सुनील कुमार महला
शहीद-ए-आजम भगत सिंह की बहादुरी, देशभक्ति और क्रांतिकारी विचारों से आज कौन परिचित नहीं है ? उनका जन्म 28 सितंबर 1907 (कुछ स्रोतों के अनुसार 19 अक्टूबर 1907) को बंगा गांव, जिला लायलपुर (अब पाकिस्तान) में एक देशभक्त परिवार में हुआ था। उनके पिता सरदार किशन सिंह, माता विद्यावती तथा चाचा अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे। कहते हैं कि जन्म के समय पिता और चाचा के जेल से रिहा होने पर उनकी दादी ने उन्हें ‘भागों वाला’ कहा था, जिससे उनका नाम ‘भगत सिंह’ पड़ा। पाठकों को बताता चलूं कि उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही प्राप्त की, फिर लाहौर के डीएवी हाई स्कूल में पढ़े और बाद में लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित नेशनल कॉलेज से बीए किया।वे हिंदी, पंजाबी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू और बांग्ला जैसी भाषाओं के ज्ञाता थे।
13 अप्रैल 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उनके जीवन की दिशा बदल दी थी और मात्र 12 वर्ष की छोटी-सी आयु में ही वे अमृतसर जाकर जलियांवाला बाग की रक्तरंजित मिट्टी एक बोतल में भरकर ले आए थे। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वर्ष 1921 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने स्कूल छोड़ दिया था, किंतु चौरी-चौरा कांड के बाद आंदोलन वापस लेने से निराश होकर सशस्त्र क्रांति का मार्ग अपनाया। यहां पाठकों को बताता चलूं कि चौरी-चौरा कांड उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नामक स्थान पर 4 फरवरी 1922 को हुआ था, जब असहयोग आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस में टकराव हुआ। पुलिस की गोलीबारी से क्रोधित भीड़ ने थाने में आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए। इस हिंसा से आहत होकर महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया, जिससे स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदल गई। बहरहाल, यहां बता दें कि वर्ष 1926 में भगतसिंह ‘नौजवान भारत सभा’ की स्थापना की थी और चंद्रशेखर आजाद के साथ मिलकर ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (एचएसआरए) का पुनर्गठन किया। लाला लाजपत राय पर हुए लाठीचार्ज के कारण हुई मृत्यु का बदला लेने हेतु उन्होंने राजगुरु और सुखदेव के साथ मिलकर 1928 में जे.पी. सांडर्स की हत्या की। बाद में, वर्ष 1929 में ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ के विरोध में उन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में खाली स्थान पर बम फेंके और जानबूझकर गिरफ्तारी दी, ताकि अदालत के माध्यम से अपनी बात जनता तक पहुंचा सकें। गौरतलब है कि उनका उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं था, बल्कि ‘बहरों को सुनाना’ था। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि-‘बम और पिस्तौल क्रांति नहीं लाते, क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।’ यहां यह भी उल्लेखनीय है कि लाहौर सेंट्रल जेल में उन्होंने 404 पृष्ठों की डायरी लिखी, जिसमें उन्होंने कार्ल मार्क्स, टॉम पेन और विक्टर ह्यूगो जैसे विचारकों के उद्धरणों के साथ ‘पूंजीवाद’, ‘धर्म’ और ‘स्वतंत्रता’ पर अपने विचार दर्ज किए। इतना ही नहीं, उन्होंने कैदियों के साथ भेदभाव के विरुद्ध 116 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल भी की और यह मांग की कि भारतीय राजनीतिक कैदियों को भी ब्रिटिश कैदियों जैसी सुविधाएं मिलें।
बहरहाल , यदि हम यहां पर शहीद-ए-आजम भगत सिंह के कुछ प्रसिद्ध और प्रेरणादायक कथनों की बात करें तो इनमें क्रमशः ‘इंकलाब ज़िंदाबाद!’, ‘बम और पिस्तौल क्रांति नहीं लाते, क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।’,’ मैं एक इंसान हूँ, और जो कुछ भी मानवता को प्रभावित करता है, उससे मुझे मतलब है।’, ‘किसी भी व्यक्ति को मारना आसान है, लेकिन उसके विचारों को नहीं।’,’ जो व्यक्ति प्रगति के लिए संघर्ष करता है, उसे हर रूढ़िवादी चीज़ की आलोचना करनी होगी।’,’ क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।’,’ जिंदगी तो अपने दम पर जी जाती है, दूसरों के कंधों पर तो सिर्फ जनाज़े उठाए जाते हैं।’,’ मैं नास्तिक हूँ, और यह मेरी सोच का परिणाम है।’,’ स्वतंत्रता हर इंसान का जन्मसिद्ध अधिकार है।’,’ वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं मार सकते।’ आदि शामिल हैं।
