने उनके व्यक्तित्व को और अधिक दृढ़ बनाया। वे मेधावी छात्र थे और उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट उपलब्धियाँ हासिल कीं। छात्र जीवन से ही उनमें राष्ट्र के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देने लगी थी।

वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में कार्य करते हुए संगठन विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना के बाद उन्हें संगठन मंत्री बनाया गया। अपनी अद्भुत संगठन क्षमता, वैचारिक स्पष्टता और कार्यकर्ताओं से आत्मीय संबंधों के कारण उन्होंने जनसंघ को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। 1967 में वे भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उनका नेतृत्व दल को वैचारिक आधार देने वाला सिद्ध हुआ।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का सबसे महत्वपूर्ण योगदान ‘एकात्म मानववाद’ का दर्शन है। उन्होंने पश्चिमी पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों विचारधाराओं की सीमाओं को रेखांकित करते हुए भारतीय जीवन-दृष्टि पर आधारित एक वैकल्पिक विकास मॉडल प्रस्तुत किया। उनका मानना था कि मनुष्य केवल शरीर या आर्थिक इकाई नहीं है, बल्कि वह शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समन्वित रूप है। इसलिए विकास का मॉडल भी ऐसा होना चाहिए जो व्यक्ति के सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करे।

एकात्म मानववाद का मूल भाव यह है कि समाज और व्यक्ति के बीच संतुलन बना रहे तथा विकास का केंद्र अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति हो। ‘अंत्योदय’ की अवधारणा इसी सोच से निकली, जिसका अर्थ है समाज के सबसे कमजोर और वंचित व्यक्ति का उत्थान। उनका विश्वास था कि जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ नहीं पहुंचेगा, तब तक सच्चे अर्थों में राष्ट्र का विकास अधूरा रहेगा।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय संस्कृति को राष्ट्र की आत्मा मानते थे। वे कहते थे कि भारत की पहचान उसकी सांस्कृतिक एकता में निहित है। उन्होंने ‘राष्ट्र’ को केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना के रूप में परिभाषित किया। उनके विचारों में स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था पर विशेष बल था। वे मानते थे कि ग्राम आधारित अर्थव्यवस्था और स्थानीय संसाधनों का उपयोग भारत को आत्मनिर्भर बना सकता है।

11 फरवरी 1968 को मुगलसराय रेलवे स्टेशन (अब पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन) के पास उनका रहस्यमय परिस्थितियों में निधन हो गया। उनकी असामयिक मृत्यु ने देश को एक दूरदर्शी चिंतक से वंचित कर दिया, किंतु उनके विचार आज भी जीवंत हैं। भारतीय राजनीति में उनके सिद्धांतों का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का राजस्थान के धानक्या (जिला जयपुर) से गहरा और ऐतिहासिक संबंध रहा है। धानक्या वह स्थान है जहाँ उन्होंने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बिताया। दरअसल, उनके ननिहाल (मातृ पक्ष) का संबंध धानक्या से था। उनके नाना चुन्नीलाल जी शुक्ला रेलवे में स्टेशन मास्टर थे और उनकी नियुक्ति धानक्या रेलवे स्टेशन पर थी। बाल्यावस्था में माता-पिता के निधन के बाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय कुछ समय अपने ननिहाल धानक्या में रहे। यहीं उनका प्रारंभिक लालन-पालन हुआ और शिक्षा की शुरुआत भी इसी परिवेश में हुई।

इस कारण धानक्या को पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। आज धानक्या में उनकी स्मृति में स्मारक एवं संग्रहालय विकसित किया गया है, जिसे “पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति स्थल” के रूप में जाना जाता है। यह स्थान उनके जीवन, विचारों और ‘एकात्म मानववाद’ की विचारधारा को समझने का केंद्र बन चुका है। राजस्थान के लिए यह गौरव का विषय है कि राष्ट्र के इस महान चिंतक और संगठनकर्ता के जीवन की महत्वपूर्ण स्मृतियाँ इस प्रदेश से जुड़ी हुई हैं। उनके धानक्या प्रवास ने उनके व्यक्तित्व निर्माण में भूमिका निभाई, और यही कारण है कि राजस्थान में उनकी पुण्य तिथि और जयंती विशेष श्रद्धा के साथ मनाई जाती है।

आज जब भारत आत्मनिर्भरता, समावेशी विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में अग्रसर है, तब पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचार और भी प्रासंगिक हो उठते हैं। अंत्योदय, सबका साथ-सबका विकास, ग्राम स्वराज और आत्मनिर्भर भारत जैसे सूत्र उनके चिंतन से ही प्रेरित प्रतीत होते हैं।

मैंने अपने राजस्थान के शिक्षा मन्त्री के कार्यकाल में स्कूली शिक्षा पाठ्यक्रम में देश के महापुरूषों के पाठ सम्मिलित कराये थे। उनमें पंडित दीनदयाल उपाध्याय का पाठ भी शामिल था ।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पुण्य तिथि पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके बताए मार्ग पर चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास की रोशनी पहुंचाने का संकल्प लें। सादगी, ईमानदारी और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की उनकी जीवनशैली आज के जनप्रतिनिधियों और युवाओं के लिए आदर्श है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जीवन हमें यह संदेश देता है कि विचारों की शक्ति ही राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी ताकत है। उनकी पुण्य तिथि पर देश उन्हें कृतज्ञतापूर्वक नमन करता है और उनके आदर्शों को आत्मसात करने का संकल्प भी दोहराता है ।

(लेखक वासुदेव देवनानी राजस्थान विधानसभा के माननीय अध्यक्ष हैं)