प्रदूषित जल से जन-जीवन पर संकट: इंदौर की चेतावनी कहानी

Polluted water threatens life: Indore's cautionary tale

सुनील कुमार महला

कहां गया है कि ‘जल ही जीवन है।’ लेकिन जल किसी की जान ले लें तो यह बहुत दुखद ही कहा जाएगा। हाल ही में देश के सबसे साफ शहर माने जाने वाले इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में गंदा पानी पीने की वजह से उल्टी-दस्त होने से कम से कम छह लोगों की मौत की हो चुकी है तथा मीडिया में उपलब्ध जानकारी के अनुसार फिलहाल शहर के 41 अस्पतालों में कुल 203 मरीजों का इलाज चल रहा हैं और इनमें से 34 लोगों को आईसीयू में रखा गया है और उनकी हालत को देखते हुए इलाज पर खास ध्यान दिया जा रहा है। अच्छी बात यह है कि गंदे पानी पीने से उल्टी-दस्त फैलने के बाद प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग लगातार हालात पर नजर बनाए हुए है और मरीजों को जरूरी मेडिकल सुविधा दी जा रही है। हालांकि, लोकल लोगों का दावा है कि गंदे पानी से छह महीने के एक बच्चे समेत कुल 16 लोगों की जान गई है। मीडिया में उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह घटना मुख्यतः शहर के कुछ इलाकों में हुई, जहाँ सीवर लाइन और जलापूर्ति पाइपलाइन में लीकेज/क्रॉस-कनेक्शन के कारण दूषित पानी घरों तक पहुंचा। इस पानी के सेवन से लोगों को तेज दस्त, उल्टी, बुखार और डिहाइड्रेशन जैसी गंभीर समस्याएं हुईं तथा जांच में पानी में हानिकारक बैक्टीरिया (जैसे ई-कोलाई) पाए गए, जो मानव मल से फैलते हैं।भारत ही नहीं, आज विश्व स्तर पर दूषित जल एक गंभीर मानव-स्वास्थ्य और विकास समस्या बना हुआ है। बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि विश्व तथा भारत-दोनों स्तरों पर दूषित जल (वाटर पोल्यूशन) के कारण लगभग समान हैं, हालांकि जनसंख्या घनत्व, औद्योगिकीकरण और प्रबंधन की कमी के कारण भारत में इनका प्रभाव अधिक गंभीर रूप में दिखाई देता है। प्रमुख कारणों में प्रमुख रूप से औद्योगिक अपशिष्टों,घरेलू सीवेज और मलजल,कृषि रसायनों का अत्यधिक उपयोग,ठोस कचरा और प्लास्टिक प्रदूषण,धार्मिक और सामाजिक गतिविधियाँ,खनन और निर्माण गतिविधियाँ तथा भूजल का प्राकृतिक व मानवजनित प्रदूषण आदि को शामिल किया जा सकता है। यह बहुत ही दुखद है कि आज विभिन्न कल-कारखानों से निकलने वाला रासायनिक कचरा, भारी धातुएँ (सीसा, पारा, आर्सेनिक), रंग, एसिड और विषैले तत्व बिना पर्याप्त शोधन के नदियों, झीलों और भूजल में छोड़ दिए जाते हैं। इससे जल न केवल पीने योग्य नहीं रहता, बल्कि जलीय जीवन भी नष्ट होता है। हमारे यहां सीवेज सिस्टम भी ठीक नहीं है और आज यह देखने में आता है कि बड़े बड़े शहरों और कस्बों में उत्पन्न होने वाला सीवेज अक्सर बिना उपचार के नदियों में बिना किसी रोक-टोक के धड़ल्ले से प्रवाहित कर दिया जाता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज भारत में सीवेज ट्रीटमेंट क्षमता की कमी के कारण यह दूषित जल का सबसे बड़ा स्रोत बन चुका है। आज खेतों में अधिक उत्पादन लेने के लिए विभिन्न कीटनाशकों, उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है। वास्तव में,खेतों में प्रयुक्त रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और खरपतवारनाशी वर्षा के पानी के साथ बहकर जलस्रोतों में पहुँच जाते हैं। इससे नाइट्रेट और फॉस्फेट की मात्रा बढ़ती है, जो जल को विषैला बनाती है।प्लास्टिक, पॉलीथिन, घरेलू कचरा और मेडिकल वेस्ट का अनुचित निस्तारण नदियों और तालाबों को प्रदूषित करता है। आज के समय में तो