वास्तव में, भगतसिंह केवल क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि एक प्रखर बुद्धिजीवी और बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी थे। उन्हें मूक फिल्मों का शौक था, तथा वे मिर्जा गालिब और अल्लामा इकबाल की शायरी से प्रभावित थे। यही कारण है कि उनकी लेखनी में इनका प्रभाव साफ झलकता था। इतना ही नहीं, वे नाटकों के भी शौकीन थे और नेशनल कॉलेज की ड्रामा सोसाइटी में सक्रिय रहकर ‘राणा प्रताप’ और ‘भारत दुर्दशा’ जैसे नाटकों में उन्होंने अभिनय किया।वे फोटोग्राफी और वेश-परिवर्तन में भी निपुण थे।उन्होंने ‘प्रताप’, ‘किरती’ और ‘महारथी’ पत्रिकाओं में ‘बलवंत’, ‘रंजीत’ और ‘विद्रोही’ जैसे छद्म नामों से लेख लिखे, जिनकी तर्कपूर्ण गहराई से ब्रिटिश अधिकारी भी प्रभावित होते थे। जेल में उन्होंने ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?’ निबंध लिखकर अंधविश्वास के विरुद्ध अपने तर्क प्रस्तुत किए और मानवता को सर्वोच्च माना। और तो और उन्होंने ‘अछूत समस्या’ जैसे सामाजिक विषयों पर भी अनेक लेख लिखे और यह स्पष्ट किया कि सच्ची आजादी तब तक अधूरी है, जब तक जातिवाद और छुआछूत समाप्त नहीं होते।
व्यक्तिगत जीवन में भी उनका त्याग अद्वितीय था। जानकारी मिलती है कि विवाह के दबाव से बचने के लिए उन्होंने अपना घर तक छोड़ दिया था और कानपुर जाकर ‘प्रताप’ अखबार में कार्य किया तथा पिता को पत्र लिखकर यह कहा कि उनका जीवन देश की आजादी के महान उद्देश्य के लिए समर्पित है। उन्होंने किसान-मजदूर आधारित समाज की कल्पना की, जिस पर समाजवाद और मार्क्सवाद का स्पष्ट प्रभाव था, और वे ‘इंसान द्वारा इंसान के शोषण’ के विरुद्ध थे।
बहरहाल, यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि भगत सिंह को ब्रिटिश सरकार ने मुख्यतः लाहौर षड्यंत्र केस में दोषी ठहराते हुए फांसी दी। उन्होंने अपने साथियों राजगुरु और सुखदेव के साथ मिलकर 1928 में जेम्स ए. स्कॉट को मारने की योजना बनाई थी, लेकिन गलती से जॉन सॉन्डर्स की हत्या हो गई। इसके अलावा, 1929 में उन्होंने केंद्रीय विधानसभा में बम फेंककर अंग्रेजी शासन के खिलाफ विरोध जताया, हालांकि(जैसा कि ऊपर इस आलेख में पहले भी चर्चा कर चुका हूं कि) उनका उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं था। ब्रिटिश अदालत ने इन कार्रवाइयों को गंभीर अपराध मानते हुए उन्हें 23 मार्च 1931 को फांसी की सजा दी। गौरतलब है कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च 1931 को फांसी दी जानी थी, लेकिन जनाक्रोश के भय से 23 मार्च 1931 की शाम को ही उन्हें निर्धारित समय से लगभग 11 घंटे पहले फांसी दे दी गई। फांसी के तख्ते पर जाते समय वे मुस्कुराते हुए ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे थे और ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ गाते हुए मौत को गले लगाया। कहा जाता है कि अपनी फांसी से ठीक पहले वे व्लादिमीर लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और उन्होंने कहा था-‘ठहरो, एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।’ विवरण मिलता है कि उन्होंने यह भी इच्छा जताई थी कि उन्हें फांसी के बजाय गोली से मारा जाए, क्योंकि वे स्वयं को युद्धबंदी मानते थे। बता दें कि फांसी से पहले उन्होंने बटुकेश्वर दत्त को एक भावुक पत्र भी लिखा, जिसमें अपने विचार और युवाओं के प्रति अपेक्षाएं व्यक्त कीं।
अंत में निष्कर्षतः, यही कहूंगा कि भगत सिंह का जीवन साहस, विचार, त्याग और बौद्धिकता का अद्वितीय संगम था। मात्र 23 वर्ष की आयु में उन्होंने हंसते-हंसते प्राण न्यौछावर कर यह सिद्ध कर दिया कि क्रांति केवल हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों की शक्ति से आती है। उनका ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा आज भी अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की अमर प्रेरणा है और यह संदेश देता है कि व्यक्ति को समाप्त किया जा सकता है, पर उसके विचारों को कभी मिटाया नहीं जा सकता।





