राजस्थान में बदला चुनावी नियम : अब दो से अधिक बच्चे वाले भी लड़ सकेंगे पंचायत और निकाय चुनाव

Rajasthan Election Rules Changed: Now Those With More Than Two Children Can Also Contest Panchayat and Municipal Elections

राजस्थान विधानसभा में ऐतिहासिक विधेयक पारित

गोपेन्द्र नाथ भट्ट

राजस्थान की राजनीति और स्थानीय स्वशासन व्यवस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया है। राजस्थान विधानसभा ने हाल ही में एक विधेयक पारित कर वह प्रावधान समाप्त कर दिया है, जिसके तहत दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्ति को पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव लड़ने से अयोग्य माना जाता था। इस निर्णय के साथ अब राज्य में ऐसे लोग भी स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव लड़ सकेंगे जिनके दो से अधिक बच्चे हैं।

राज्य विधानसभा में यह संशोधन स्थानीय स्वशासन से जुड़े कानूनों में परिवर्तन करके किया गया है। प्रदेश में भाजपा सरकार के मुखिया भैरोसिंह शेखावत के मुख्यमंत्रित्व काल यानी वर्षों से लागू इस प्रावधान को हटाने के फैसले ने राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। समर्थक इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का विस्तार मान रहे हैं, जबकि कुछ विशेषज्ञ इसे जनसंख्या नियंत्रण नीति के संदर्भ में बहस का विषय बता रहे हैं।दरअसल, राजस्थान में पंचायती राज और नगर निकाय चुनावों के लिए लंबे समय से “दो से अधिक बच्चे” का नियम लागू था। इसके तहत जिन व्यक्तियों के दो से अधिक बच्चे होते थे, वे चुनाव लड़ने के पात्र नहीं माने जाते थे। यह नियम मूलतः जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से लागू किया गया था। लेकिन समय के साथ यह प्रावधान विवादों और कानूनी चुनौतियों का विषय भी बनता रहा।

राज्य सरकार का तर्क है कि यह प्रावधान लोकतांत्रिक भागीदारी को सीमित करता था और इससे अनेक सक्षम तथा लोकप्रिय लोग चुनाव लड़ने से वंचित रह जाते थे। सरकार के अनुसार स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं में अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए आवश्यक है। इसी सोच के तहत यह विधेयक लाया गया और सदन में पारित किया गया।

विधानसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष के सदस्यों ने कहा कि लोकतंत्र में चुनाव लड़ना नागरिकों का मूल अधिकार है और परिवार के आकार के आधार पर किसी व्यक्ति को इससे वंचित करना उचित नहीं है। उनका कहना था कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए जागरूकता, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से प्रयास किए जाने चाहिए, न कि चुनावी अयोग्यता के माध्यम से।हालांकि विपक्ष के कुछ सदस्यों ने इस बदलाव पर चिंता भी व्यक्त की। उनका तर्क था कि जब देश और दुनिया में जनसंख्या नियंत्रण एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, तब इस प्रकार के प्रावधान को हटाना सही संदेश नहीं देगा। उन्होंने कहा कि पहले यह नियम जनसंख्या नियंत्रण के प्रति एक सामाजिक संदेश देता था और अब इसके हटने से उस प्रयास को झटका लग सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रभाव ग्रामीण और स्थानीय राजनीति पर पड़ेगा। राजस्थान में पंचायत और नगरीय निकायों की राजनीति में बड़ी संख्या में ऐसे लोग सक्रिय हैं जिनके परिवार बड़े हैं। पहले वे चुनाव लड़ने के लिए पात्र नहीं होते थे, लेकिन अब उनके लिए भी राजनीतिक अवसर खुल जाएंगे। इससे स्थानीय स्तर पर नेतृत्व का दायरा और व्यापक हो सकता है।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस फैसले से लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और अधिक लोग चुनावी प्रक्रिया में भाग ले सकेंगे। इससे स्थानीय निकायों में प्रतिनिधित्व का दायरा बढ़ने की संभावना है। हालांकि इसके साथ यह भी जरूरी होगा कि सरकार जनसंख्या नियंत्रण और परिवार कल्याण से जुड़ी नीतियों को अन्य माध्यमों से प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाए।

कुल मिलाकर देखा जाए तो राजस्थान विधानसभा द्वारा पारित यह विधेयक स्थानीय लोकतंत्र की दिशा में एक बड़ा नीतिगत बदलाव माना जा रहा है। इससे पंचायती राज और नगरीय निकायों की राजनीति में नई परिस्थितियाँ बनेंगी और अधिक लोगों को जनप्रतिनिधि बनने का अवसर मिलेगा। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस फैसले का राज्य की स्थानीय राजनीति और सामाजिक सोच पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ता है।