एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
वैश्विक स्तरपर भारत की सांस्कृतिक चेतना में नारी को देवी का दर्जा प्राप्त है।शक्ति,दुर्गा सरस्वती और लक्ष्मी के रूप में स्त्री भारतीय सभ्यता की आत्मा रही है।शासन-प्रशासन ने महिला सशक्तिकरण के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, राजनीतिक भागीदारी और सुरक्षा से जुड़े अनेक कार्यक्रम शुरू किए।भारत की सभ्यता में नारी को शक्ति, मातृत्व और देवत्व का प्रतीक माना गया है। वेदों से लेकर संविधान तक, महिला को सम्मान, समानता और गरिमा का अधिकार देने की बात की जाती रही है।स्वतंत्र भारत में भी महिला सशक्तीकरण को राष्ट्र निर्माण का मूल आधार घोषित किया गया। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, उज्ज्वला, महिला हेल्पलाइन,मिशन शक्ति, स्टैंड- अप इंडिया जैसी असंख्य योजनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि राज्य महिला उत्थान को प्राथमिकता देने का दावा करता है। इसके बावजूद,यदि हम आपराधिक न्याय व्यवस्था के आंकड़ों की ओर देखें तो एक गहरी चिंता उभरती है। इंस्टीट्यूट फॉर क्राइम एंड जस्टिस पॉलिसी रिसर्च की वर्ल्ड फीमेल इम्प्रिजनमेंट लिस्ट यह बताती है कि बीते दो दशकों में भारतीय जेलों में बंद महिलाओं की संख्या,पुरुषों और सामान्य जनसंख्या की तुलना में दोगुनी गति से बढ़ी है। यह तथ्य केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, न्यायिक और लैंगिक संरचनाओं पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
यह मानता हूं क़ि हाल के वर्षों में अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों, विशेषकर बांग्लादेशी मूल की महिलाओं के खिलाफ सघन अभियानों के कारण भी महिला कैदियों की संख्या में वृद्धि हुई है। एक अनुमान के अनुसार, केवल पश्चिम बंगाल की जेलों में ही लगभग 358 बांग्लादेशी महिलाएं कैद में हैं।इनमें से कई मानव तस्करी, अवैध प्रवास या जबरन अपराध में धकेली गई पीड़िताएं भी हो सकती हैं। यह स्थिति भारत की जेल व्यवस्था को एकअंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार और कूटनीतिक आयाम भी प्रदान करती है।रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2000 से 2022 के बीच भारतीय जेलों में महिला कैदियों (विचाराधीन और सजायाफ्ता दोनों) की संख्या 9,089 से बढ़कर 23,772 हो गई। यह लगभग 162 प्रतिशत की वृद्धि है। इसके विपरीत, इसी अवधि में भारत की कुल जनसंख्या में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई,जबकि पुरुष कैदियों की संख्या 3,10,310 से बढ़कर5,49,351 हुई, जो करीब 77 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्शाती है।यह असंतुलन इस ओर संकेत करता है कि महिलाओं के मामले में या तो अपराध के स्वरूप बदले हैं, या कानून,व्यवस्था और न्यायिक व्यवहार में ऐसा परिवर्तन आया है,जिसने महिलाओं को अपेक्षाकृत अधिक संख्या में जेल तक पहुंचाया है।
साथियों बात अगर हम महिला सशक्तिकरण बनाम अपराध:इस मूल प्रश्न को समझने की करें तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस दौर में महिला सशक्तिकरण बढ़ रहा है,उसी दौर में महिलाएं अपराध से विमुख क्यों नहीं हो रहीं? क्या अधिकारों की जागरूकता के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक संरचनाएं उन्हें सुरक्षित विकल्प नहीं दे पा रही हैं? कई मामलों में जांच के दौरान यह सामने आया है कि मादक पदार्थों और अन्य तस्करी गतिविधियों में महिलाओं को जानबूझकर शामिल किया जा रहा है, क्योंकि उन्हें कानून से कम संदेहास्पद माना जाता है। इस संदर्भ में यह आशंका भी उठती है कि कहीं पुरुष–प्रधान आपराधिक नेटवर्क अपने बचाव के लिए महिलाओं को आगे तो नहीं कर रहे।