राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सांस्कृतिक संगठन नहीं भाजपा का संरक्षक है

Rashtriya Swayamsevak Sangh is not a cultural organization but the patron of BJP

प्रो. नीलम महाजन सिंह

26, 27 व 28 अगस्त, 2025 को दिल्ली में राष्ट्रीय सेवा संघ का तीन दिवसीय सम्मेलन हुआ। 28 अगस्त को आरएसएस सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भाजपा अध्यक्ष के चयन में संघ की भूमिका पर बोला, “अगर हमें फैसला करना होता तो क्या इतना समय लगता”? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के मौके पर आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला के तीसरे दिन, विज्ञान भवन में प्रश्नोत्तर सत्र का आयोजन हुआ। इस मौके पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कई विषयों पर पूछे गए सवालों के विस्तृत जवाब दिए। इससे आरएसएस की मंशा व दिशा पर कुछ बिंदु स्पष्ट हुए। उन्होंने कहा, “मैं शाखा चलाने में माहिर हूं, भाजपा सरकार चलाने में माहिर है। हम एक-दूसरे को सिर्फ सुझाव दे सकते हैं। हम फैसला नहीं करते, अगर हमें फैसला करना होता तो क्या इसमें इतना समय लगता”।

इस दौरान भाजपा व आरएसएस के बीच मनभेद पर मोहन भागवत ने कहा कि मतभेद के कोई मुद्दे नहीं होते। “हमारे यहां मतभेद के विचार कुछ हो सकते हैं लेकिन मनभेद बिल्कुल नहीं है। क्या एक दूसरे पर विश्वास है, क्या भाजपा सरकार में सब कुछ आरएसएस तय करता है? ये पूर्णतः गलत बात है। ये हो ही नहीं सकता क्योंकि लक्ष्य हमारे देश की भलाई है”। सरकार के साथ संघ के समन्वय पर उन्होंने कहा कि सिर्फ मौजूदा सरकार ही नहीं, बल्कि हर सरकार के साथ हमारा अच्छा समन्वय है; कहीं कोई झगड़ा नहीं है। भाजपा के अलावा अन्य राजनीतिक दलों का संघ साथ क्यों नहीं देता? आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि अच्छे काम के लिए जो हमसे सहायता मांगते हैं हम उन्हें वे सहायता देते हैं। हम सहायता करने जाते हैं, तो जो दूर भागते हैं, उन्हें सहायता नहीं मिलती तो हम क्या करें? आपको सिर्फ एक पार्टी दिखती है जिसको हम सहायता कर रहे हैं। लेकिन कभी-कभी देश चलाने के लिए या पार्टी का कोई काम चलाने के लिए अगर वो अच्छा है तो हमारे स्वयं सेवक जाकर मदद करते हैं, इसमें हमें कोई परहेज नहीं है। सारा समाज हमारा है। हमारी तरफ से कोई रुकावट नहीं है। उधर से रुकावट है तो हम उनकी इच्छा का सम्मान करके रूक जाते हैं। संस्कार और परम्पराओं के संरक्षण की चुनौती पर तकनीक व आधुनिकीकरण के युग में संस्कार और परम्पराओं के संरक्षण की चुनौती को संघ किस प्रकार देखता है? तकनीकी व आधुनिकता इनका शिक्षा से विरोध नहीं है। शिक्षा केवल जानकारी नहीं है, मनुष्य सुसंस्कृत बने। नई शिक्षा नीति में ‘पंचकोशीय शिक्षा’ का प्रावधान है। भारतीय ज्ञान परंपरा संघ का अभिन्न अंग रही है। हमारे एकात्मता स्त्रोत में प्रतिदिन हमारे ऋषियों और आधुनिक वैज्ञानिकों के नामों का पाठ किया जाता है। उनके जीवन को बौद्धिक वर्गों में भी शामिल किया गया है। शिक्षा क्यों है जरूरी? संघ प्रमुख ने कहा कि लोगों को तकनीक का मालिक होना चाहिए, ना कि तकनीक को हमारा मालिक बनना चाहिए। अगर तकनीक अशिक्षितों के हाथों में चली जाए, तो इसका उल्टा असर हो सकता है। शिक्षा का मतलब सिर्फ जानकारी रटना नहीं है। हमारी पुरानी शिक्षा लुप्त हो गई, जब हम गुलाम थे, तब एक नई व्यवस्था आई। उन्होंने व्यवस्था को अपने हिसाब से बनाया। लेकिन अब हम आजाद हैं, हमें न सिर्फ राज्य चलाना है, बल्कि लोगों को भी उसका पालन करना है। हमें उस दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है। क्या संस्कृत को अनिवार्य किया जाना चाहिए? जनसंख्या के सवाल पर डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि जनसंख्या से ज़्यादा, इरादा क्या है यह महत्वपूर्ण है। हमें जनसांख्यिकी के बारे में सोचने की ज़रूरत है क्योंकि जनसांख्यिकी में बदलाव का असर