दीपक कुमार त्यागी
देश की राजनीति में राष्ट्रवाद के सर्वोपरि भाव को राजनेताओं की क्षणिक लाभ की राजनीति का गुणा-भाग तिलांजलि देता हुआ अक्सर नज़र आता रहता है। धार्मिक उन्माद के दौर के बाद अब देश में चारों तरफ़ जातिवाद का उन्माद एक बार फिर से जबरदस्त हिलोरें मार रहा है, यूजीसी कानून के पक्ष व विपक्ष में चल रहे धरना प्रदर्शन इसकी एक बानगी मात्र हैं। वैसे भी पिछले कुछ समय से देश में राजनेताओं के जातिगत बयानों के चलते कहीं ना कहीं राष्ट्रवाद का मुद्दा अब पीछे चला गया नज़र आता है। वहीं दूसरी तरफ़ देखें तो चुनावी रणभूमि में सनातन धर्म की एकजुटता की बात करने वाले ठेकेदार ही सनातनियों को जातियों में विभाजित करते हुए धरातल पर नज़र आ रहे हैं, जो स्थिति सनातन धर्म के लोगों के लिए बेहद ही चिंताजनक है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रवाद के भाव से ओतप्रोत रहने वाला ‘त्यागी समाज’ भी जातिवाद के इस नंगे दौर में अपने आपको देश के अधिकांश राजनीतिक दलों के नेताओं से ठगा हुआ महसूस कर रहा है। बुद्धिजीवी ‘त्यागी समाज’ भी भयंकर जातिवाद के इस दौर में अपने लोगों के मान-सम्मान को लेकर के चिंतित नज़र आ रहा है। हालांकि अन्य बहुत सारे सनातनियों की तरह ही ‘त्यागी समाज’ को भी भाजपा से बहुत उम्मीद हैं, लेकिन क्या धरातल पर भाजपा उनकी इन उम्मीदों पर खरा उतर पा रही है, यह एक विचारणीय प्रश्न है।
देश का दिल राजधानी दिल्ली की विभिन्न विधानसभाओं से लेकर के उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश आदि की कुछ विधानसभा सीटों में ‘त्यागी समाज’ के मतदाता निर्णायक की भूमिका में है और उनको लंबे समय से भाजपा का परंपरागत और खुल कर के समर्थन करने वाला कट्टर वोटर माना जाता रहा है, आज भाजपा जिस मुकाम पर है उस माहौल को बनाने में ‘त्यागी समाज’ के लोगों का बहुत बड़ा योगदान है। लेकिन धीरे-धीरे हालात ऐसे बन गए हैं कि अब तो ‘त्यागी समाज’ के बहुत सारे लोगों का आरोप है कि केंद्र व राज्यों में भाजपा की सत्ता होने के बाद भी ‘त्यागी समाज’ के लोगों को सत्ता पक्ष से सरकार व संगठन स्तर पर वह मान-सम्मान नहीं मिल रहा है, जोकि एक कट्टर समर्थक के रूप में उन लोगों को मिलना चाहिए था। वहीं इन राज्यों में पिछले कुछ समय के कुछ राजनीतिक व सामाजिक घटनाक्रमों पर अगर हम नज़र डालें तो कहीं ना कहीं ‘त्यागी समाज’ भाजपा का कट्टर वोटर होने के बाद भी अपने साथ भेदभाव महसूस कर रहा है, वह है अपने आपको उपेक्षित व ठगा हुआ महसूस कर रहा है, वह अपने हक को हासिल करने के लिए निरंतर छटपटा रहा है, लेकिन ना जाने क्यों उनकी अनदेखी अब भी लगातार जारी है।
“‘त्यागी समाज’ के बहुत सारे लोगों का स्पष्ट रूप से मानना है कि भाजपा को लंबे समय से वोट देते हुए आने के बाद भी भाजपा का केंद्र व राज्यों में राज आने के बाद भी आज तक भी ‘त्यागी समाज’ के नेता व लोगों को सरकार व संगठन में उनका मान-सम्मान का वह तय हक नहीं मिल पा रहा है, जिसके वह वास्तव में हकदार हैं। यह स्थिति ‘त्यागी समाज’ के राजनीतिक वजूद के दृष्टिकोण से बिल्कुल भी उचित नहीं है। जिसके चलते ही पिछले कुछ समय से एक जागरूक मतदाता के रूप में ‘त्यागी समाज’ का वोटर भी अपनी खोई हुई जमीन को हासिल करने के लिए निरंतर प्रयासरत है।“
