जयदेव राठी
“राम नाम मनिदीप धरु, जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ, जौं चाहसि उजियार॥”
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि केवल एक पञ्चांग की तारीख नहीं है, यह उस क्षण का स्मरण है जब इस धरा पर मनुष्यता ने अपना सर्वोच्च आदर्श पाया था। वाल्मीकि ने रामायण के बालकाण्ड में लिखा है कि पुत्रकामेष्टि यज्ञ की समाप्ति के पश्चात, चैत्र शुक्ल नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र में, जब ग्रह-नक्षत्र परम शुभ स्थिति में थे, माता कौशल्या की गोद में दिव्य लक्षणों से सम्पन्न शिशु का जन्म हुआ। उस जन्म के साथ ही इस भूलोक पर एक नई चेतना का उदय हुआ, मर्यादा की चेतना, त्याग की चेतना, और धर्म की अखण्ड चेतना।
इस वर्ष राम नवमी का पावन पर्व सम्पूर्ण भारत मना रहा है। अयोध्या हो या आरावली की तलहटी, हिमालय की कन्दराएँ हों या दक्षिण के समुद्र-तट, आज समूचा भारत एक भाव में डूबा है, एक स्वर में गूँज रहा है: “राम!” परन्तु यह केवल उत्सव का दिन नहीं है। यह उस प्रश्न पर विचार करने का दिन है कि राम हमारे लिए क्या हैं? एक पौराणिक पात्र? एक ऐतिहासिक राजा? एक धार्मिक प्रतीक? नहीं राम इन सबसे बहुत बड़े हैं। राम वह दर्पण हैं जिसमें सनातन संस्कृति अपना चेहरा देखती है, और हर युग में उसे वही प्रतिबिम्ब मिलता है जिसकी उसे आवश्यकता होती है।
तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा — “रामु काज लागि तनु परिहरऊ” — अर्थात् शरीर को भी त्यागना पड़े तो राम के काज के लिए सहर्ष त्यागा जाए। यह केवल भक्ति की पंक्ति नहीं है, यह एक सम्पूर्ण दर्शन है। राम का जीवन ही एक महाकाव्य है जिसमें व्यक्ति, परिवार और राज्य तीनों की जिम्मेदारियाँ एक साथ निभाई गई हैं, और इनमें से किसी के साथ भी समझौता नहीं किया गया।
राम पुत्र हैं, परन्तु ऐसे पुत्र जिन्होंने पिता की आज्ञा को राजसिंहासन से बड़ा माना। राम पति हैं,परन्तु ऐसे पति जिन्होंने सीता के साथ कंद-मूल खाकर वनवास को भोग नहीं, धर्म समझा। राम राजा हैं परन्तु ऐसे राजा जिन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख को प्रजा की आस्था के समक्ष बलिदान कर दिया। यही कारण है कि वे केवल एक कथा के नायक नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की आत्मा बन गए।
आज के इस विखण्डित युग में, जब सम्बन्ध स्वार्थ की धुरी पर घूम रहे हैं, जब राजनीति में सत्य की तलाश वैसी ही निरर्थक लगती है जैसे रेत में जल की खोज, जब पुत्र माता-पिता को वृद्धाश्रम में छोड़कर विदेश चला जाता है, तब राम का स्मरण केवल भक्ति नहीं, एक सामाजिक अनिवार्यता है। राम का जीवन हमें बताता है कि कर्तव्य, प्रेम और मर्यादा, ये तीनों साथ चल सकते हैं। इनमें विरोध नहीं, सामंजस्य है।
