हिन्दी शिक्षकों की कमी : शिक्षा की आत्मा पर संकट

Shortage of Hindi teachers: A crisis to the soul of education

भाषा की कमजोरी से पूरे शिक्षा तन्त्र पर असर

हरियाणा के विद्यालयों में अध्यापकों के सोलह हज़ार आठ सौ चालीस पद रिक्त हैं, जिनमें सर्वाधिक कमी हिन्दी विषय की है। हिन्दी केवल एक विषय नहीं बल्कि सम्पूर्ण शिक्षा की आत्मा है। भाषा की कमजोरी से गणित, विज्ञान और अन्य विषयों की समझ भी प्रभावित होती है। सरकार ने अस्थायी नियुक्तियाँ तो की हैं, पर स्थायी भर्ती की गति धीमी है। यदि शीघ्र समाधान नहीं हुआ तो शिक्षा का स्तर गिरने के साथ-साथ सांस्कृतिक जड़ों से भी दूरी बढ़ेगी।

डॉ सत्यवान सौरभ

हरियाणा विधानसभा में हाल ही में प्रस्तुत आँकड़े यह चौंकाने वाले तथ्य सामने लाते हैं कि प्रदेश के चौदह हज़ार दो सौ पचानवे विद्यालयों में से सोलह हज़ार आठ सौ चालीस पद अध्यापकों के रिक्त पड़े हैं। यह केवल संख्या नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की गहरी चिन्ता का विषय है। और सबसे अधिक चिन्ताजनक तथ्य यह है कि इन रिक्तियों में सर्वाधिक पद हिन्दी विषय के अध्यापकों के हैं।

हिन्दी केवल एक विषय नहीं, बल्कि सम्पूर्ण शिक्षा का आधार है। भाषा वह माध्यम है, जिसके ज़रिये बालक अन्य सभी विषयों को समझता है। यदि भाषा में पकड़ नहीं होगी तो गणित के सूत्र, विज्ञान के सिद्धान्त और सामाजिक विज्ञान के प्रश्न भी अधूरे रहेंगे। इसीलिये हिन्दी अध्यापकों की भारी कमी केवल भाषा शिक्षा का संकट नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तन्त्र की कमजोरी का संकेत है।

किसी भी समाज की शिक्षा व्यवस्था उसकी मातृभाषा पर आधारित होती है। भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में हिन्दी करोड़ों लोगों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। हरियाणा जैसे हिन्दीभाषी राज्य में बच्चों के लिये पहली शिक्षा हिन्दी के माध्यम से ही होती है। यदि हिन्दी पढ़ाने वाले अध्यापक ही पर्याप्त नहीं होंगे, तो बच्चे न केवल भाषा में पिछड़ेंगे बल्कि अन्य विषयों को भी सही ढंग से आत्मसात नहीं कर पाएँगे।

आज स्थिति यह है कि प्राथमिक से लेकर उच्चतर माध्यमिक स्तर तक हज़ारों पद खाली पड़े हैं। हिन्दी की कक्षाएँ कई स्थानों पर या तो बिना अध्यापक के चल रही हैं या फिर अस्थायी अध्यापकों के भरोसे हैं। इसका सीधा प्रभाव बच्चों की लिखने-पढ़ने की क्षमता पर पड़ रहा है।

बच्चे शब्दों का सही उच्चारण, वाक्य निर्माण और व्याकरण में दक्ष नहीं हो पा रहे हैं। जब भाषा में पकड़ कमज़ोर होगी तो गणित, विज्ञान या इतिहास पढ़ते समय भी विद्यार्थी समझ नहीं पाएँगे। आज प्रत्येक परीक्षा में हिन्दी अनिवार्य है। अध्यापक की कमी से विद्यार्थियों की तैयारी अधूरी रह जाती है। भाषा केवल शिक्षा का माध्यम नहीं, संस्कृति का वाहक भी है। हिन्दी से दूरी का अर्थ है अपनी जड़ों से दूरी।