वहीं ‘त्यागी समाज’ के बहुत सारे लोगों का आरोप है कि उत्तर प्रदेश में भी भाजपा के राज में ‘त्यागी समाज’ के लोगों को सरकार व संगठन में उचित सम्मान नहीं मिलने के चलते ही बहुत लंबे समय से चली आ रही ‘त्यागी समाज’ के कुछ लोगों की नाराज़गी अब तो खुल्लमखुल्ला जनता के बीच नज़र आने लगी है। ‘त्यागी समाज’ के लोगों का भाजपा पर आरोप है कि उन्होंने त्यागियों के गढ़ में ही त्यागियों की राजनीति को कमजोर करने के लिए कार्य किया है, जबकि ‘त्यागी समाज’ लंबे समय से ही भाजपा का परंपरागत निस्वार्थ भाव वाला वोटर रहा है और वह अपने व्यवहार से अन्य जातियों व धर्मों के लोगों की वोटों को भी आकर्षित करने के गुण रखता है।
“राष्ट्र प्रथम भाव के चलते बहुत लंबे समय से भाजपा के साथ जुड़ा होने के चलते ही आज ‘त्यागी समाज’ के लोगों को भाजपा का शीर्ष नेतृत्व तो इसलिए सरकार व संगठन में सम्मान नहीं दे रहा है कि ‘त्यागी समाज’ तो उसका परंपरागत मतदाता है ही, वह किसी अन्य दल को वोट नहीं कर सकता है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ अन्य राजनीतिक दल भी ‘त्यागी समाज’ का झुकाव भाजपा की तरफ़ अधिक होने के चलते उनको उचित मान-सम्मान नहीं दे रहे हैं। जोकि ‘त्यागी समाज’ के लोगों के लिए एक विचित्र स्थिति है और राजनीतिक रूप से एक बहुत बड़ी चिंता का विषय है।“
आज के दौर में ‘त्यागी समाज’ के बहुत सारे लोगों का मानना है कि जिस ‘त्यागी समाज’ के लोग कभी गांधी, नेहरू, शास्त्री व इंदिरा आदि जैसे दिग्गजों के साथ बैठकर के केंद्रीय व प्रदेश के मंत्रीमंडल में शामिल होकर के देश-प्रदेश की दिशा व दशा तय किया करते थे, आज वही ‘त्यागी समाज’ राजनीतिक दलों की उपेक्षा के चलते राजनीतिक रूप से नेतृत्व विहीन होता जा रहा है और सबसे बड़े अफसोस की बात यह है कि भाजपा का लंबे समय से कट्टर समर्थक होने के बाद भी भाजपा के राज में ही ‘त्यागी समाज’ के लोग अपने आपको राजनीतिक रूप से उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। वहीं भाजपा का कट्टर मतदाता होने के चलते ‘त्यागी समाज’ के लोगों को अन्य राजनीतिक दल भी उनका तय मान-सम्मान देने के लिए तैयार नहीं हैं। पिछले तीन-चार दशकों में तो ‘त्यागी समाज’ की राजनीति को देश में भारी क्षति उठानी पड़ी है, अब तो राजनीतिक रूप से ‘त्यागी समाज’ धरातल पर आ गया है। आज त्यागियों के गढ़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी ‘त्यागी समाज’ के स्थापित केवल चंद राजनेता ही शेष बचे हुए हैं, जिसमें के. सी. त्यागी, त्रिलोक त्यागी, बालेश्वर त्यागी, सत्यवीर त्यागी (वझीलपुर), अजीत पाल त्यागी, अश्विनी त्यागी, बसंत त्यागी, डॉक्टर विरेश्वर त्यागी, राजेंद्र त्यागी आदि जैसे नेता अपने दम पर पहचान बनाने वाले स्थापित नाम हैं, बाकि बहुत सारे नेता अभी अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्षरत हैं, लेकिन उन्हें अपने-अपने राजनीतिक दल से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पा रहा है।