हम पर पड़ता है। यह सिर्फ जनसंख्या के बारे में नहीं है, यह इरादे के बारे में है। भारत की जनसंख्या नीति 2.1 बच्चों की बात करती है, यानी एक परिवार में तीन बच्चे। दुनिया में सब शास्त्र कहते हैं कि जन्म दर तीन से कम जिनका होता है वो धीरे धीरे लुप्त हो जाते हैं। डॉक्टर लोग मुझे बताते हैं कि विवाह में बहुत देर न करने और तीन संतान करने से माता-पिता और संतानों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। हर नागरिक को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके परिवार में तीन बच्चे हों। आरएसएस ने विभाजन का विरोध नहीं किया इस सवाल का जवाब देते हुए, मोहन भागवत ने कहा कि यह गलत जानकारी है। संघ ने विभाजन का विरोध किया था, लेकिन उस समय संघ के पास अधिक ताकत नहीं थी। ‘अखंड भारत एक सच्चाई है’। भारत के विभाजन को रोकने में संघ की भूमिका को समझना हो तो हो वे शेषाद्रि की पुस्तक, ‘ट्रैजिक स्टोरी ऑफ़ पार्टीशन’ पढ़नी चाहिए। हिंदू-मुस्लिम एकता पर आरएसएस पर संघ प्रमुख ने कहा कि जब हम सब एक हैं तो हिंदू-मुस्लिम एकता की बात क्यों होनी चाहिए? हम सब भारतीय हैं, फिर एकता का सवाल ही क्यों? बस इबादत के तौर-तरीकों में फर्क है। हिंदू सोच यह नहीं कहती कि इस्लाम यहां नहीं रहेगा। पहले दिन इस्लाम जब भारत में आया उस दिन से इस्लाम यहां है व रहेगा। इस्लाम नहीं रहेगा, ये सोचने वाला, हिन्दू नहीं है। दोनों जगह ये विश्वास बनेगा तब ये संघर्ष खत्म होगा। जातिगत आरक्षण पर संघ प्रमुख ने कहा कि इस पर संवेदना से विचार करना चाहिए। दीनदयाल उपाध्याय जी ने एक दृष्टि दी है, जो नीचे है उसे ऊपर आने के लिए हाथ उठाकर कोशिश करनी चाहिए, व ऊपर जो है उसे हाथ पकड़ कर ऊपर खींचना चाहिए। संविधान सम्मत आरक्षण को संघ का समर्थन है। मोहन भागवत ने कहा कि घुसपैठ को रोकना चाहिए। सरकार कुछ प्रयास कर रही है, धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। लेकिन समाज के हाथ में है कि हम अपने देश में रोजगार अपने देश के लोगों को देंगे। अपने देश में भी मुसलमान नागरिक हैं। उन्हें भी रोजगार की ज़रूरत है। ‘आरएसएस की 100 वर्ष की यात्रा: नए क्षितिज’ विषय पर तीन दिवसीय कार्यक्रम दिली से महत्वपूर्ण संदेश दे कर गया है। भाजपा के साथ आरएसएस का कहीं कोई झगड़ा नहीं है। शिक्षा का मकसद केवल साक्षरता नहीं, बल्कि इंसान को वास्तविक मनुष्य बनाना है। तकनीक का उपयोग मानव हित में होना चाहिए, जिससे तकनीक मालिक न बन जाए। इसके साथ ही मोहन भागवत ने परंपरा, इतिहास व मूल्यों पर आधारित शिक्षा की जरूरत पर जोर दिया। कहीं तकनीकी मनुष्य का मालिक न बन जाए? इसीलिए शिक्षा ज़रूरी है। मोहन भागवत ने कहा, “सुशिक्षा सिर्फ लिटरेसी नहीं है, शिक्षा उसे कहते हैं, जिससे मनुष्य वास्तविक मनुष्य बने। ऐसी शिक्षा से मनुष विष को भी दवाई बना लेता है”। हमारा हर सरकार, राज्य सरकारों और केंद्र सरकारों, दोनों के साथ अच्छा रिश्ता है, लेकिन कुछ व्यवस्थाएं ऐसी भी हैं जिनमें कुछ आंतरिक विरोधाभास हैं। कुल मिलाकर व्यवस्था वही है, जिसका आविष्कार अंग्रेजों ने शासन करने के लिए किया था। इसलिए, हमें कुछ नवाचार करने होंगें। डा. भागवत ने कहा कि भले ही कुर्सी पर बैठा शख्स हमारे लिए पूरी तरह से समर्पित हो, उसे यह करना ही होगा व वह जानता है कि इसमें क्या बाधाएं हैं। हमें उसे वह स्वतंत्रता देनी होगी, कहीं कोई झगड़ा नहीं है। अपने देश की शिक्षा बहुत पहले लुप्त हो गई व नई शिक्षा पद्धति इसलिए लाई गई क्योंकि हम शासनकर्ताओं के गुलाम थे। इस देश पर उनको राज करना था, विकास नहीं करना था। उन्होंने देश में राज करने के लिए सारे सिस्टम बनाए। ‘हिंदू राष्ट्र का अर्थ, विश्व गुरु का कॉन्सेप्ट … संघ के सौ वर्ष पूरे होने पर मोहन भागवत ने आगे का प्लान बतया । आरएसएस शताब्दी समारोह में “सावरकर को स्वतंत्रता की लहर, डॉ. हेडगेवार जन्मजात देशभक्त थे। मोहन भागवत ने बताया आरएसएस संस्थापक का आज़ादी का नायक माना।

