यहां प्लास्टिक, वहां प्लास्टिक, आखिर कहां नहीं है प्लास्टिक?

Plastic here, plastic there, where is there no plastic?

सुनील कुमार महला

प्लास्टिक मनुष्य से लेकर धरती के समस्त जीवों, हमारे पर्यावरण और पारिस्थितिकी के लिए एक प्रकार से ज़हर है। आज देश-दुनिया को भले ही प्लास्टिक ने कितनी ही सहूलियतें प्रदान क्यों न की हो, लेकिन यह मनुष्य, जीवों, वनस्पतियों के साथ-साथ संपूर्ण धरती के पर्यावरण के लिए विनाश ला रहा है। ‌पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि हाल ही में भारत के केरल में हुए एक हालिया अध्ययन में बोतलबंद पानी में प्लास्टिक माइक्रोबीड्स की मौजूदगी का खुलासा हुआ है।यह पहली बार नहीं है जब बोतलबंद पानी में प्लास्टिक के महीन कण मिले हों। इससे पहले भी बोतलबंद पानी में प्लास्टिक की मौजूदगी के अनेक खुलासे हो चुके हैं। कुछ समय पहले नमक व चीनी तक के नमूनों में प्लास्टिक के महीन कणों की मौजूदगी के संबंध में एक अध्ययन सामने आया था। हाल ही में जो अध्ययन सामने आया है, उससे पता चलता है कि 10 प्रमुख ब्रांडों के बोतलबंद पानी में प्लास्टिक के माइक्रोबीड्स पाए गए हैं। इस स्टडी से सामने आया है कि औसतन प्रति लीटर तीन से दस माइक्रोबीड्स थे। फाइबर, टुकड़े, फिल्म और छर्रे सहित विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक पाए गए, जो कि चिंताजनक है। चिंताजनक इसलिए क्यों कि आज भारत में बोतलबंद पानी का व्यापार लगातार बढ़ रहा है और बच्चों से लेकर बूढ़े, महिलाएं सभी बोतलबंद पानी का धड़ल्ले से उपयोग करते नजर आते हैं। आंकड़े बताते हैं कि बोतलबंद पानी के माध्यम से हर साल औसतन 153.3 प्लास्टिक कण उपभोक्ता के शरीर में प्रवेश करते हैं। पाठकों को बताता चलूं कि केरल में बिकने वाले बोतलबंद पानी पर केंद्रित यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका स्प्रिंगर नेचर के डिस्कवर एनवायरनमेंट में प्रकाशित हुआ था। अध्ययन ने नमूनों में आठ अलग-अलग प्रकार के पॉलीमर कणों की उपस्थिति की पुष्टि की है, जिसमें फाइबर सबसे आम थे, जो 58.928% थे। कुल कणों का लगभग 35.714% लाल रंग का था। विश्लेषण से पता चलता है कि नमूनों में पाए गए रेशे अनुपचारित जल स्रोतों से उत्पन्न हो सकते हैं, जबकि अन्य जल शोधन में उपयोग किए जाने वाले घटकों या पैकेजिंग के लिए उपयोग की जाने वाली बोतलों से मिश्रित हो सकते हैं। बहरहाल, कहना ग़लत नहीं होगा कि केरल में बोतलबंद पानी पर हुआ ताजा अध्ययन हो या चीन, अमेरिका और जर्मनी के शोधकर्ताओं की रिपोर्ट, सब यही बताते हैं कि माइक्रोप्लास्टिक मनुष्य के जीवन और पर्यावरण, दोनों के लिए बड़ा खतरा बन गया है। कहना ग़लत नहीं होगा कि यदि समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया और अगर गंभीरता नहीं बरती गई, तो प्लास्टिक मानवजाति ही नहीं अपितु संपूर्ण जीवों व धरती के लिए एक बहुत बड़ा व गंभीर खतरा बन जाएगा। आज प्लास्टिक का जिम्मेदार उपयोग नहीं किया जा रहा है और न ही इसकी उचित रिसाइक्लिंग (पुनर्चक्रण) पर