अमेरिका और चीन जैसे विशाल आबादी वाले देशों की तुलना में भारत में महिला कैदियों की कुल संख्या अपेक्षाकृत कम है। इससे एक प्रकार का संतोष मिल सकता है, लेकिन यह संतोष भ्रमित करने वाला है। मात्र 4 प्रतिशत हिस्सेदारी के बावजूद महिला अपराधियों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि होना यह दर्शाता है कि समस्या की जड़ें गहरी हैं और भविष्य में इसके सामाजिक परिणाम गंभीर हो सकते हैं।
साथियों बात अगर हम महिला कैद में वृद्धि: केवल अपराध नहीं सामाजिक-संरचनात्मक संकट इसको समझने की करें तो, महिलाओं के जेल जाने को केवल अपराध में वृद्धि के रूप में देखना एक सतही दृष्टिकोण होगा। वास्तविकता यह है कि अधिकांश महिला कैदी हिंसक अपराधी नहीं हैं। वे या तो गरीबी-जनित अपराध, परिस्थितिजन्य अपराध, पारिवारिक दबाव में किए गए अपराध, या कानूनी अज्ञानता के शिकार मामले हैं।अंतरराष्ट्रीय अध्ययन बताते हैं कि महिला अपराध अक्सर सर्वाइवल क्राइम होते हैं,यानें जीवित रहने की मजबूरी से उपजे अपराध।भारत में महिला कैदियों का बड़ा हिस्सा अंडरट्रायल है। वर्षों तक मुकदमे लंबित रहते हैं, जमानत की प्रक्रिया जटिल होती है और कानूनी सहायता तक पहुँच सीमित रहती है।गरीब,अशिक्षित और सामाजिक रूप से हाशिए पर खड़ी महिलाएँ इस प्रणाली में सबसे पहले फँसती हैं और सबसे अंत में बाहर निकलती हैं। यह स्थिति सीधे-सीधे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) तथा अनुच्छेद 39A (निःशुल्क कानूनी सहायता) के उल्लंघन की ओर संकेत करती है।
साथियों बात अगर हम महिला अपराध के पीछे प्रमुख कारण: एक बहु-आयामी विश्लेषण करने की करें तो महिला कैदियों की संख्या में वृद्धि के पीछे पहला बड़ा कारण आर्थिक असमानता और स्त्री-गरीबी है। भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी दर चिंताजनक रूप से कम है। अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएँ असुरक्षित मजदूरी, ऋण जाल और शोषण का शिकार होती हैं। जब जीवन की बुनियादी आवश्यकताएँ पूरी नहीं होतीं, तो छोटी-मोटी चोरी, अवैध व्यापार या तस्करी जैसे अपराधों में फँसना उनकी मजबूरी बन जाता है। दूसरा कारण घरेलू हिंसा और पितृसत्तात्मक दबाव है। कई मामलों में महिलाएँ अपने पति या परिवार के पुरुषसदस्यों के अपराधों में सह-अभियुक्त बना दी जाती हैं। ड्रग्स, अवैध शराब, मानव तस्करी या आर्थिक अपराधों में महिलाओं की भूमिका अक्सर गौण होती है, लेकिन कानून उन्हें मुख्य आरोपी के समान दंडित करता है। यह दर्शाता है कि न्याय प्रणाली लिंग-संवेदनशीलता से अभी भी वंचित है।तीसरा बड़ा कारण कानूनी जागरूकता की कमी है। ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों की महिलाएँ अपने अधिकारों, जमानत प्रक्रियाओं और कानूनी उपायों से अनभिज्ञ रहती हैं। वे पुलिस हिरासत में दिए गए बयानों के कानूनी निहितार्थ तक नहीं समझ पातीं। कई बार फर्जी मुकदमे या मामूली अपराधों में भी उन्हें लंबे समय तक जेल में रहना पड़ता है।