राम का सबसे बड़ा सन्देश है, समावेशिता। उन्होंने निषादराज केवट को गले लगाया, शबरी के जूठे बेर खाए, वानरों की सेना से मित्रता की, और रावण के अनुज विभीषण को भी शरण दी। उनका राज्य किसी एक वर्ग का नहीं था, वह सबका था। उनके शासनकाल को ‘रामराज्य’ की संज्ञा इसीलिए मिली, क्योंकि वह ऐसा स्वर्णकाल था जब दरिद्र और धनवान, स्त्री और पुरुष, वनवासी और नागरिक, सबको समान न्याय और समान गरिमा प्राप्त थी। महात्मा गाँधी ने भी स्वतंत्र भारत के लिए इसी रामराज्य की कल्पना की थी।
यही वह आदर्श है जो राम को किसी एक जाति, किसी एक सम्प्रदाय, किसी एक प्रान्त का नहीं बनाता। उत्तर के राम उत्तर प्रदेश की अयोध्या में जन्मे, परन्तु दक्षिण के रामेश्वरम में उन्होंने शिव की आराधना की। पूर्व के बंगाल ने उनकी लीला को दुर्गापूजा से जोड़ा, और पश्चिम के राजस्थान ने उनके नाम को प्रत्येक अभिवादन में समाहित कर लिया — “राम-राम।”
किन्तु राम केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। यह जानकर गर्व और विस्मय दोनों होते हैं कि विश्वभर के 60 से अधिक देशों पर रामकथा का प्रभाव है हजारों वर्षों से यह कथा भारत से ईरान, तिब्बत से थाईलैंड, कंबोडिया से चीन, जापान से जावा, मलेशिया से म्यांमार, श्रीलंका से साइबेरिया और इंडोनेशिया के बाली द्वीप तक मनुष्यों के मनों पर अपनी छाप छोड़ती रही है।
थाईलैंड में रामायण को राष्ट्रीय पुस्तक का दर्जा प्राप्त है। थाई भाषा में रामायण को ‘रामकियेन’ कहते हैं, जिसका अर्थ है, राम की कीर्ति। यहाँ के राजा को विष्णु का अवतार माना जाता है और उन्हें ‘राम’ की उपाधि दी जाती है।
थाईलैंड के वर्तमान चक्री वंश के सभी शासकों के नाम राम पर हैं, और वर्तमान संवैधानिक सम्राट वजिरालोंगकोर्न को ‘राम दशम्’ कहा जाता है। थाईलैंड के राजवाड़ों में भरत की भाँति राम की पादुकाएँ लेकर राज करने की परम्परा भी रही है। इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि राम केवल एक उपासना के विषय नहीं, बल्कि शासन और जीवन के आदर्श भी हैं?
इंडोनेशिया में नब्बे प्रतिशत आबादी मुस्लिम होने के बावजूद रामायण को राष्ट्रीय काव्य ग्रंथ का दर्जा दिया गया है। इंडोनेशिया वह पहला देश था जिसने 1973 में अंतर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन का आयोजन किया था।
इंडोनेशिया के प्रथम राष्ट्रपति सुकार्णो ने एक पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल के प्रश्न के उत्तर में स्पष्ट कहा था कि भले ही इस्लाम हमारा मज़हब है, पर राम और रामायण हमारी संस्कृति हैं। यह कथन अपने आप में एक सभ्यता का घोषणापत्र है। बाली के उलुवातु मंदिर में होने वाला रामायण नृत्य — ‘केचक डांस’ — केवल एक कलात्मक प्रस्तुति नहीं, वहाँ की रग-रग में बसी आस्था का जीवन्त प्रमाण है।
कंबोडिया के पास ‘रीमकर’ और थाईलैंड के पास ‘रामकिएन’ जैसे स्थानीय रूप हैं। कंबोडिया में रामकथा का स्थानीय संस्करण ‘रिएमकार’ बड़े महत्व के साथ जीवित है, जिसमें बौद्ध और हिन्दू दोनों परम्पराओं का सुन्दर समन्वय है। लाओस में भी ‘फ्रा राम’ की कहानी राष्ट्रीय महाकाव्य की श्रेणी में है, और वहाँ राम को गौतम बुद्ध का पूर्व अवतार माना जाता है। यह तथ्य बताता है कि राम की आत्मा इतनी विशाल है कि विभिन्न धर्म-परम्पराएँ भी उन्हें अपने भीतर समेट लेती हैं।