ही किसी का ध्यान है। आज हमारे घरों,आफिसेज से लेकर हर जगह प्लास्टिक का बोलबाला है। कोई भी जगह ऐसी नहीं है, जहां प्लास्टिक का किसी न किसी रूप में आविर्भाव नहीं हो। प्लास्टिक हमारी जिंदगी का बहुत ही अहम्, महत्वपूर्ण व जरूरी हिस्सा बन चुका है। हमारे शेविंग रेजर से लेकर हमारे टुथब्रश, नहाने की बाल्टी, मग, हमारे चश्मे, हमारे पेन(कलम), हमारे भोजन की थाली,प्लेट, कटोरी तक सब प्लास्टिक का ही है। संक्षेप में कहें तो हम माइक्रोप्लास्टिक्स का सामना हर जगह करते हैं। मसलन, कचरा, धूल, कपड़े, सौंदर्य प्रसाधन, सफाई उत्पाद, बारिश, समुद्री भोजन, उपज, नमक, आदि में।आज मिट्टी, पानी, भोजन, हवा और मानव शरीर सहित सभी जीवित जीवों में माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए हैं। पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि माइक्रोप्लास्टिक, प्लास्टिक के टूटने से बनते हैं और ये हवा, पानी, और ज़मीन में भी पाए जाते हैं। वास्तव में ये हमारे शरीर में सांस लेने और खाने के ज़रिए पहुंचते हैं। इतना ही नहीं, ये हमारे रक्त, फेफड़े, और प्लेसेंटा में भी पाए गए हैं। सच तो यह है कि ये हमारे शरीर के लगभग हर हिस्से में पाए जाते हैं, क्यों कि आज हम बेतहाशा रूप से हर चीज़ में प्लास्टिक का उपयोग कर रहे हैं। आज हम चाय , कोफी तक प्लास्टिक के डिस्पोजेबल कप्स में पीते हैं। बहरहाल, पाठकों को बताता चलूं कि अध्ययन बताते हैं कि औसतन, मनुष्य प्रतिदिन 240 कणों को साँस के ज़रिए अंदर लेता है। यूएनईपी के अनुसार, हर साल 23 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा दुनिया की जल प्रणालियों में लीक हो जाता है। हाल ही में जो शोध सामने आया है वह बोतलबंद पानी के उत्पादन में बेहतर गुणवत्ता नियंत्रण प्रक्रियाओं की आवश्यकता पर गंभीरता से प्रकाश डालता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि यह प्लास्टिक के उपयोग को कम करने और यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर भी जोर देता है कि उपयोग के बाद इसे(प्लास्टिक को) वैज्ञानिक रूप से संसाधित किया जाए। बहरहाल, यहां यह उल्लेखनीय है कि कुछ समय पहले साइंस एडवांस में प्रकाशित एक अध्ययन ने भी बताया था कि प्लास्टिक के नैनो कण इन्सान के दिमाग में प्रवेश कर रहे हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि माइक्रोप्लास्टिक के मानव स्वास्थ्य पर बहुत गंभीर प्रभाव पड़ते हैं। मसलन,ये सूजन, जीनोटॉक्सिसिटी, ऑक्सीडेटिव तनाव, एपोप्टोसिस, और नेक्रोसिस जैसी समस्याएं पैदा कर सकते हैं। इतना ही नहीं,ये कैंसर, हृदय रोग, सूजन आंत्र रोग, मधुमेह, रुमेटी गठिया, और ऑटो-इम्यून स्थिति जैसी बीमारियों से जुड़े हो सकते हैं। यहां तक कि ये प्रजनन संबंधी समस्याएं पैदा कर सकते हैं। पाठकों को बताता चलूं कि माइक्रोप्लास्टिक कण पौधों की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया को भी बाधित कर रहे हैं, जिससे गेहूं, धान और मक्का जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार में सालाना 14 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। प्रकाश संश्लेषण दरअसल, पौधों के भोजन बनाने की प्रक्रिया है, जिसमें वे श्वसन के विपरीत, कार्बन डाई ऑक्साइड ग्रहण करते हैं, और वातावरण में ऑक्सीजन छोड़ते हैं। लिहाजा यह प्रक्रिया हमारे ग्रह पर कार्बन डाई ऑक्साइड के स्तर को नियंत्रित रखने के लिए भी जरूरी है। प्लास्टिक एक ऐसी चीज़ है जो करोड़ों सालों तक भी नष्ट नहीं होती है। कुछ लोग यह समझते हैं कि प्लास्टिक को जलाने से यह खत्म हो जाता है, लेकिन यह ग़लत है। प्लास्टिक को जलाना तो और भी अधिक खतरनाक है।

गौरतलब है कि प्लास्टिक को जलाने से डाइऑक्सिन, फ़्यूरान, और पीसीबी जैसे हानिकारक रसायन निकलते हैं।बहरहाल, यहां यह भी उल्लेखनीय है कि प्लास्टिक के उत्पादन और विनाश से ऐसे कण और गैसें पैदा होती हैं, जो जलवायु परिवर्तन(क्लाइमेट चेंज) में योगदान करती हैं, और पर्यावरण में विघटित होने के लिए छोड़े गए प्लास्टिक से ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं। ग्रीन हाउस गैसों की बढ़ोतरी से धरती के तापमान में बढ़ोत्तरी होती है और हमारी धरती की पारिस्थितिकी गड़बड़ा जाती है। अध्ययन बताते हैं कि माइक्रोप्लास्टिक समुद्री सूक्ष्मजीवों की कार्बन डाइऑक्साइड को अलग करने और ऑक्सीजन का उत्पादन करने की वैश्विक रूप से महत्वपूर्ण भूमिकाओं को बाधित करते हैं। ये कमी हमारे और हमारे नीले ग्रह(धरती) के स्वास्थ्य को और ख़तरे में डालती है। आज हमारी धरती निरंतर प्लास्टिक की जद में आती चली जा रही है। प्लास्टिक के आंकड़े जानकर हर किसी को घोर आश्चर्य हो सकता है। मसलन,दुनिया भर में करीब 903 करोड़ टन प्लास्टिक है।यह 110 हाथियों के वज़न के बराबर है।दुनिया भर में हर साल करीब 450 मिलियन टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है।गौरतलब है कि 1950 में दुनिया भर में महज 15 लाख टन प्लास्टिक का उत्पादन होता था, जबकि वर्ष 2022 तक यह आंकड़ा 400 करोड़ टन पर पहुंच गया है, जिससे स्थिति की गंभीरता समझी जा सकती है। क्या यह आश्चर्यजनक और गंभीर बात नहीं है कि हर साल करीब 1.3 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा समुद्र में गिराया जाता है। एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्लास्टिक 11 किलोमीटर गहराई तक पाया गया है। इतना ही नहीं, दुनिया भर में पैदा हुए सात अरब टन प्लास्टिक कचरे में से 10 प्रतिशत से भी कम को रिसाइकिल किया गया है। आंकड़े बताते हैं कि हर साल प्लास्टिक प्रदूषण से 10 लाख से अधिक समुद्री पक्षी और 100,000 समुद्री जानवर मर जाते हैं। जानकारी मिलती है कि 100% शिशु समुद्री कछुओं के पेट में प्लास्टिक होता है। उल्लेखनीय है कि हमारे महासागर में अब 5.25 ट्रिलियन प्लास्टिक के वृहद और सूक्ष्म टुकड़े हैं, तथा महासागर के प्रत्येक वर्ग मील में 46,000 टुकड़े हैं, जिनका वजन 269,000 टन तक है। क्या यह गंभीर बात नहीं है कि वर्तमान में हमारे महासागरों में अनुमानतः 75 से 199 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा है, तथा प्रतिवर्ष 33 बिलियन पाउंड प्लास्टिक समुद्री पर्यावरण में प्रवेश कर रहा है और हर दिन लगभग 8 मिलियन प्लास्टिक के टुकड़े हमारे महासागरों में पहुँचते हैं।