अब राजस्थान के स्कूलों में बच्चे पढ़ेंगे स्थानीय भाषा: बहुभाषी शिक्षा परियोजना की शुरुआत

Rajasthan schools will now teach children in local languages: Multilingual Education Project launched

राजस्थान की स्कूली किताबों में ‘लाडू’, ‘रोटलो’ और ‘मोटो बापो’ जैसे शब्द होंगे शामिल

गोपेन्द्र नाथ भट्ट

राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने करने की वर्षों पुरानी मांग के मध्य
भारत सरकार की नई शिक्षा नीति के अन्तर्गत स्कूली पाठ्यक्रम में स्थानीय भाषा को शामिल कर पढ़ाई कराने की अनवरत मांग के मध्य एक सकून भरी खबर आई है और राजस्थान में स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण और अभिनव पहल की शुरुआत की जा रही है। राजस्थान के शिक्षा विभाग ने प्रदेश के सरकारी स्कूलों में “बहुभाषी शिक्षा परियोजना” लागू करने का निर्णय लिया है, जिसके तहत अब छोटे बच्चों को उनकी मातृभाषा और स्थानीय भाषा में पढ़ाया जाएगा। इस पहल के अन्तर्गत शिक्षा विभाग द्वारा राजस्थान में बहुभाषी शिक्षा परियोजना की शुरुआत के साथ ही अब राजस्थान की स्कूली किताबों में ‘लाडू’, ‘रोटलो’ और ‘मोटो बापो’ जैसे शब्द शामिल होंगे।

यह परियोजना संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ), ‘रूम टू रीड’ और लैंग्वेज एंड लर्निंग फाउंडेशन’ के सहयोग से संचालित होगी। इससे घर एवं स्कूल के वातावरण के बीच भाषायी असमानता नहीं होगी।पहले चरण में दक्षिणी पश्चिमी राजस्थान के नौ जिलों उदयपुर,प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, चित्तौड़गढ़, राजसमंद, पाली, सिरोही को शामिल किया है।

इस पहल का उद्देश्य शिक्षा को अधिक सहज, प्रभावी और बच्चों के अनुकूल बनाना है। नई शिक्षा नीति के अनुरूप यह परियोजना प्रारंभिक कक्षाओं में लागू की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब बच्चे अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं, तो उनकी समझ, अभिव्यक्ति और सीखने की क्षमता बेहतर होती है। यही कारण है कि अब कक्षा 1 से 5 तक के विद्यार्थियों को उनकी स्थानीय बोली—जैसे , मेवाड़ी, वागड़ी ,मारवाड़ी आदि में शिक्षा मिल सकेगी और कालान्तर में प्रदेश के अन्य अंचलों हाड़ौती, शेखावाटी आदि अन्य आंचलिक भाषाओं के माध्यम से पढ़ाने की योजना बनाई जाएगी।

शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार इस परियोजना के तहत पाठ्यपुस्तकों और शिक्षण सामग्री को स्थानीय भाषाओं में तैयार किया जा रहा है। साथ ही, शिक्षकों को भी विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है ताकि वे बच्चों को उनकी भाषा में प्रभावी ढंग से पढ़ा सकें। इससे कक्षा में बच्चों की भागीदारी बढ़ेगी और वे बिना झिझक अपनी बात रख सकेंगे।

विशेषज्ञ बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में कई बच्चे हिंदी या अंग्रेजी माध्यम को समझने में प्रारंभिक स्तर पर कठिनाई महसूस करते हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास प्रभावित होता है। बहुभाषी शिक्षा इस समस्या का समाधान प्रस्तुत करती है। यह न केवल सीखने की प्रक्रिया को सरल बनाती है, बल्कि बच्चों को अपनी संस्कृति और भाषा से भी जोड़ती है।

इस परियोजना का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह स्थानीय भाषाओं और बोलियों के संरक्षण में भी सहायक सिद्ध होगी। आज के दौर में कई क्षेत्रीय भाषाएं विलुप्त होने के कगार पर हैं। ऐसे में जब इन्हें शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनाया जाएगा, तो इनका अस्तित्व और अधिक मजबूत होगा। हालांकि, इस पहल के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती है सभी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त और मानकीकृत पाठ्य सामग्री तैयार करना। इसके अलावा, शिक्षकों का प्रशिक्षण और संसाधनों की उपलब्धता भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। कई स्कूलों में अभी भी बुनियादी सुविधाओं की कमी है, जिसे दूर करना आवश्यक होगा।

शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस परियोजना को प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। बच्चों में सीखने की रुचि बढ़ेगी, ड्रॉपआउट दर में कमी आएगी और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा।

राज्य सरकार इस परियोजना को चरणबद्ध तरीके से लागू करने की योजना बना रही है। शुरुआती चरण में चयनित जिलों में इसे शुरू किया जाएगा और सफलता के आधार पर पूरे प्रदेश में विस्तार किया जाएगा। इसके लिए शिक्षकों, अभिभावकों और स्थानीय समुदाय की सहभागिता भी सुनिश्चित की जा रही है।

अंततः कहा जा सकता है कि राजस्थान में शुरू की जा रही यह बहुभाषी शिक्षा परियोजना केवल एक शैक्षिक सुधार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि इसे सही दिशा और संसाधनों के साथ लागू किया गया, तो यह न केवल बच्चों के भविष्य को उज्जवल बनाएगी, बल्कि प्रदेश की समृद्ध भाषाई विरासत को भी सहेजने में अहम भूमिका भी निभाएगी।

राजस्थान के भाषा प्रेमी लोगो को उम्मीद है कि राजस्थान के स्कूली पाठ्यक्रम में स्थानीय भाषा को शामिल कर आरम्भ में नौ जिलों में पढ़ाई शुरू कराने की इस सराहनीय पहल के बाद देर सवेरे राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलने का मार्ग भी प्रशस्त होगा।