राजस्थान विधानसभा के अमृत काल में प्रवेश पर कई कार्यक्रमों का आयोजन होगा

Several programmes will be organised to mark the entry of the Rajasthan Legislative Assembly into the Amrit Kaal

विधानसभाध्यक्ष वासुदेव देवनानी का औपचारिक ऐलान

गोपेन्द्र नाथ भट्ट

77वें गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने घोषणा की है कि वर्ष 2026 में राजस्थान विधानसभा के अमृत काल में प्रवेश पर कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जायेगा । देवनानी ने सोमवार को राजस्थान विधानसभा में 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर ध्वजारोहण के पश्चात अपने सम्बोधन में यह घोषणा की। उन्होंने कहा कि राजस्थान विधानसभा का अपना गौरवपूर्ण इतिहास है और आज राज्य विधानसभा देश की सर्वश्रेष्ठ विधानसभाओं में से एक है। उन्होंने बताया कि विधानसभा में किए गए कई नवाचारों में मुख्य रूप से संविधान गैलेरी और वंदे मातरम् गैलेरी का निर्माण और कारगिल वाटिका विशेष उल्लेखनीय है । इन गैलेरी को जन दर्शन के लिए खोल देने से अब तक बयालीस हज़ार लोग इसे देख चुके है। देवनानी का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भावना के अनुसार विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को पाने के लिए राजस्थान को भी विकसित राजस्थान बनाने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाने आवश्यक है।

राजस्थान का विभिन्न चरणों में गठन

आजादी से पहले राजस्थान राजपुताना के नाम से जाना जाता था जिसमें कुल 22 छोटी बड़ी रियासतें और ठिकाना थे। 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी के बाद इन रियासतों और ठिकानों में से अधिकांश रियासतें और ठिकाने पांच विभिन्न चरणों में 1949 तक राजस्थान का गठन होने के साथ ही राज्य में शामिल हो गई। वर्तमान राजस्थान के गठन के पहले चरण में 17 मार्च 1948 को मत्स्य प्रदेश अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली रियासतें, दूसरे चरण में बांसवाड़ा, बूंदी, डूंगरपुर, झालावाड़, किशनगढ़, प्रतापगढ़, शाहपुरा, टोंक और कोटा रियासतें यूनियन ऑफ राजस्थान का हिस्सा बनी, इसके तीन दिन बाद ही तीसरे चरण में उदयपुर महाराणा ने भी यूनियन ऑफ राजस्थान में शामिल होने का फैसला लिया और देश के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने 18 अप्रैल को उदयपुर आकर यूनियन ऑफ राजस्थान का उद्घाटन किया। इस घटना ने राजपुताना की बीकानेर, जैसलमेर, जयपुर और जोधपुर जैसी बड़ी रियासतों के लिए भी राजस्थान में शामिल होने का मार्ग प्रशस्त किया और चौथे चरण में 30 मार्च 1949 को ग्रेटर राजस्थान का गठन हुआ जिसका उद्घाटन तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने जयपुर में किया। इस तरह राजस्थान का गठन 30 मार्च 1949 को विभिन्न रियासतों के एकीकरण से हुआ। पांचवें चरण में 15 मई 1949 को मत्स्य प्रदेश की रियासतें भी औपचारिक रूप से वृहत राजस्थान में शामिल हो गई। छठे चरण में 7 फरवरी 1950 को आबू और दिलवाड़ा मुम्बई राज्य से अलग होकर राजस्थान का अभिन्न अंग बनी।

राज्य का एकीकरण और विधानसभा का गठन

उस समय तक इन रियासतों में प्रजामंडल आंदोलनों के माध्यम से जनप्रतिनिधि संस्थाओं का गठन करने की माँग उठ चुकी थी। भारतीय गणतन्त्र की स्थापना के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव रखने के उद्देश्य से 23 फरवरी 1952 को राजस्थान की पहली विधानसभा का गठन हुआ। इससे पहले एक अस्थायी विधानसभा ने प्रशासनिक कार्यों का संचालन किया था। राजस्थान विधानसभा की पहली बैठक 29 मार्च 1952 को जयपुर में आयोजित हुई, जिससे राज्य में संवैधानिक विधायी कार्यवाही का विधिवत आरंभ हुआ। तब विधानसभा में सदस्यों की संख्या 160 थी।
इस प्रकार, मार्च 1952 में ही राजस्थान में लोकतांत्रिक विधायी परंपरा की औपचारिक शुरुआत हुई, जो आगे चलकर राज्य की राजनीति और शासन व्यवस्था की मजबूत नींव बनी।