“आज ‘त्यागी समाज’ के भाजपा के एक विधायक अजीत पाल त्यागी व एक एमएलसी अश्विनी त्यागी मात्र बचें हैं और चिंताजनक बात यह है कि उनको भी उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्रीमंडल में स्थान देकर ‘त्यागी समाज’ की नाराज़गी को कम करने के लिए अभी तक तो कोई भी ठोस प्रयास भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के द्वारा नहीं किया गया है, हालांकि उत्तर प्रदेश में मंत्री मंडल विस्तार की चर्चा चल रही है, भाजपा हाईकमान को विधायक अजीत पाल त्यागी व एमएलसी अश्विनी त्यागी को मंत्री मंडल में स्थान देना चाहिए और ‘त्यागी समाज’ की नाराज़गी को कम करने का धरातल पर सार्थक प्रयास करना चाहिए।“
वहीं कुछ राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो ‘त्यागी समाज’ के मतदाताओं की भाजपा से बढ़ती हुई इस नाराज़गी पूर्ण स्थिति का लाभ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में राष्ट्रीय लोकदल लेने के लिए बेताब है। जिस कड़ी में राष्ट्रीय लोकदल ने पहले से ही अपने दिग्गज राजनेता ‘त्रिलोक त्यागी’ को लंबे समय से सक्रिय कर रखा था। वहीं अब दिग्गज राजनेता ‘के. सी. त्यागी’ और ‘के.सी. त्यागी’ के बेटे भाजपा के नेता ‘अमरीश त्यागी’ ने ‘त्यागी समाज’ के सेंकड़ों नेताओं के साथ 22 मार्च 2026 को दिल्ली के प्रसिद्ध मावलंकर हॉल में आयोजित एक कार्यक्रम में अपने नेतृत्व में राष्ट्रीय लोकदल पार्टी ज्वाइन करवाने का कार्य बखूबी कर दिखाया है। वैसे भी मावलंकर हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम की विशेषता देखें तो खचाखच भरे हुए हॉल में ‘के.सी. त्यागी’ व ‘अमरीश त्यागी’ के साथ उनके हजारों समर्थकों के अलावा ‘त्यागी समाज’ के भाजपा के कई छोटे व बड़े राजनेता भी मौजूद थे, हालांकि भाजपाईयों की उक्त कार्यक्रम में उपस्थित राजनीतिक विश्लेषकों को आश्चर्यचकित करती है।
इसलिए ‘त्यागी समाज’ के लोगों की नाराज़गी को कम करने के लिए समय रहते ही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को जल्द से जल्द ठोस प्रभावी कदम उठाने होंगे। ‘त्यागी समाज’ के लोगों को केंद्र, प्रदेश व विशेषकर के उत्तर प्रदेश की सरकार व संगठन में बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी देनी होगी। ‘त्यागी समाज’ के लोगों को भाजपा के पक्ष में एकजुट रखने के लिए केंद्रीय व प्रदेश के मंत्री मंडल, निगम, राष्ट्रीय व प्रदेश कमेटी, क्षेत्रीय कमेटी व जिला और महानगर आदि में महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करना होगा। वहीं ‘त्यागी समाज’ के लोगों को एमएलसी, राज्यसभा, लोकसभा आदि में भेजना होगा। बड़ी संख्या में ‘त्यागी समाज’ के लोगों की इच्छा है कि भाजपा को गठबंधन के धर्म को निभाते हुए ‘त्यागी समाज’ के मतदाताओं के बीच अपनी पैठ को बरकारा रखने के लिए राष्ट्रीय लोकदल के नेता ‘त्रिलोक त्यागी’ व के.सी. त्यागी को भी राज्यसभा में ले जाकर केंद्रीय मंत्रि मंडल में शामिल करना चाहिए, जिससे की ‘त्यागी समाज’ के मतदाताओं को अपनी ही सरकार में मिले गहरे जख्मों पर मरहम लगा महसूस हो और वह फिर से भाजपा के साथ चुनावी रणभूमि में उसी जोशो-खरोश के साथ हमेशा की तरह खड़ा रहें।





