शिवकुमार बिलगरामी
जब तक मनुष्य की पीड़ा, प्रेम, संघर्ष और स्वप्न जीवित हैं, तब तक साहित्य भी किसी न किसी रूप में जीवित रहेगा। यह कथन जितना आश्वस्त करता है, उतना ही आज के समय में हमें आत्ममंथन के लिए विवश भी करता है। क्योंकि जिस पीढ़ी ने साहित्य को समाज की चेतना का मार्गदर्शक, विचारों का दीपक और परिवर्तन का कारण बनते देखा है, उसके लिए यह स्थिति अत्यधिक पीड़ादायक है कि वर्तमान समय में साहित्य की सामाजिक प्रभाव लगातार क्षीण होता जा रहा है। प्रश्न यह नहीं कि साहित्य समाप्त हो रहा है, प्रश्न यह है कि क्या साहित्य वह काम कर पा रहा है जिसके लिए वह अस्तित्व में आया था ।
हिंदी साहित्य भारतीय समाज की आत्मा का जीवंत दस्तावेज रहा है। भक्ति काल में उसने ईश्वर और मनुष्य के बीच की दूरी को पाटा, रीतिकाल में सौंदर्यबोध को संवारा और आधुनिक काल में शोषण, अन्याय, औपनिवेशिक दमन तथा सामाजिक विषमता के विरुद्ध सशक्त प्रतिरोध खड़ा किया। साहित्य केवल शब्दों का विन्यास नहीं था, वह समाज की सामूहिक अंतरात्मा की अभिव्यक्ति था। किंतु इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में खड़े होकर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यह स्वीकार करना पड़ता है कि साहित्य और समाज के बीच का वह जीवंत संवाद अब पहले जैसा नहीं रहा।
आज की सबसे बड़ी चिंता पाठक संस्कृति का तेज़ी से क्षरण है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने सूचना को सुलभ बनाया है, पर चिंतन को दुर्लभ। ‘रील्स कल्चर’ ने क्षिप्रता को मूल्यवान और सतहीपन को आदत बना दिया है। कुछ सेकंड में मनोरंजन, कुछ पलों में राय और बिना ठहरे निष्कर्ष—यही नई पीढ़ी का बौद्धिक प्रशिक्षण बनता जा रहा है। परिणामस्वरूप, एकाग्रचित होकर पढ़ने, विचार को आत्मसात करने और असहमति के साथ संवाद करने की संस्कृति लगभग लुप्तप्राय हो चली है। साहित्य, जो धैर्य मांगता है, ठहराव सिखाता है और भीतर उतरने का साहस देता है, वर्तमान के तेज रफ्तार युग में अप्रासंगिक ठहराया जाने लगा है।
इस बदलाव का सीधा प्रभाव समाज के आचार, विचार और व्यवहार पर भी दिखाई देता है। जिस सोच के पिरामिड पर संस्कृति और सामाजिक मूल्य टिके रहते हैं, वह पिरामिड अब खोखला होता जा रहा है। विचारों की जगह प्रतिक्रियाएँ ले रही हैं, विवेक की जगह उत्तेजना और संवाद की जगह शोर। साहित्य का काम इस शोर के बीच मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना था, किंतु वही साहित्य आज स्वयं अपनी जगह तलाशता दिखाई दे रहा है।