प्राचीन काल में थाईलैंड की राजधानी को ‘अजुध्या’ कहा जाता था, जिसका नाम श्रीराम की राजधानी अयोध्या पर रखा गया था। वहाँ ‘लवपुरी’ नाम का एक और प्राचीन नगर है, जिसका नाम राम के पुत्र लव के नाम पर है। यहाँ तक कि लाओस देश का नाम भी राम के पुत्र लव के नाम पर पड़ा माना जाता है। जिस संस्कृति के नायक के नाम पर किसी देश की राजधानी और किसी राष्ट्र का नामकरण हो, वह संस्कृति निश्चय ही सार्वभौमिक है।
रूस से लेकर अमेरिका तक और त्रिनिदाद जैसे कैरेबियाई देशों तक रामायण ने विभिन्न मंचों पर नए रूप धारण किए हैं। त्रिनिदाद में रामलीला के मंचन में काले और मुस्लिम समुदाय के लोग भी सहभागी होते हैं — यह केवल नाट्य-मंचन नहीं, एक पवित्र सांस्कृतिक स्थान बन चुका है, विश्व में कुल मिलाकर रामायण पर आधारित कम से कम तीन सौ ग्रंथ उपलब्ध हैं। यह संख्या नहीं, एक सभ्यता की गहराई है।
जब राम-नाम इतने विशाल भूभाग में, इतनी विभिन्न भाषाओं और परम्पराओं में जीवित है, तो यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि हम भारतवासी इस विरासत के साथ क्या कर रहे हैं? राम का नाम आज राजनीतिक मंचों पर तो गूँजता है, परन्तु क्या राम के आदर्श हमारे जीवन में उतरे हैं? जो राम वनवासियों के दुख में सहभागी हुए, जिन्होंने कभी अहंकार को नहीं पाला, जो राम सत्य के लिए सिंहासन त्यागने को सदा तत्पर रहे । उन्हें यदि केवल चुनावी भाषणों और मंच-सज्जा तक सीमित कर दिया जाए, तो यह उनके आदर्शों का नहीं, उनके नाम का उपयोग होगा।
राम का वास्तविक स्मरण वह है जो हमें सत्यनिष्ठ बनाए, जो हमें कर्तव्यपरायण बनाए, जो हमारे भीतर की क्षुद्रता को जलाकर भव्यता जगाए। राम केवल देवालयों में नहीं हैं, वे हर उस हृदय में हैं जो सच बोलने का साहस रखता है, हर उस हाथ में हैं जो दीन की सहायता को उठता है, हर उस मन में हैं जो छल-कपट से परे जाकर धर्म की राह चुनता है।
यह पावन तिथि हम सबके लिए एक आत्म-परीक्षण का अवसर है। आज जब दुनिया के साठ से अधिक देश किसी न किसी रूप में राम-कथा की विरासत को सँजोए हुए हैं, तब भारत का यह दायित्व और भी बढ़ जाता है कि वह राम के आदर्शों को जीवन्त रखे — न केवल मंदिरों में, बल्कि परिवार में, समाज में और शासन-व्यवस्था में। हमें स्वयं से पूछना चाहिए — क्या हमारे जीवन में राम हैं? केवल मन्त्रोच्चार में नहीं, केवल आरती के दीप में नहीं, बल्कि हमारे आचरण में, हमारे व्यवहार में, हमारे संकल्पों में?
वाल्मीकि ने राम को “मर्यादा पुरुषोत्तम” कहा था — पुरुषों में उत्तम और मर्यादाओं का पालन करने वाले। यह उपाधि आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, बल्कि आज और अधिक आवश्यक है। जब मर्यादाएँ टूट रही हैं, जब संस्कार बिखर रहे हैं, जब व्यक्ति और समाज के बीच की खाई गहरी होती जा रही है, तब राम का स्मरण एक औषधि की तरह है।





