डॉ. सत्यवान सौरभ
माघ मास की पूर्णिमा को संत रविदास जयंती श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जाती है। इस अवसर पर नगर कीर्तन, आरती, भजन-कीर्तन और दोहों का गायन होता है। भक्तगण गंगा अथवा अन्य पवित्र नदियों में स्नान कर संत रविदास की प्रतिमा या चित्र की पूजा करते हैं। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश सहित उत्तर भारत के अनेक हिस्सों में यह पर्व सामाजिक समरसता और समानता का प्रतीक बन चुका है।
संत रविदास ने अपना संपूर्ण जीवन मानव समानता, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा के लिए समर्पित किया। वे निर्गुण भक्ति परंपरा के प्रमुख स्तंभ और उत्तर भारतीय भक्ति आंदोलन के अग्रणी संतों में से एक थे। उनकी वाणी का महत्व इस तथ्य से भी स्पष्ट होता है कि उनके अनेक पद सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में सम्मिलित हैं। निचली जातियों के लिए वे उस समय के सामाजिक अन्याय और अस्पृश्यता के विरुद्ध एक सशक्त प्रतिरोध के प्रतीक बने।
रविदास का जन्म लगभग 15वीं शताब्दी के मध्य, लगभग 1450 ईस्वी के आसपास माना जाता है। वे चर्मकार समुदाय से थे, जिसे तत्कालीन समाज में अस्पृश्य समझा जाता था। उनके जीवन से जुड़े अनेक प्रसंग ऐतिहासिक रूप से विवादित और अस्पष्ट हैं, फिर भी उनके विचारों और काव्य का प्रभाव निर्विवाद है। वे केवल कवि नहीं, बल्कि समाज सुधारक और आध्यात्मिक चिंतक भी थे, जिन्होंने जाति, लिंग और वर्ग आधारित भेदभाव का खुला विरोध किया।
संत रविदास ने सगुण भक्ति के बजाय निर्गुण भक्ति का समर्थन किया। उनके अनुसार ईश्वर किसी मूर्ति, मंदिर या कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि वह प्रेम, श्रम और साधना में निवास करता है। उन्होंने तपस्या, तीर्थयात्रा और बाह्य अनुष्ठानों को ईश्वर-प्राप्ति का अनिवार्य मार्ग मानने से इनकार किया और ध्यान तथा आंतरिक भक्ति को सर्वोच्च साधन बताया। उनके दर्शन में ‘किरत’ अर्थात श्रम की गरिमा को विशेष महत्व प्राप्त है।
रविदास की 41 रचनाएँ गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं। इसके अतिरिक्त दादूपंथी परंपरा की पंचवाणी में भी उनकी अनेक कविताएँ मिलती हैं। उन्हें संत कबीर का समकालीन माना जाता है। भक्तमाल के अनुसार वे रामानंद के शिष्य थे। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में मीराबाई के मंदिर के पास स्थित छतरी में संत रविदास के पदचिह्न आज भी उनके और मीराबाई के आध्यात्मिक तथा काव्यात्मक संबंध को रेखांकित करते हैं।
संत रविदास ने ‘बेगमपुरा’ नामक एक आदर्श नगर की कल्पना की थी—एक ऐसा समाज जहाँ कोई भय, दुख, भेदभाव या अभाव न हो। यह कल्पना समानता, बंधुत्व और न्याय पर आधारित है। उनका यह विचार आधुनिक भारतीय संविधान के मूल्यों—समानता, सामाजिक न्याय और मानव गरिमा—से गहराई से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है।
इक्कीसवीं सदी में संत रविदास की शिक्षाओं से प्रेरित होकर रविदासिया धर्म एक पृथक धार्मिक पहचान के रूप में सामने आया। “अमृतबानी गुरु रविदास जी” नामक ग्रंथ में उनके 240 भजनों को संकलित किया गया है। यह परंपरा उनके मूल विचारों—मानव समानता, सामाजिक न्याय और बंधुत्व—को आगे बढ़ाती है।
संत रविदास केवल भक्ति कवि नहीं थे, बल्कि वे मानवीय चेतना के प्रवक्ता थे। उनका दर्शन आज भी समाज को यह सिखाता है कि धर्म का सार कर्मकांड में नहीं, बल्कि समता, करुणा और श्रम की गरिमा में निहित है। बेगमपुरा का उनका स्वप्न आज भी एक न्यायपूर्ण, भयमुक्त और समावेशी समाज की प्रेरक कल्पना बना हुआ है।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)