बाज़ारवाद ने इस संकट को और गहरा दिया है। साहित्य की गुणवत्ता अब उसकी वैचारिक गहराई से नहीं, बल्कि उसकी बिक्री, प्रचार और ‘वायरल’ होने की क्षमता से आँकी जाने लगी है। प्रकाशन जगत में जोखिम उठाने की प्रवृत्ति घटती जा रही है। प्रयोगधर्मी, असुविधाजनक प्रश्न उठाने वाला और सत्ता-संरचनाओं को चुनौती देने वाला साहित्य धीरे-धीरे हाशिये पर धकेला जा रहा है। जब रचना संवेदना की बजाय उत्पाद बन जाए, तो उसका आत्मिक क्षरण अवश्यंभावी हो जाता है। भाषा स्वयं भी इस संक्रमण से अछूती नहीं है। हिंदी पर अंग्रेज़ी और हिंग्लिश का प्रभाव केवल भाषिक नहीं, सांस्कृतिक भी है। शब्दों के साथ-साथ अनुभूतियाँ भी बदल रही हैं। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक तो बनाया है, पर व्याकरण, शिल्प और भाषिक अनुशासन के प्रति उदासीनता भी बढ़ी है। भावनाएँ तीव्र हैं, लेकिन उन्हें सशक्त और सटीक भाषा में ढालने की साधना दुर्लभ होती जा रही है। भाषा जब शिथिल होती है, तो विचार भी कमजोर पड़ते हैं।
साहित्यिक संसार के भीतर भी आत्मालोचन की आवश्यकता है। गुटबाज़ी, मंचीय राजनीति और संपर्क-आधारित प्रतिष्ठा ने कई बार रचना से अधिक रचनाकार की उपस्थिति को महत्व दिया है। पुरस्कार, समीक्षाएँ और प्रशंसाएँ यदि निष्पक्ष न रहें, तो सृजन की नैतिकता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। सच्ची प्रतिभा तब हतोत्साहित होती है और साहित्य अपनी नैतिक ऊँचाई खोने लगता है। इस सबके बीच सबसे चिंताजनक दूरी साहित्य और आम जनजीवन के बीच बढ़ती खाई है। किसान, श्रमिक, स्त्री, गाँव पीड़ित शोषित समाज और रोज़मर्रा के संघर्ष—ये सब साहित्य के मूल सरोकार रहे हैं। किंतु आज अनेक रचनाएँ जीवन की इन सच्चाइयों से कटकर प्रतीकों और शोरगुल में उलझ जाती हैं। जब साहित्य ज़मीन से कटता है, तो उसकी जड़ें सूखने लगती हैं।
नई पीढ़ी को लेकर भी दोहरी चुनौती है। एक ओर उनके अनुभव, भाषा और प्रश्न भिन्न हैं, दूसरी ओर साहित्यिक मंच उन्हें पर्याप्त गंभीरता से सुनने को तैयार नहीं दिखते। यदि साहित्य नई पीढ़ी से संवाद स्थापित नहीं करेगा, तो यह दूरी और गहरी होगी। साहित्य तभी जीवित रहेगा जब वह समय की नब्ज़ पहचाने और बदलती संवेदनाओं को ईमानदारी से स्वर दे।
फिर भी, यह कहना अनुचित होगा कि सब कुछ अंधकारमय है। डिजिटल युग अपने साथ संभावनाएँ भी लाया है। ब्लॉग, ई-पत्रिकाएँ और ऑनलाइन मंचों ने अभिव्यक्ति को नए आयाम दिए हैं और उन आवाज़ों को स्थान दिया है, जिन्हें पारंपरिक मंच नहीं मिल पाते थे। आवश्यकता केवल संतुलन की है—तकनीक के साथ साहित्यिक उत्तरदायित्व का, सहजता के साथ गंभीरता का।
हिंदी साहित्य आज किसी एक संकट से नहीं, बल्कि संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। यह वह मोड़ है जहाँ आत्मचिंतन और आत्ममंथन की आवश्यकता है। यदि लेखक भाषा को साधना, समाज को उत्तरदायित्व और लेखन को आत्मसंवाद मानकर आगे बढ़े, यदि पाठक फिर से ठहरना सीखें और साहित्य से संवाद करें, तो यह दौर केवल संकट नहीं, पुनर्जागरण का भी बन सकता है। तब हिंदी साहित्य न केवल अपने समय का साक्ष्य बनेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए चेतना का पथप्रदर्शक भी सिद्ध होगा।





