पूर्व सेनाध्यक्ष एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित किताब पर राहुल गांधी की गलतबयानी

Rahul Gandhi's misrepresentation of former Army Chief MM Naravane's unpublished book

  • राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ करते राहुल गांधी
  • भारतीय आक्रामकता के चलते चीन ने घुटने टेक दिए थे

प्रमोद भार्गव

गलतबयानी के आदी नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक बार फिर संसद में गलतबयानी करके राष्ट्र की सीमाई सुरक्षा से खिलवाड़ किया है। राहुल को यह तक सही ज्ञान नहीं है कि जिस भूमि-विवाद को लेकर वे संसद में बयान दे रहे हैं, वह डोकलाम नहीं, बल्कि गलवन घाटी में हुए चीन के साथ सैनिक टकराव का मामला है। दरअसल, राहुल यह जताना चाहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मुद्दे को लेकर चीन के आगे झुके हैं और चीन ने हमारी जमीन पर कब्जा कर लिया है। यही नहीं, इस मुद्दे के संदर्भ में राहुल यहां तक कह चुके हैं कि चीनी सेना ने भारतीय सैनिकों को पीटा था। इस कथन को लेकर शीर्ष न्यायालय उन्हें फटकार भी लगा चुका है, लेकिन उन्हें राष्ट्रीय अस्मिता से खेलने और सैनिकों की बेइज्जती करने में कोई लाज-शर्म नहीं आती। जबकि इस मामले में सच्चाई यह है कि भारतीय आक्रामकता के समक्ष चीन ने घुटने टेक दिए थे और वह चीनी सैनिकों की वापसी को लेकर मजबूर हुआ था।

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लोकसभा में चर्चा के दौरान उस वक्त जोरदार हंगामा हुआ, जब राहुल गांधी ने पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब का हवाला देते हुए भारत-चीन विवाद पर सतही बयान दिया। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और गृहमंत्री अमित शाह ने इस बयान का कड़ा विरोध करते हुए सदन को गुमराह करने का आरोप लगाया। सिंह ने कहा कि ‘अप्रकाशित किताब या अप्रमाणित सामग्री का हवाला नहीं दिया जा सकता। इस तरह के उदाहरण सदन में भ्रम फैलाते हैं।’ अमित शाह ने हस्तक्षेप करते हुए कहा, ‘राहुल किसी मैगजीन की रिपोर्ट के आधार पर गलत तथ्य प्रस्तुत कर रहे हैं।’ दरअसल, राहुल कहना चाहते थे कि मोदी सरकार ने चीनी सेना के भारत-भूमि पर कब्जा करने के विरोध में पर्याप्त साहस नहीं दिखाया। जबकि हकीकत यह है कि चीन को भारतीय सेना के कड़े रुख का सामना करना पड़ा था, फलस्वरूप चीन को बातचीत के जरिए समझौते के लिए मजबूर होना पड़ा। इस कारण गलवन में ही नहीं, लद्दाख के कुछ अन्य क्षेत्रों में भी यथास्थिति बहाल हो गई थी। नरवणे भी इस सिलसिले में कई बार वस्तुस्थिति की सच्चाई से अवगत करा चुके हैं।

भारतीय सैनिकों की आक्रामकता के चलते चीन ने पैंगोंग झील के उत्तरी और दक्षिणी छोर से न केवल अपनी सेना को वापस हटा लिया था, बल्कि यह भी स्वीकार करने को मजबूर हुआ था कि गलवन घाटी में भारत और चीन की सेनाओं के बीच हुई झड़प में उसके पांच सैनिक मारे गए हैं। हालांकि रूस की गुप्तचर संस्था व अन्य स्रोतों से जो जानकारी सामने आई थी, उसके अनुसार चीन के 45 से लेकर 70 सैनिक मारे गए थे, क्योंकि इन सैनिकों के शवों को ले जाने के लिए चीनी सेना ने कई वाहनों का इंतजाम किया था। इनके अंतिम संस्कार के वीडियो भी वायरल हुए थे। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के कमांडर समेत अन्य सैनिकों के मारे जाने की पुष्टि चीन सरकार के प्रमुख समाचार-पत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने भी की थी। इन्हें चीन के केंद्रीय सैन्य आयोग ने वीरता पुरस्कारों से सम्मानित भी किया था। 15 जून 2020 को घटी इस घटना में भारतीय सेना की बिहार रेजिमेंट के कर्नल संतोष बाबू को शहीद होना पड़ा था। उन्हें भारत सरकार ने परमवीर चक्र से अलंकृत किया था। भारतीय सेना के इस ‘स्नो लेपर्ड’ ऑपरेशन के चलते दोनों देशों के बीच देपसांग, हॉट स्प्रिंग्स और गोगरा क्षेत्र से सेनाओं को पीछे हटाए जाने की वरिष्ठ कमांडर स्तर की बातचीत के बाद चीनी सेना वापस हुई थी।

भारतीय नेतृत्व की आक्रामकता और आत्मनिर्भरता की ठोस व निर्णायक राजनीति के चलते यह संभव हुआ था। चीनी अधिकारियों को घोषणा करनी पड़ी थी कि चीन अपनी सेना पीछे हटाने को राजी हो गया है। इसके अगले दिन रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने यही सूचना संसद में दोहराते हुए कहा था कि ‘दोनों देशों की सेनाओं के पीछे हटने के समझौते के क्रम में भारत को एक इंच भी जमीन गंवानी नहीं पड़ी है। इस समझौते में तीन शर्तें तय हुई हैं। पहली, दोनों देशों द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का सम्मान किया जाएगा। दूसरा, कोई भी देश एलएसी की स्थिति को बदलने की एकतरफा कोशिश नहीं करेगा। तीसरा, दोनों देशों को संधि की सभी शर्तों को मानना बाध्यकारी होगा।’ यह समझौता बताता है कि आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह के कड़े तेवरों के चलते चीन की अकड़ कमजोर पड़ती चली गई थी। इस मामले में यह पहली बार संभव हुआ था कि चीन ने लिखित में सेना-वापसी की शर्तों को माना था।