विश्व में प्रतिवर्ष 381 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, जो वर्ष 2034 तक दोगुना हो जाएगा।इसमें से 50% एकल-उपयोग प्लास्टिक है और केवल 9% का ही पुनर्चक्रण किया गया है। आंकड़े बताते हैं कि समुद्र की सतह का 88% हिस्सा प्लास्टिक कचरे से प्रदूषित है और हर साल 8 से 14 मिलियन टन तक कचरा हमारे महासागर में प्रवेश करता है। ब्रिटेन प्रतिवर्ष 1.7 मिलियन टन प्लास्टिक तथा अमेरिका हर साल 38 मिलियन टन प्लास्टिक का योगदान देता है। वास्तव में,प्लास्टिक पैकेजिंग इसका सबसे बड़ा दोषी है, जिसके कारण अकेले अमेरिका में प्रतिवर्ष 80 मिलियन टन कचरा उत्पन्न होता है। आज हर चीज की पैकेजिंग प्लास्टिक में की जाती है, हमें इससे बचना होगा और इसके बेहतर विकल्प तलाशने होंगे।आज हर मिनट 10 लाख से अधिक प्लास्टिक थैलियां कूड़े में फेंकी जाती हैं। इतना ही नहीं,विश्व में प्रति वर्ष 500 बिलियन से अधिक प्लास्टिक बैग का उपयोग किया जाता है-यानि पृथ्वी पर प्रत्येक व्यक्ति के लिए 150 बैग। प्लास्टिक के आंकड़े वास्तव में बहुत ही गंभीर हैं। 8.3 बिलियन प्लास्टिक स्ट्रॉ दुनिया के समुद्र तटों को प्रदूषित करते हैं, लेकिन केवल 1% स्ट्रॉ ही समुद्र में अपशिष्ट के रूप में पहुंचते हैं। इतना ही नहीं,मानव उपभोग के लिए पकड़ी गई 3 में से 1 मछली में प्लास्टिक होता है। अंत में यही कहूंगा कि वर्ष 2022 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा (यूएनईए) में प्लास्टिक संधि पर प्रस्ताव लाए जाने के बावजूद अब तक प्लास्टिक पर कोई ठोस कदम नहीं उठाये जा सकें हैं। वास्तव में यह दर्शाता है कि हम सभी प्लास्टिक को लेकर बहुत ही लापरवाही बरत रहे हैं। आज भी हमारे देश में सिंगल यूजर प्लास्टिक का धड़ल्ले से उपयोग किया जाता है। यह पर्यावरण प्रदूषण, मानव स्वास्थ्य और वन्य जीवों को बेतहाशा नुकसान पहुंचा रहा है। ग्लोबल वार्मिंग को जन्म दे रहा है। पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि भारत में 1 जुलाई, 2022 से सिंगल यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया गया है। इस प्रतिबंध के तहत, एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के निर्माण, आयात, भंडारण, वितरण, बिक्री, और इस्तेमाल पर रोक है, लेकिन इसके बावजूद जिस तरह से सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग बदस्तूर जारी है, वह वाकई चिंतित करने वाला है। आज जरूरत इस बात की है कि हम प्लास्टिक के उपयोग को लेकर सतर्कता बरतें, लोगों को जागरूक करें और हमारी प्रकृति, पर्यावरण को प्लास्टिक के ख़तरों से बचाएं। प्लास्टिक प्रदूषण आज एक वैश्विक समस्या है,हम सभी को इस समस्या से निपटने के लिए सामूहिकता से आगे आना होगा। तभी हम वास्तव में अपने नीले ग्रह को प्लास्टिक असुर से बचा पायेंगे।