विधायकों की बढ़ती संख्या

पहली राजस्थान विधानसभा में कुल 160 सदस्य थे। वर्ष 1952 में हुए पहले आम चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और हीरालाल शास्त्री राज्य के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री बने। विधानसभा के पहले अध्यक्ष (स्पीकर) नरोत्तम लाल जोशी नियुक्त हुए। यह कालखंड प्रशासनिक ढाँचे के निर्माण और लोकतांत्रिक परंपराओं को स्थापित करने का था।1957 में राजस्थान विधानसभा सदस्यों की संख्या 176 तथा 1967 में 184 हो गईं और राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के बाद राजस्थान का भौगोलिक स्वरूप विस्तृत हुआ। राजस्थान के गठन के सातवें चरण में अजमेर-मेरवाड़ा के 1 नवंबर 1956 को राजस्थान में विलय हो जाने के साथ ही विधानसभा ने विधायकों के सीटों की संख्या बढ़ाई गई तथा नवम्बर 1956 में यह 190 हो गई । बाद में अजमेर-मेरवाड़ा के राजस्थान में विलय हो जाने के साथ ही मध्य भारत के मंदसौर जिले की भानपुरा तहसील के सुनेल टप्पा गाँव और आबू एवं दिलवाड़ा के राजस्थान में पुनर्विलय तथा झालावाड़ जिले के सिरोंज सब डिवीजन को मध्य भारत में स्थानांतरित कर देने के बाद राजपुताना की 19 रियासतों तथा 3 ठिकानों के राजस्थान में विलय के साथ ही वर्तमान राजस्थान के गठन की प्रक्रिया पूरी हुई।

वर्तमान में विधायकों की संख्या

राजस्थान में समय-समय पर परिसीमन के आधार पर राज्य विधानसभा के सदस्यों की संख्या में परिवर्तन हुआ है और अंततः 1977 में विधानसभा की सदस्य संख्या 200 निर्धारित की गई जो कि वर्तमान में भी कायम है। इनमें से 141 सदस्य सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों से,जबकि 34 अनुसूचित जाति और 25 सीटे अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। विधानसभा के कुल 200 सदस्यों में से 21 महिला सदस्य भी है।

विधानसभा के इतिहास में कई महत्वपूर्ण दौर

राजस्थान विधानसभा ने अपने इतिहास में कई महत्वपूर्ण राजनीतिक दौर देखे हैं। 1952,1957 और 1962 के चुनावो तक राज्य विधानसभा में कांग्रेस का दबदबा रहा जबकि 1967 के चुनावों में पहली बार कांग्रेस के अलावा अन्य दलों की मजबूत उपस्थिति सामने आई। 1972 में भी कांग्रेस की सरकार बनी लेकिन 1977 में आपातकाल के बाद हुए चुनावों में राज्य में पहली बार गैर कांग्रेस सरकार के रूप में भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी, जिसने सत्ता परिवर्तन की संस्कृति को मजबूती दी। 1990 के दशक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा, बीजेपी ) के उभार के साथ ही राज्य की राजनीति द्विदलीय स्वरूप में हर पांच वर्षों बाद एक बार कांग्रेस और एक बार भाजपा की सरकारों के रूप में स्थिर होती चली गई तथा क्रमशः भैरोंसिंह शेखावत (भाजपा),अशोक गहलोत (कांग्रेस) तथा वसुंधरा राजे (भाजपा) के नेतृत्व में सरकारें बनती रहीं। 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद वर्तमान में राजस्थान के मुख्यमंत्री भाजपा भजन लाल शर्मा और 16 वीं विधानसभा के विधानसाध्यक्ष वासुदेव देवनानी है।

