प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
बांग्लादेश में हालिया चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनता की स्पष्ट और सशक्त अभिव्यक्ति बनकर सामने आया है। 12 फ़रवरी 2026 को हुए इस ऐतिहासिक मतदान में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने 299 क्षेत्रों वाले चुनाव में 209-212 सीटें जीतकर निर्णायक बहुमत हासिल किया। यह परिणाम वर्षों से चले आ रहे राजनीतिक असंतोष, प्रशासनिक कमज़ोरियों और लोकतांत्रिक अपेक्षाओं का स्वाभाविक नतीजा है। इस जनादेश ने बांग्लादेश की राजनीति को नई दिशा दी है और क्षेत्रीय संतुलन पर भी इसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। भारत के लिए यह परिवर्तन विशेष महत्व रखता है, क्योंकि पड़ोसी देश की स्थिरता, नीतियाँ और नेतृत्व सीधे उसकी सुरक्षा, व्यापार और रणनीतिक हितों से जुड़े हुए हैं। यह चुनाव केवल सरकार बदलने की घटना नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति की आधारशिला रखने वाला महत्वपूर्ण मोड़ बन चुका है।
इस परिवर्तन की धुरी में तारीक रहमान का नेतृत्व सबसे प्रभावशाली भूमिका निभाता दिखाई देता है। सत्रह वर्षों के लंबे निर्वासन के बाद उनकी स्वदेश वापसी और फिर दो सीटों से निर्णायक जीत, बांग्लादेशी राजनीति में दुर्लभ और ऐतिहासिक घटना मानी जा रही है। उन्होंने स्वयं को केवल एक राजनीतिक उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि संघर्ष, धैर्य और प्रतिरोध से तपकर निकले नेता के रूप में स्थापित किया है। उनका चुनावी अभियान सत्ता प्राप्ति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने जनता के मन में यह विश्वास जगाया कि व्यवस्था को बदला जा सकता है और शासन को जवाबदेह बनाया जा सकता है। भारत के लिए यह तथ्य विशेष महत्त्व रखता है कि उन्होंने सार्वजनिक मंचों से क्षेत्रीय सहयोग, व्यापार विस्तार और स्थिर संबंधों की आवश्यकता पर जोर दिया है। यदि यह दृष्टिकोण ठोस नीतियों में बदलता है, तो भारत-बांग्लादेश संबंधों को नई ऊर्जा और मजबूती मिल सकती है।
इस राजनीतिक परिवर्तन की पृष्ठभूमि वर्ष 2024 के छात्र आंदोलनों में गहराई से जुड़ी हुई है, जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता को जड़ से हिला दिया था। उनका सत्ता से हटना केवल एक सरकार का अंत नहीं, बल्कि केंद्रीकृत शासन, कथित भ्रष्टाचार और राजनीतिक दमन के विरुद्ध जनता के व्यापक असंतोष की खुली अभिव्यक्ति था। इसके बाद गठित अंतरिम सरकार का नेतृत्व मुहम्मद यूनुस ने किया, जिन्होंने सीमित समय और दबावपूर्ण परिस्थितियों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पुनर्जीवित किया। इस संक्रमणकाल में भारत ने संयम, संतुलन और संवाद की नीति अपनाई, जिससे क्षेत्रीय अस्थिरता को फैलने से रोका जा सका। यह भारत की परिपक्व और जिम्मेदार कूटनीति का स्पष्ट उदाहरण माना जाता है।
बीएनपी की इस ऐतिहासिक विजय का सबसे मजबूत आधार जनता का गहरा और व्यापक असंतोष रहा है। बेरोज़गारी, बढ़ती महंगाई, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, मानवाधिकार उल्लंघन और राजनीतिक दमन ने आम नागरिक के धैर्य की सीमा को तोड़ दिया था। बीएनपी ने “लोकतंत्र की बहाली” और “नया बांग्लादेश” जैसे प्रभावशाली नारों के माध्यम से इस असंतोष को संगठित राजनीतिक चेतना में परिवर्तित किया। इसके विपरीत, जमात-ए-इस्लामी गठबंधन अपेक्षित जनसमर्थन हासिल करने में असफल रहा। भारत के दृष्टिकोण से यह स्थिति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि कट्टरपंथी शक्तियों को सीमित समर्थन मिलना क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सकारात्मक संकेत माना जाता है। इससे सीमा पार उग्रवाद और अस्थिरता की आशंकाएं फिलहाल कम होती हुई दिखाई देती हैं।