जल प्रदूषण का एक सबसे बड़ा और गंभीर कारण प्लास्टिक माना जा रहा है। आधुनिक जीवनशैली में प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग किया जा रहा है जैसे पॉलीथिन बैग, बोतलें, पैकेजिंग सामग्री और डिस्पोज़ेबल वस्तुएँ आदि। जिसके परिणामस्वरूप आज हमारी नदियों, झीलों और समुद्रों में बड़ी मात्रा में प्लास्टिक पहुँच रहा है।पाठक जानते हैं कि प्लास्टिक जैव-अपघटित नहीं होता, बल्कि सैकड़ों वर्षों तक जल में बना रहता है और धीरे-धीरे माइक्रोप्लास्टिक में बदल जाता है। ये सूक्ष्म कण जलीय जीवों द्वारा निगल लिए जाते हैं, जिससे उनकी मृत्यु होती है और अंततः यही विषैले कण खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव शरीर तक पहुँचते हैं। इसके अलावा प्लास्टिक जल प्रवाह को बाधित करता है, नालों को जाम करता है और जल स्रोतों की प्राकृतिक शुद्धता को नष्ट करता है। इसलिए प्लास्टिक प्रदूषण न केवल पर्यावरण बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए भी एक गंभीर खतरा बन चुका है। आज दूषित जल की समस्या वैश्विक है, लेकिन भारत में कचरा प्रबंधन की कमजोरी इसे और गंभीर बनाती है।हमारा देश एक धार्मिक देश है और हमारे यहां नदियों, झीलों, पानी के विभिन्न स्त्रोतों आदि में मूर्तियों का विसर्जन, पूजा सामग्री, अस्थि विसर्जन और सामूहिक स्नान जैसी गतिविधियाँ जल में रसायन, रंग और जैविक कचरा बढ़ाती हैं, जिससे जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। आज विकास के नाम पर अंधाधुंध खनन गतिविधियां की जा रहीं हैं और खनन से निकला मलबा, विभिन्न रसायन और निर्माण कार्यों से बहकर आने वाली मिट्टी नदियों में गाद और विषैले तत्व बढ़ाती है, जिससे जल प्रदूषित होता है। इसके अलावा, कुछ क्षेत्रों में आर्सेनिक, फ्लोराइड और लवणता जैसी समस्याएँ प्राकृतिक हैं, लेकिन अंधाधुंध दोहन और प्रदूषित जल का रिसाव इन्हें और गंभीर बना देता है।निष्कर्षतः, हम यहां यह बात कही सकते हैं कि आज विश्व और भारत दोनों में दूषित जल की समस्या मानव गतिविधियों का ही परिणाम है। यदि समय रहते प्रभावी जल प्रबंधन, अपशिष्ट शोधन और जन-जागरूकता नहीं बढ़ाई गई, तो यह समस्या भविष्य में और भी भयावह रूप ले सकती है। यदि हम यहां जल से संबंधित आंकड़ों की बात करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूनिसेफ के अनुसार आज भी दुनिया में लगभग 2.2 अरब लोग सुरक्षित रूप से प्रबंधित पेयजल सेवा से वंचित हैं, यानी उन्हें ऐसा पानी नहीं मिल पाता जो घर पर उपलब्ध, निरंतर और दूषण-मुक्त हो। इनमें से करीब 1.7 अरब लोग ऐसे जल स्रोतों का उपयोग करते हैं, जिनमें मल-जनित प्रदूषण का जोखिम रहता है, जबकि लगभग 115 मिलियन लोग सीधे नदियों, तालाबों और झीलों जैसे सतही जल पर निर्भर हैं। आंकड़े बताते हैं कि दूषित पानी के सेवन से हर वर्ष लगभग 5 लाख से अधिक लोगों की मौत होती है, जिनमें बड़ी संख्या छोटे बच्चों की होती है। इसके साथ-साथ दुनिया में करीब 3.5 अरब लोग सुरक्षित स्वच्छता सुविधाओं से भी वंचित हैं, जिससे जल स्रोतों का प्रदूषण और बढ़ जाता है। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि दूषित जल वैश्विक स्वास्थ्य, गरीबी और असमानता से गहराई से जुड़ी समस्या है।