साथियों बात अगर हम राज्य की भूमिका सशक्तीकरण बनाम दंडात्मक शासन व जेल प्रशासन की चुनौतियाँ: इसको समझने की करें तो, महिला सशक्तीकरण की योजनाएँ प्रायः कल्याणकारी स्वरूप की हैं,जबकि आपराधिक न्याय प्रणाली आज भी दंडात्मक मानसिकता से संचालित होती है। पुलिस तंत्र में महिला अधिकारियों की संख्या सीमित है,जिससे महिलाओं के साथ होनेवाली पूछताछ और गिरफ़्तारी में संवेदनशीलता का अभाव रहता है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार, महिलाओं की गिरफ्तारी अंतिम विकल्प होनी चाहिए, विशेषकर जब वे गर्भवती हों या छोटे बच्चों की माँ हों। किंतु भारत में इस सिद्धांत का पालन अपवादस्वरूप ही होता है।अदालतों पर बढ़ता बोझ भी महिला कैदियों की संख्या में वृद्धि का एक प्रमुख कारण है। मुकदमों के वर्षों तक लंबित रहने से महिलाएँ सजा से पहले ही सजा भुगतने को मजबूर होती हैं। यह स्थिति लोकतंत्र के उस मूल सिद्धांत को कमजोर करती है कि जब तक दोष सिद्ध न हो, व्यक्ति निर्दोष है।जेल प्रशासनकी चुनौतियाँ:अदृश्य पीड़ा औरसंरचनात्मक विफलता- भारतीय जेल प्रणाली मूलतः पुरुष-केंद्रित है। महिला कैदियों की बढ़ती संख्या के बावजूद, जेलों में उनके लिए बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। स्वास्थ्य सेवाएँ,मानसिक परामर्श, स्वच्छता मातृत्व देखभाल और बच्चों के पालन-पोषण की व्यवस्था गंभीर रूप से अपर्याप्त है। कई जेलों में महिलाएँ अपने नवजात बच्चों के साथ अमानवीय परिस्थितियों में रहने को विवश हैं।यह स्थिति न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानकों,जैसे संयुक्त राष्ट्र की बैंकाक रूल्स के भी विपरीत है, जो महिला कैदियों के लिए विशेष संरक्षण और वैकल्पिक दंड व्यवस्था की सिफारिश करती हैं। भारत ने इन मानकों का समर्थन तो किया है, लेकिन उनका प्रभावीक्रियान्वयन अब भी दूर की बात है।
साथियों बात अगर हम अपराध के बदलते स्वरूप: शहरीकरण और नई भूमिकाएं को समझने की करें तो रिपोर्ट के अनुसार, भारत में शहरीकरण और वैश्वीकरण के साथ अपराधों के स्वरूप में बदलाव आया है। अब महिलाएं केवल घरेलू या पारंपरिक अपराधों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि संगठित अपराध, मादक पदार्थों की तस्करी, साइबर धोखाधड़ी, वित्तीय अपराध और मानव तस्करी जैसे मामलों में भी अधिक देखी जा रही हैं। शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की सार्वजनिक सक्रियता, रोजगार में भागीदारी और सामाजिक गतिशीलता बढ़ने से अपराध के अवसर और जोखिम दोनों बढ़े हैं। यह एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें सशक्तिकरण और शोषण दोनों एक साथ चलते दिखाई देते हैं।
न्यायिक रुझानों में बदलाव: जमानत से सख्ती तकपिछले कुछ वर्षों में न्यायिक दृष्टिकोण में भी परिवर्तन देखा गया है। गैर- हिंसक अपराधों, जैसे छोटे चोरी,चकारे, सेक्स वर्क या आर्थिक अपराधों में भी अदालतें महिलाओं को जमानत देने में पहले जितनी उदार नहीं रहीं। इसके पीछे एक तर्क कानून के समान अनुप्रयोग का है, लेकिन इसका व्यावहारिक प्रभाव महिलाओं पर अधिक कठोर पड़ता है। सामाजिक कलंक के कारण कई महिलाओं को परिवार का सहयोग नहीं मिलता, जिससे जमानत की प्रक्रिया और कानूनी लड़ाई अत्यंत कठिन हो जाती है।
अतः अगर हम उपयोग पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि भारत में महिला कैदियों की बढ़ती संख्या एक चेतावनी है, लेकिन साथ ही सुधार का अवसर भी। यह हमें याद दिलाती है कि सशक्तिकरण केवल योजनाओं और नारों से नहीं, बल्कि सामाजिक,आर्थिक न्याय, संवेदनशील न्यायिक प्रक्रिया और मानवीय जेल व्यवस्था से साकार होता है। यदि आज इस प्रवृत्ति को गंभीरता से नहीं समझा गया, तो इसका प्रभाव न केवल महिलाओं पर, बल्कि परिवार, बच्चों और समाज की भावी पीढ़ियों पर पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि भी इसी से तय होगी कि वह नारी को देवी मानने की सांस्कृतिक परंपरा को न्याय और करुणा की आधुनिक व्यवस्था में कैसे बदलता है।