मोहन भागवत ने कहा, अब हम स्वतंत्र हो गए हैं। हमको सिर्फ राज्य नहीं चलाना है, प्रजापालन करना है। उसकी मानसिकता का निर्माण होना चाहिए। उसकी मानसिकता के निर्माण के लिए बच्चों को भूतकाल यानी इतिहास की भी जानकारी मिलना जरूरी है, जिससे बच्चों को गौरव पैदा हो सके कि हम भी कुछ हैं, हम भी कर सकते हैं. ये सब बदलाव होना जरूरी था।
भागवत ने कहा, “अपने परंपरा व मूल्यों की शिक्षा देनी चाहिए, वो धार्मिक नहीं सामाजिक है। हमारे धर्म अलग हो सकते हैं, समाज के नाते हम एक हैं. जैसे- माता पिता को सम्मान देना, किसी धर्म में इसकी मनाही है क्या? ये शिक्षा मिलनी चाहिए, ये एक तरह से यूनिवर्सल है। अच्छी आदतें, सार्वभौमिक हैं। अंग्रेजी नॉवेल्स में ये नहीं मिलेगा। इंग्लिश एक भाषा है, भाषा सीखने में क्या दिक्कत है? निश्कर्षार्थ यह कहा जा सकता है कि 2025 से आगे के वर्षों में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी का आपसी समन्वय बरकरार रहेगा। भारत की अधिकांश जनसंख्या हिन्दू है तो आरएसएस भारत को ‘हिन्दू राष्ट्र’ कहती है। खैर, मेरे प्रो. राजिंदर सिंह, रज्जू भैय्या, सुदर्शन जी (सरसंघचालक) सभी से पारिवारिक संबंध रहे हैं। इंद्रेश कुमार, 77 वर्षीय, को के.एस. सुदर्शन ने ही ‘मुस्लिम राष्ट्र मंच’ का सचिव बनाया था व हम उनके साथ भोजन कर रहे होते थे। लेखिका ने रज्जू भैया के अनेक साक्षात्कार किए हैं। अंततः डॉ. मोहन भागवत ने 75 वर्ष तक राजनीति करने व उसके बाद रिटायर् होने के तथ्य को अस्वीकार किया है। किसी भी प्रकार से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अब एक सामाजिक या सांस्कृति संगठन नहीं है, व पूर्ण रूप से भाजपा सरकार का संरक्षक है।

प्रो. नीलम महाजन सिंह (वरिष्ट पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक, आरएसएस रिसर्चर, दूरदर्शन व्यक्तित्व, सॉलिसिटर व परोपकारक)