भारत में यदि दूषित जल की बात करें तो हमारे देश में दूषित जल की समस्या एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है। सरकारी व अंतरराष्ट्रीय आकलनों के अनुसार देश की लगभग 62% आबादी पेयजल के लिए भूजल पर निर्भर है, जबकि 250 से अधिक जिलों में भूजल फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाइट्रेट, आयरन और भारी धातुओं से प्रदूषित पाया गया है । संसद में प्रस्तुत एक जानकारी के अनुसार 26,000 से अधिक ग्रामीण बस्तियों में लोगों को आज भी दूषित पानी पीने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।शहरी क्षेत्रों में भी स्थिति चिंताजनक है।एक आकलन के मुताबिक बहुत कम शहरी परिवारों को सीधे नल से सुरक्षित पेयजल उपलब्ध है, जबकि अधिकांश लोग फिल्टर/आरओ पर निर्भर हैं, जिसकी गुणवत्ता हर जगह सुनिश्चित नहीं है । विश्व स्तर पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत में असुरक्षित पानी से जुड़ी मौतों की दर लगभग 35 प्रति एक लाख जनसंख्या है, जो वैश्विक औसत से अधिक है । दूषित जल के कारण डायरिया, हैजा, टाइफाइड जैसी जलजनित बीमारियाँ व्यापक रूप से फैलती हैं, जिससे खासकर बच्चों और ग्रामीण आबादी के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है। अंत में यही कहूंगा कि साफ जल प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकता है। हमें इसे दूषित होने से बचाना होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो जल को दूषित होने से बचाना आज की सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है। इसके लिए व्यक्तिगत, सामाजिक और सरकारी—तीनों स्तरों पर ठोस कदम उठाने होंगे। प्रमुख प्रभावी उपायों में क्रमशः प्लास्टिक और ठोस कचरे का सही निपटान बहुत ही महत्वपूर्ण और अहम् है। वास्तव में,नदियों, तालाबों और झीलों में प्लास्टिक, पॉलीथिन व अन्य कचरा फेंकने पर सख्त रोक होनी चाहिए तथा कचरे का पृथक्करण (गीला-सूखा) और पुनर्चक्रण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।औद्योगिक अपशिष्ट का उपचार किया जाना चाहिए। दरअसल,उद्योगों से निकलने वाले रासायनिक अपशिष्ट को सीधे जलस्रोतों में छोड़ने के बजाय शोधन संयंत्रों में उपचारित करना अनिवार्य किया जाना चाहिए और नियमों का सख्ती से पालन होना चाहिए। घरेलू सीवेज का शोधन जरूरी है।शहरों और कस्बों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि गंदा पानी नदियों में जाने से पहले साफ किया जा सके।जल को दूषित होने से बचाने के लिए हमें यह चाहिए कि हम कृषि में रसायनों का सीमित, संतुलित उपयोग करें। हमें यह याद रखना चाहिए कि जैविक खेती को अपनाने से भूजल और सतही जल प्रदूषण कम होता है। इसके अलावा खुले में शौच पर पूर्ण रोक,धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों में सावधानी बरतकर भी हम जल को प्रदूषित होने से बचा सकते हैं।पूजा-सामग्री, मूर्तियों, फूल-मालाओं और राख(भभूत )आदि को नदियों में प्रवाहित करने के बजाय वैकल्पिक, पर्यावरण-अनुकूल तरीकों को अपनाया जाना चाहिए। वर्षा जल संचयन को महत्व देना चाहिए, जैसा कि वर्षा जल संचयन से भूजल स्तर बढ़ता है और प्रदूषित जल पर निर्भरता घटती है।जल संरक्षण और जल की शुद्धता के लिए जन-जागरूकता और शिक्षा तो जरूरी है ही। वास्तव में,जल संरक्षण और स्वच्छता को लेकर लोगों में जागरूकता फैलाना अत्यंत आवश्यक है, ताकि हर नागरिक जल को दूषित होने से बचाने में अपनी भूमिका निभा सके।संक्षेप में, यह बात कही जा सकती है कि जल संरक्षण केवल सरकार की ही जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह समाज के हर व्यक्ति का साझा दायित्व है।याद रखिए कि छोटे-छोटे प्रयास मिलकर ही स्वच्छ और सुरक्षित जल भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं।