सड़क दुर्घटना मुआवज़ा और संविधान : आय से परे मानवीय गरिमा की तलाश

Road Accident Compensation and the Constitution: The Search for Human Dignity Beyond Income

डॉ प्रियंका सौरभ

सड़क दुर्घटना मुआवज़े की तकनीकी व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संविधान के मूल दर्शन—समता, गरिमा और कल्याणकारी राज्य—से गहराई से जुड़ा हुआ है। भारत में हर वर्ष लाखों सड़क दुर्घटनाएँ होती हैं और इनमें हज़ारों लोग अपनी जान गंवाते हैं या स्थायी रूप से अपंग हो जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में मुआवज़ा केवल आर्थिक राहत नहीं होता, बल्कि यह राज्य द्वारा पीड़ित के जीवन-मूल्य को स्वीकार करने और उसकी गरिमा को पुनर्स्थापित करने का प्रयास भी होता है। मोटर वाहन अधिनियम के अंतर्गत वर्तमान मुआवज़ा प्रणाली मुख्यतः आय-आधारित है, जो पहली दृष्टि में तर्कसंगत लग सकती है, लेकिन गहराई से देखने पर यह संवैधानिक मूल्यों के साथ कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

मोटर वाहन अधिनियम में अपनाई गई ‘मल्टीप्लायर पद्धति’ पीड़ित की आय, आयु और आश्रितों की संख्या के आधार पर मुआवज़ा निर्धारित करती है। इसका उद्देश्य यह माना गया कि दुर्घटना से पूर्व जिस आर्थिक स्थिति में परिवार था, उसे यथासंभव पुनर्स्थापित किया जा सके। किंतु इस पद्धति की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह मनुष्य के जीवन को उसकी बाज़ार-योग्यता से जोड़ देती है। एक उच्च वेतन पाने वाले व्यक्ति की मृत्यु या अपंगता पर लाखों या करोड़ों रुपये का मुआवज़ा तय होता है, जबकि एक दिहाड़ी मज़दूर, रिक्शा चालक या असंगठित क्षेत्र के श्रमिक के लिए यह राशि बहुत कम होती है। इस प्रकार कानून अनजाने में यह संदेश देता है कि किसी व्यक्ति का जीवन उसकी आय के अनुपात में अधिक या कम मूल्यवान है।

यह दृष्टिकोण सीधे-सीधे संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित ‘कानून के समक्ष समानता’ के सिद्धांत को चुनौती देता है। अनुच्छेद 14 केवल समान व्यवहार की बात नहीं करता, बल्कि यह मनमाने और असंगत वर्गीकरण पर रोक भी लगाता है। जब दो नागरिक समान परिस्थितियों में सड़क दुर्घटना के शिकार होते हैं, लेकिन केवल आय के आधार पर उनके जीवन का मूल्य अलग-अलग तय किया जाता है, तो यह एक प्रकार का संवैधानिक विरोधाभास उत्पन्न करता है। राज्य एक ओर सभी नागरिकों को समान मानता है, दूसरी ओर मुआवज़े के स्तर पर उनके बीच आर्थिक हैसियत के आधार पर भेद करता है।

इस व्यवस्था का सबसे गंभीर प्रभाव उन वर्गों पर पड़ता है जिनकी आय औपचारिक रूप से दर्ज नहीं होती या जिन्हें ‘अर्जक’ ही नहीं माना जाता। गृहिणियाँ, बच्चे, वृद्ध और छात्र अक्सर ‘काल्पनिक आय’ के आधार पर मुआवज़ा प्राप्त करते हैं। यह काल्पनिक आय वास्तविक सामाजिक योगदान को प्रतिबिंबित नहीं करती। एक गृहिणी का श्रम घर के भीतर अदृश्य रहता है, लेकिन वह परिवार और समाज की आर्थिक संरचना को संभालने में केंद्रीय भूमिका निभाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने किर्ति बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस (2021) जैसे मामलों में यह स्पष्ट किया है कि गृहिणी का कार्य केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि आर्थिक मूल्य भी रखता है। इसके बावजूद, व्यवहार में मुआवज़े की गणना में यह योगदान अभी भी पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं होता।

आय-आधारित मुआवज़ा प्रणाली का एक और संवैधानिक आयाम अनुच्छेद 21 से जुड़ा है, जो ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार’ की गारंटी देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि जीवन का अर्थ केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन है। जब किसी व्यक्ति की मृत्यु या अपंगता के बाद उसका जीवन-मूल्य केवल गणितीय सूत्रों और आय-स्लैब तक सीमित कर दिया जाता है, तो यह उसकी अंतर्निहित गरिमा को कमतर आँकने जैसा प्रतीत होता है। जीवन को केवल आर्थिक हानि के चश्मे से देखना उस संवेदनशील पीड़ा, मानसिक आघात और सामाजिक असुरक्षा को नज़रअंदाज़ करता है, जिसका सामना पीड़ित परिवार को करना पड़ता है।

इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि ‘न्यायसंगत मुआवज़ा’ की अवधारणा स्वयं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यापक अर्थों में व्याख्यायित की गई है। न्यायालय ने माना है कि मुआवज़ा केवल आय-हानि की भरपाई नहीं, बल्कि भावनात्मक क्षति, मानसिक वेदना और भविष्य की अनिश्चितता के लिए भी होना चाहिए। फिर भी, मौजूदा कानूनी ढांचा इन अमूर्त पहलुओं को पर्याप्त स्थान नहीं देता। परिणामस्वरूप, मुआवज़ा प्रक्रिया अक्सर एक यांत्रिक गणना बनकर रह जाती है, जिसमें मानवीय संवेदना का अभाव दिखाई देता है।