हरियाणा सरकार ने कौशल रोज़गार निगम के माध्यम से अब तक एक लाख उन्तीस हज़ार चार सौ तीस नियुक्तियाँ की हैं। इसमें आरक्षण और कोटा भी लागू किया गया है। किन्तु यह नियुक्तियाँ अधिकतर अस्थायी हैं। स्थायी भर्ती की गति अत्यन्त धीमी है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के दो हज़ार आठ सौ छप्पन पद रिक्त हैं। सहायकों के चार हज़ार आठ सौ नौ पद खाली हैं। स्नातकोत्तर अध्यापक, प्रशिक्षित स्नातक अध्यापक और प्राथमिक स्तर पर भी हज़ारों पद खाली हैं। हिन्दी विषय में रिक्तियों की संख्या सबसे अधिक है।

सरकार के अनुसार भर्ती प्रक्रिया जारी है, किन्तु अस्पष्ट नीतियों, आरक्षण विवाद, और प्रशासनिक विलम्ब के कारण बच्चों की पढ़ाई लगातार प्रभावित हो रही है। भर्ती प्रक्रिया में विलम्ब, निजीकरण का दबाव, सामाजिक मानसिकता और नीति-निर्माण में लापरवाही ने इस समस्या को और गम्भीर बना दिया है। विज्ञान और गणित को प्राथमिकता देते हुए हिन्दी को सहायक विषय की तरह देखा गया, जबकि यह शिक्षा की आत्मा है।

इस समस्या का समाधान केवल संख्यात्मक नियुक्तियों से नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण भर्ती और प्रशिक्षण से ही सम्भव है। रिक्त पड़े हिन्दी अध्यापकों के पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरा जाए। अस्थायी व्यवस्था से शिक्षा का स्तर नहीं सुधरेगा। स्थायी अध्यापकों की नियुक्ति अनिवार्य है। केवल नियुक्ति ही पर्याप्त नहीं, अध्यापकों को समय-समय पर आधुनिक पद्धतियों और तकनीक का प्रशिक्षण देना आवश्यक है। हिन्दी विषय को ‘कम महत्त्वपूर्ण’ मानने की मानसिकता बदली जानी चाहिए और ग्रामीण-शहरी दोनों क्षेत्रों में समान रूप से नियुक्ति होनी चाहिए।

आज जब भारत ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना लेकर विश्व पटल पर अपनी पहचान बना रहा है, तब हिन्दी की महत्ता और भी बढ़ जाती है। प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक वैश्विक मंचों पर हिन्दी का प्रयोग कर रहे हैं। ऐसे में यदि हमारे ही बच्चों को हिन्दी का बुनियादी ज्ञान नहीं मिलेगा तो यह विडम्बना ही होगी। हिन्दी केवल भाषा नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा है। इसे सुदृढ़ करना अर्थात् पूरे शिक्षा तन्त्र को सुदृढ़ करना है। यदि हम बच्चों को हिन्दी में सक्षम बनाएँगे तो वे अन्य सभी विषयों में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ पाएँगे।

हरियाणा की शिक्षा व्यवस्था में सोलह हज़ार आठ सौ चालीस रिक्त पद केवल प्रशासनिक आँकड़ा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी की चिन्ता है। और हिन्दी विषय में सबसे अधिक कमी होना इस चिन्ता को और गहरा बना देता है। सरकार को चाहिए कि भर्ती प्रक्रिया को तीव्र करे, स्थायी नियुक्तियाँ सुनिश्चित करे और भाषा शिक्षा को प्राथमिकता दे। यदि हिन्दी अध्यापकों की कमी पूरी नहीं की गई तो यह केवल शिक्षा का ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक विकास का भी नुकसान होगा।

हमें यह समझना होगा कि भाषा ही शिक्षा की आत्मा है। आत्मा के बिना शरीर जितना निष्प्राण होता है, शिक्षा भी भाषा के बिना उतनी ही निर्जीव है।