देशभक्ति, कूटनीति और क्रिकेट का कारोबार: मैदान के बाहर का असली मैच

Patriotism, diplomacy and the business of cricket: The real match off the field

अजय कुमार बियानी

दक्षिण एशिया में क्रिकेट केवल खेल नहीं, भावना है; केवल प्रतियोगिता नहीं, राजनीति का विस्तार भी है। जब पाकिस्तान यह कहता है कि वह भारत खेलने नहीं आएगा, और जवाब में यहां से संकेत मिलता है कि कोई बात नहीं, हम श्रीलंका में खेल लेंगे—तो यह केवल कार्यक्रम परिवर्तन नहीं होता, यह उस जटिल रिश्ते का आईना होता है जिसमें खेल, कूटनीति, राष्ट्रवाद और बाज़ार एक साथ मौजूद रहते हैं।

14 फरवरी पुलवामा हमले की बरसी की याद दिलाती है कि भारत-पाकिस्तान संबंध केवल खेल प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं हैं। 15 फरवरी को श्रीलंका में प्रस्तावित मैच इस विडंबना को और तीखा बना देता है—एक दिन शहीदों की स्मृति, अगले दिन क्रिकेट का रोमांच। सवाल यह नहीं कि मैच होना चाहिए या नहीं; सवाल यह है कि हम इन दो वास्तविकताओं को किस नैतिक संतुलन के साथ देखते हैं।

राजनीतिक नेतृत्व के स्तर पर भी संदेशों का आदान-प्रदान प्रतीकात्मक होता है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जैसे शीर्ष नेता राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक रुख पर दृढ़ता दिखाते हैं, तो वह देश की भावनाओं को अभिव्यक्ति देता है। लेकिन खेल कूटनीति का अपना अलग व्याकरण होता है। हाथ न मिलाने की तस्वीरें यह संदेश दे सकती हैं कि हम राजनीतिक रूप से असहमत हैं, पर मैच खेलना यह बताता है कि संवाद के कुछ दरवाज़े खुले हैं। यही विरोधाभास जनता को उलझन में डालता है।

देशभक्ति का जज़्बा स्वाभाविक है। हर नागरिक अपने शहीदों के सम्मान में संवेदनशील है। लेकिन क्या देशभक्ति केवल प्रतीकों से तय होगी—जैसे टॉस के समय हाथ मिलाना या न मिलाना? या फिर वह इस बात से तय होगी कि हम खेल को राजनीति का बंधक बनने से बचा पाते हैं या नहीं? खेल इतिहास गवाह है कि कई बार मैदान संवाद का माध्यम बना है, तनाव घटाने का जरिया बना है। परंतु यह भी सच है कि जब राजनीतिक संबंध अत्यधिक तनावपूर्ण हों, तो खेल का आयोजन भी संदेश बन जाता है।

इस पूरे परिदृश्य का एक और आयाम है—व्यावसायिक हित। भारत-पाकिस्तान मैच विश्व क्रिकेट का सबसे बड़ा प्रसारण आकर्षण माना जाता है। करोड़ों दर्शक, विज्ञापन राजस्व, डिजिटल व्यूअरशिप—सब कुछ इस एक मुकाबले से जुड़ा होता है। प्रसारण अधिकार रखने वाले प्लेटफॉर्म, जैसे रिलायंस जियो के डिजिटल नेटवर्क और स्ट्रीमिंग मंच डिज्नी+हॉटस्टार, ऐसे मैचों से भारी दर्शक संख्या अर्जित करते हैं। उद्योगपति Mukesh Ambani जैसे नाम इस इकोसिस्टम से जुड़े हों तो स्वाभाविक है कि व्यावसायिक समीकरण भी चर्चा में आएं।

यह कहना सरल है कि यदि मैच न हो तो किसी कॉरपोरेट समूह को नुकसान होगा। परंतु वास्तविकता अधिक जटिल है। खेल अब बहु-अरब डॉलर का उद्योग है, जिसमें खिलाड़ी, बोर्ड, प्रसारक, प्रायोजक और मेजबान देश—सभी की आर्थिक हिस्सेदारी होती है। ऐसे में किसी एक मैच को केवल भावनात्मक या केवल व्यावसायिक चश्मे से देखना अधूरा दृष्टिकोण होगा। कड़वा सच यह है कि आधुनिक खेल भावना और वित्त—दोनों के सहारे चलता है।

फिर भी मूल प्रश्न बना रहता है: क्या हम शहीदों की स्मृति और क्रिकेट के उत्सव को एक ही सप्ताह में संतुलित कर सकते हैं? शायद इसका उत्तर ‘या तो–या’ में नहीं, बल्कि ‘कैसे’ में छिपा है। यदि मैच हो, तो क्या उसमें संवेदनशीलता दिखाई जाएगी? क्या खिलाड़ियों और बोर्ड की ओर से श्रद्धांजलि का संदेश जाएगा? क्या यह स्पष्ट किया जाएगा कि खेल संवाद का माध्यम है, शहीदों की स्मृति का प्रतिस्थापन नहीं?

भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट हमेशा भावनाओं का ज्वार लाता है। जीत पर उत्सव, हार पर निराशा—इन सबके बीच राष्ट्रवाद की लहर तेज हो जाती है। परंतु परिपक्व लोकतंत्रों की पहचान यही है कि वे भावनाओं और नीतियों के बीच संतुलन बना सकें। हाथ मिलाने या न मिलाने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि क्या दोनों देश हिंसा और आतंक के मुद्दों पर गंभीरता से आगे बढ़ने को तैयार हैं।

खेल को पूरी तरह राजनीति से अलग करना संभव नहीं, पर उसे पूरी तरह राजनीति का उपकरण बना देना भी खतरनाक है। भारत-पाकिस्तान मैच यदि श्रीलंका में होता है, तो वह केवल रन और विकेट का मुकाबला नहीं होगा; वह इस क्षेत्र की कूटनीतिक जटिलताओं, राष्ट्रीय भावनाओं और वैश्विक खेल उद्योग की वास्तविकताओं का सम्मिलित दृश्य होगा।

अंततः देशभक्ति का अर्थ शोर नहीं, संवेदनशीलता है; कूटनीति का अर्थ कमजोरी नहीं, परिपक्वता है; और खेल का अर्थ केवल कारोबार नहीं, संपर्क भी है। यदि हम इन तीनों के बीच संतुलन साध सकें, तो शायद क्रिकेट का मैदान केवल प्रतिस्पर्धा का नहीं, बल्कि समझदारी का भी मंच बन सकता है। यही इस समय की सबसे बड़ी परीक्षा है—मैदान पर भी और उसके बाहर भी।