इस समय भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय ने पैंगोंग झील क्षेत्र से सैनिकों की वापसी को लेकर साफ किया था कि भारतीय भू-भाग फिंगर-4 तक ही नहीं, बल्कि भारत के मानचित्र के अनुसार यह भू-भाग फिंगर-8 तक है। पूर्वी लद्दाख में राष्ट्रीय हितों और भूमि की रक्षा इसलिए संभव हो पाई, क्योंकि सरकार ने सेना को खुली छूट दे दी थी। सेना ने बीस जवान राष्ट्र की बलिवेदी पर न्यौछावर करके अपनी क्षमता और प्रतिबद्धता का भरोसा जता दिया था। शायद इसीलिए रक्षा मंत्रालय को कहना पड़ा था कि सैन्य बलों के बलिदान से हासिल हुई इस उपलब्धि पर जो लोग सवाल खड़े कर रहे हैं, वे इन सैनिकों का उपहास उड़ा रहे हैं। दरअसल, भारत के मानचित्र में 43,000 वर्ग किमी का वह भू-भाग भी शामिल है, जो 1962 से चीन के अवैध कब्जे में है। इसीलिए राजनाथ सिंह को संसद में कहना पड़ा था कि भारतीय नजरिए से एलएसी फिंगर-8 तक है, जिसमें चीन के कब्जे वाला इलाका भी शामिल है। पैंगोंग झील के उत्तरी किनारे के दोनों तरफ स्थायी पोस्ट स्थापित हैं। भारत की तरफ फिंगर-3 के करीब धानसिंह थापा पोस्ट है और चीन की तरफ फिंगर-8 के निकट पूर्व दिशा में भी स्थायी पोस्ट स्थापित है। समझौते के तहत दोनों पक्ष अग्रिम मोर्चों पर सेनाओं की जो तैनाती मई 2020 में हुई थी, उससे पीछे हटेंगे, लेकिन स्थायी पोस्टों पर तैनाती बरकरार रहेगी। याद रहे, भारत और चीन के बीच संबंध तब गहरे गए थे, जब गलवन घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच बिना हथियारों के खूनी संघर्ष छिड़ गया था।

उस समय वैश्विक समुदाय यह सोचकर विवश था कि आखिरकार शक्तिशाली व अड़ियल चीन भारत के आगे नतमस्तक क्यों हुआ था। इसका सीधा-सा उत्तर है—भारत की चीन के विरुद्ध चौतरफा कूटनीतिक रणनीति व सत्ताधारी नेतृत्व की दृढ़ इच्छाशक्ति। नतीजतन, भारत ने सैन्य मुकाबले में तो चीन को पछाड़ा ही, आर्थिक मोर्चे पर भी पटकनी दे डाली। चीन से कई उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और उसके सैकड़ों ऐप एवं संचार उपकरण प्रतिबंधित कर दिए गए थे। वैश्विक स्तर पर भारत ने क्वाड यानी क्वाड्रीलैटरल सिक्योरिटी डायलॉग में नए प्राण फूंके थे। इसमें भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया व अमेरिका शामिल हैं। इसका उद्देश्य एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शांति की स्थापना और शक्ति का संतुलन बनाए रखना है। विदेश मंत्री जयशंकर ने इसकी कमान संभाली और जापान में 6 अक्टूबर 2020 को मंत्रिस्तरीय बैठक कर चीन की दादागिरी के विरुद्ध व्यूह-रचना की थी। इस बैठक के पहले ही अमेरिका ने यह कहकर चीन की हवा खराब कर दी थी कि चीन अपनी विस्तारवादी नीति से बाज आए; अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है। क्वाड समुद्री लुटेरों के विरुद्ध भी कठोर कार्रवाई को अंजाम दे चुका है।

चीन के इतने दमन के बावजूद राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध अनर्गल प्रलाप सड़क से लेकर संसद तक करते रहते हैं। उन्हें अत्यंत घटिया भाषा के इस्तेमाल में भी कोई शर्म-संकोच नहीं है। राहुल ने कहा था कि सीमा पर अप्रैल 2020 की स्थिति बहाल नहीं हुई है। मोदी ने चीन के समक्ष अपना मत्था टेक दिया है। फिंगर-3 से 4 तक की जमीन हिंदुस्तान की है, वह अब चीन को सौंप दी गई है। उनका यह बयान सरकार की हंसी उड़ाने वाला तो था ही, सेना का मनोबल तोड़ने वाला भी था, क्योंकि अंततः सीमा पर सेना ने ही दम दिखाकर चीन को पीछे हटने के लिए विवश किया था। राहुल के अनर्गल बयान संदेह पैदा करते हैं कि क्या राहुल सुपारी लेकर देश को बदनाम करने के षड्यंत्र और सुरक्षाबलों के मनोबल को तोड़ने में लगे हैं? जबकि राहुल को याद करना चाहिए कि 1962 में चीन ने भारत की जो जमीन हड़पी थी, उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। लोकतंत्र में सवाल उठाना बुरी बात नहीं है, लेकिन सवाल बेतुके और तथ्यहीन नहीं होने चाहिए।