राजस्थान विधानसभा : लोकतांत्रिक परंपरा का सात दशक लंबा सफ़र

राजस्थान विधानसभा का इतिहास स्वतंत्र भारत के संघीय ढाँचे में लोकतंत्र की जड़ों को मज़बूत करने की कहानी है। यह इतिहास केवल एक विधायी संस्था के गठन का नहीं, बल्कि रियासतों के एकीकरण, संविधान के क्रियान्वयन और जनप्रतिनिधित्व के क्रमिक विकास का सजीव दस्तावेज़ है। आज राजस्थान विधानसभा न केवल राज्य की सर्वोच्च विधायी संस्था है, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक चेतना की दिशा तय करने वाला प्रमुख मंच भी है।

विधानसभा की कार्यवाही का स्थायी स्थल जयपुर स्थित विधानसभा का भव्य भवन है। यह भवन स्थापत्य की दृष्टि से भी विशिष्ट है, जहाँ राजस्थानी परंपरा और आधुनिक प्रशासनिक आवश्यकताओं का समन्वय दिखाई देता है। सदन की कार्यवाही प्रश्नकाल, शून्यकाल, विधेयकों की प्रस्तुति, बजट चर्चा और स्थगन प्रस्तावों के माध्यम से संचालित होती है। यहीं राज्य के कानूनों का निर्माण और नीतिगत निर्णयों पर बहस होती है।

राजस्थान विधानसभा ने सामाजिक सुधारों और विकास योजनाओं को कानूनी आधार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भूमि सुधार कानून, पंचायती राज व्यवस्था को सशक्त बनाने वाले अधिनियम, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण से जुड़े कानून इसी सदन की देन हैं। साथ ही, सदन ने कई बार जनहित के मुद्दों पर सरकार की जवाबदेही भी सुनिश्चित की है। विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका सदन की गरिमा बनाए रखने में केंद्रीय रही है। विभिन्न कालखंडों में माननीय अध्यक्षों ने निष्पक्षता और संसदीय परंपराओं की रक्षा करते हुए सदन का संचालन किया है। सदन के उपाध्यक्ष और विभिन्न समितियाँ भी विधायी कार्य को गहराई और गंभीरता प्रदान करती रही हैं। संक्षेप में कहा जाए तो राजस्थान विधानसभा का इतिहास सत्ता परिवर्तन, जन आंदोलनों,संवैधानिक विकास और लोकतांत्रिक मूल्य के विकास की निरन्तर यात्रा का इतिहास है। यह संस्था न केवल कानून बनाने का मंच है, बल्कि राजस्थान की सामाजिक – सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक और विकास से जुड़ी चेतना का प्रतिबिंब भी हैं।

राजस्थान विधानसभा का अमृत काल

राजस्थान विधानसभा वर्ष 2026 के आगमन के साथ ही अपने गठन के अमृत काल में प्रवेश कर रही है। इस अवसर पर विधानसभा इस वर्ष और अगले वर्ष भर विविध और बहुआयामी कार्यक्रमों का आयोजन करने जा रही है। इन आयोजनों का उद्देश्य राज्य की लोकतांत्रिक परंपराओं, विधायी इतिहास और जनप्रतिनिधित्व की सात दशक से अधिक समय की यात्रा को नई पीढ़ी के सामने प्रस्तुत करना है। विधानसभा द्वारा प्रस्तावित होने वाले कार्यक्रमों को शिक्षा, जनसंवाद और लोकतांत्रिक जागरूकता से जोड़े जाने की उम्मीद है।

विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी और राज्य सरकार का मानना है कि अमृत काल के होने वाले कार्यक्रम न केवल अतीत की उपलब्धियों का स्मरण कराएंगे, बल्कि भविष्य के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों को और सुदृढ़ करेंगे। यह पहल युवाओं में संवैधानिक चेतना विकसित करने और लोकतंत्र के प्रति विश्वास को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। कुल मिलाकर, राजस्थान विधानसभा का अमृत काल केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि लोकतंत्र के सशक्तिकरण और जनसंवाद के विस्तार का अवसर बन उभरेगा ऐसी उम्मीद है। आने वाले वर्ष राज्य के राजनीतिक, सामाजिक और विकास को नई दिशा और नई ऊर्जा प्रदान करेंगे। आज के दौर में राजस्थान विधानसभा तकनीकी रूप से बहुत अधिक सक्षम हों रही है और विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने इसमें कई ऐसे नवाचार किए है जिससे राजस्थान विधानसभा का नाम देश दुनिया में सम्मान के साथ लिया है रहा है।