यदि हम अन्य परिवहन कानूनों से तुलना करें, तो यह असमानता और भी स्पष्ट हो जाती है। रेलवे अधिनियम और विमानन से जुड़े कानूनों में दुर्घटना की स्थिति में एक समान, निश्चित मुआवज़ा निर्धारित है, जो पीड़ित की आय या सामाजिक स्थिति से स्वतंत्र होता है। उदाहरण के लिए, रेलवे दुर्घटनाओं में मृत्यु पर एक निश्चित राशि दी जाती है। यह व्यवस्था यह स्वीकार करती है कि सुरक्षा का अधिकार और जीवन का मूल्य सभी नागरिकों के लिए समान है। सड़क परिवहन क्षेत्र में इस तरह की एकरूपता का अभाव यह प्रश्न उठाता है कि क्या भारत में ‘सुरक्षा का अधिकार’ परिवहन माध्यम के अनुसार बदल जाता है।

एक कल्याणकारी राज्य में राज्य की भूमिका केवल न्यायालयों के माध्यम से विवाद निपटाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे सक्रिय रूप से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक नागरिक को न्यूनतम गरिमा के साथ जीवन और मृत्यु दोनों में संरक्षण मिले। इस दृष्टि से सड़क दुर्घटना मुआवज़ा प्रणाली में सुधार समय की आवश्यकता है। सबसे पहले, एक उच्च और अनिवार्य न्यूनतम मुआवज़ा राशि तय की जानी चाहिए, जो ‘नो-फॉल्ट लायबिलिटी’ के सिद्धांत पर आधारित हो। इससे यह सुनिश्चित होगा कि आय चाहे कुछ भी हो, प्रत्येक पीड़ित परिवार को एक सम्मानजनक आधारभूत सहायता मिले।

इसके साथ ही, गैर-अर्जक वर्गों के योगदान का यथार्थवादी मूल्यांकन किया जाना चाहिए। गृहिणियों, बच्चों और वृद्धों के लिए मुआवज़ा निर्धारित करते समय केवल काल्पनिक आय के बजाय उनके सामाजिक, देखभाल और भावनात्मक योगदान को भी महत्व दिया जाना चाहिए। यह सुधार न केवल लैंगिक न्याय की दिशा में कदम होगा, बल्कि सामाजिक वास्तविकताओं के अधिक निकट भी होगा।

मुद्रास्फीति और जीवन-यापन की बढ़ती लागत को देखते हुए मुआवज़ा राशियों का समय-समय पर स्वचालित संशोधन भी आवश्यक है। वर्तमान में ‘नोटशनल इनकम’ और अन्य पारंपरिक मदों की राशि वर्षों तक अपरिवर्तित रहती है, जिससे उनका वास्तविक मूल्य घटता जाता है। एक गतिशील व्यवस्था, जो आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को समायोजित कर सके, अधिक न्यायसंगत होगी।

इसके अतिरिक्त, मुआवज़ा प्रणाली को केवल मृत्यु के बाद भुगतान तक सीमित नहीं रखना चाहिए। दुर्घटना के तुरंत बाद मिलने वाली चिकित्सा सहायता और नकद-रहित उपचार की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ‘गोल्डन आवर’ में समय पर इलाज कई जानें बचा सकता है। हाल के वर्षों में शुरू की गई नकद-रहित उपचार योजनाएँ इस दिशा में सकारात्मक कदम हैं, लेकिन इन्हें और व्यापक तथा प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।

अंततः, सड़क दुर्घटना मुआवज़े का प्रश्न केवल कानून का नहीं, बल्कि नैतिकता और संवैधानिक दृष्टि का भी है। यदि हम मनुष्य के जीवन को केवल उसकी आय से तौलते हैं, तो हम अनजाने में सामाजिक असमानताओं को कानूनी मान्यता दे देते हैं। एक सच्चा कल्याणकारी राज्य वह होता है जो यह स्वीकार करे कि हर जीवन समान रूप से मूल्यवान है, चाहे वह किसी कॉर्पोरेट कार्यालय में काम करने वाला हो या सड़क किनारे मेहनत करने वाला मज़दूर। आय-आधारित गणना को पूरी तरह समाप्त करना संभव न भी हो, तो कम से कम उसे एक समान, गरिमापूर्ण आधारभूत मुआवज़े के साथ संतुलित किया जाना चाहिए।

इस प्रकार, ‘नुकसान के अंकगणित’ को ‘न्याय की नैतिकता’ के अधीन करना ही भारतीय संविधान की आत्मा के अनुरूप होगा। सड़क दुर्घटना मुआवज़ा प्रणाली में ऐसे सुधार न केवल अनुच्छेद 14 और 21 के मूल्यों को सुदृढ़ करेंगे, बल्कि नागरिकों के राज्य पर विश्वास को भी गहरा करेंगे। एक ऐसी व्यवस्था, जो हर जीवन को समान सम्मान दे, वास्तव में लोकतांत्रिक और कल्याणकारी भारत की पहचान होगी।