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते केवल औपचारिक कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे इतिहास, संस्कृति और आर्थिक सहयोग की गहरी नींव पर टिके हुए हैं। लगभग 4,096 किलोमीटर लंबी साझा सीमा, व्यापारिक मार्गों का विस्तृत जाल और पीढ़ियों से जुड़े सामाजिक संबंध दोनों देशों को स्वाभाविक रणनीतिक साझेदार बनाते हैं। भारत के लिए बांग्लादेश पूर्वोत्तर राज्यों की जीवनरेखा, समुद्री संपर्क का प्रमुख द्वार और क्षेत्रीय व्यापार का अहम सेतु है। अतीत में खालिदा जिया के कार्यकाल में द्विपक्षीय सहयोग को नई गति मिली थी। अब नई सरकार से भी अपेक्षा है कि वह ऊर्जा, रेल, बंदरगाह और कनेक्टिविटी परियोजनाओं को तेज़ी से आगे बढ़ाकर आर्थिक साझेदारी को और सशक्त बनाएगी। इससे न केवल व्यापार बढ़ेगा, बल्कि क्षेत्रीय विकास को भी स्थायित्व मिलेगा।
सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग भारत-बांग्लादेश संबंधों की सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण कड़ी है। अवैध घुसपैठ, नशीले पदार्थों की तस्करी, मानव व्यापार और आतंकी नेटवर्क जैसी चुनौतियाँ दोनों देशों के लिए समान रूप से चिंता का विषय हैं। शेख हसीना सरकार के दौरान इन मुद्दों पर कड़ा नियंत्रण देखने को मिला था, जिससे सीमा क्षेत्र में अपेक्षाकृत स्थिरता बनी रही। अब बीएनपी सरकार से भी उसी स्तर की प्रतिबद्धता और सतर्कता की उम्मीद की जा रही है। यदि नई सरकार इस मोर्चे पर दृढ़ और निरंतर प्रयास करती है, तो भारत-बांग्लादेश सुरक्षा सहयोग और अधिक मजबूत होगा। इसके साथ ही, आर्थिक सुधार, विदेशी निवेश और निर्यात में वृद्धि दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को दीर्घकालिक लाभ पहुँचा सकती है, जहाँ स्थिरता और विकास एक-दूसरे के पूरक बनकर उभरेंगे।
इस चुनाव की सबसे सकारात्मक और आश्वस्त करने वाली विशेषता कुल मिलाकर शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण रही, हालांकि छिटपुट हिंसा की घटनाएं भी हुईं। विपक्ष, अंतरिम सरकार और प्रशासन ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं का सम्मान करते हुए जिम्मेदार व्यवहार का परिचय दिया। यह संकेत देता है कि बांग्लादेश धीरे-धीरे राजनीतिक परिपक्वता और संस्थागत मजबूती की ओर बढ़ रहा है। हालांकि, असली परीक्षा अब शुरू होती है। भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण, न्यायिक स्वतंत्रता, मीडिया की स्वायत्तता और प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर ठोस और निरंतर कार्रवाई आवश्यक होगी। भारत के लिए भी यह समय है कि वह केवल सरकारों तक सीमित न रहे, बल्कि संस्थागत और सामाजिक स्तर पर भी रिश्तों को मजबूत करे, ताकि द्विपक्षीय संबंध स्थायी, भरोसेमंद और भविष्य की चुनौतियों के प्रति सक्षम बन सकें।
आज बांग्लादेश जिस नए राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है, वह केवल वर्तमान की दिशा नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों के भविष्य को भी आकार देगा। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की यह ऐतिहासिक विजय देश के लिए नई उम्मीदों, नई जिम्मेदारियों और नई अपेक्षाओं का संकेत है, जबकि भारत के लिए यह सहयोग और साझेदारी को नई ऊंचाई देने का अवसर बनकर उभरी है। अब समय आ गया है कि दोनों देश पुराने अविश्वास, राजनीतिक संदेह और बीती हुई कटुताओं को पीछे छोड़कर साझा हितों पर आधारित मजबूत संबंध विकसित करें। यदि नई सरकार पारदर्शिता, स्थिरता और विकास को प्राथमिकता देती है और भारत संतुलित व दूरदर्शी नीति अपनाता है, तो यह साझेदारी पूरे दक्षिण एशिया के लिए शांति, सुरक्षा और समृद्धि की मिसाल बन सकती है। यही वह क्षण है, जब दूरदृष्टि और जिम्मेदारी मिलकर भविष्य की मजबूत आधारशिला रख सकती हैं।





