आलोक बाजपेयी
हॉरमुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का ताज़ा घटनाक्रम केवल डोनाल्ड ट्रम्प के लिए एक सैन्य या कूटनीतिक विफलता नहीं है; यह वैश्विक भू-राजनीति में आ रहे एक बड़े बदलाव का संकेत है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने चीन, जापान, ब्रिटेन और फ्रांस सहित दुनिया के सात बड़े देशों से अपील की कि वे अपनी नौसेना भेजकर हॉरमुज़ को खुला रखने में मदद करें। जवाब में जो सन्नाटा छाया, वह किसी भी शोर से ज्यादा असरकारक और स्पष्ट सन्देश वाला था। एक भी देश ने अमेरिकी गठबंधन में शामिल होने के लिए तुरंत हामी नहीं भरी। जर्मनी और जापान जैसे पुराने सहयोगियों ने तो साफ तौर पर किनारा कर लिया। यह घटनाक्रम न केवल अमेरिका के लिए एक ‘रियलिटी चेक’ है और वैश्विक राजनीति में भी इसके गहरे मायने हैं.
सॉरी डोनाल्ड, यह आपकी ‘पार्टी’ है, हमारा ‘युद्ध’ नहीं!
अभी कुछ समय पहले तक वाशिंगटन से एक फोन कॉल आने का मतलब होता था—पूरी दुनिया का ‘अटेंशन’ मोड में आ जाना। लेकिन स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ के घटनाक्रम में ट्रम्प को अनअपेक्षित रूप से दुनिया का जवाब मिला, “आपका युद्ध, आपकी मुसीबत। हमें इससे बाहर रखें।” यह किसी से छिपा नहीं है कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका की नीति अक्सर इज़राइल के हिसाब से तय होती है। इज़राइल ने ईरान के ख़िलाफ़ जो बिसात बिछाई, अमेरिका उसमें मोहरा बनने के लिए इतनी जल्दी में था कि उसने अपने ही जूतों के फीते नहीं बाँधे। नतीजा? ईरान के साथ एक ऐसा तनाव पैदा कर दिया गया जिसकी जरूरत ही नहीं थी। लेकिन असली ‘ट्विस्ट’ तब आया जब अमेरिका ने अपने सहयोगियों से कहा, “आइए, इस आग में थोड़ा घी आप भी डालिए।” और दुनिया ने हाथ जोड़ लिए।
जब सहयोगियों ने कहा: “थैंक्स, बट नो थैंक्स”
ऑपरेशन सेंटिनल’ (Operation Sentinel) के लिए ट्रंप की पुकार का दुनिया द्वारा अनसुना किया जाना इतिहास की विरल घटना है . अमेरिका को उम्मीद भी नहीं होगी कि ईरान को घेरने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक गठबंधन बनाने की कोशिश को बिलकुल समर्थन नहीं मिलेगा , जिसकी उसे आदत है. जर्मनी का कड़ा रुख अपनाया और विदेश मंत्री हीको मास (Heiko Maas) ने स्पष्ट रूप से कहा कि जर्मनी अमेरिका के नेतृत्व वाले किसी भी मिशन का हिस्सा नहीं बनेगा। उनका तर्क है कि अमेरिका की “अधिकतम दबाव” (Maximum Pressure) की नीति गलत है और इससे युद्ध का खतरा बढ़ेगा। बर्लिन का संदेश साफ है – “हम आपकी आग बुझाने में मदद कर सकते हैं, लेकिन आग लगाने में नहीं।” जापान, जो अपनी ऊर्जा के लिए पूरी तरह मिडिल ईस्ट पर निर्भर है, ने भी कूटनीतिक दूरी बनाते हुए अमेरिकी गठबंधन में शामिल होने से मना कर दिया। टोक्यो ने इसके बजाय अपना ‘स्वतंत्र’ जहाज भेजने का फैसला किया, ताकि वह अमेरिका के आक्रामक रुख से खुद को अलग दिखा सके। यूरोप का डर फ्रांस और ब्रिटेन (शुरुआत में) के संकोच से दिखा। उनका मत था कि इज़राइल के इशारे पर ईरान के साथ तनाव बढ़ाना परमाणु समझौते (JCPOA) को पूरी तरह दफन कर देगा।
यह “Your war is your war, none of our war” वाला रवैया असल में वैश्विक परिपक्वता (Global Maturity) का प्रतीक है। बाकी दुनिया समझ गई है कि हर अमेरिकी ‘एडवेंचर’ का अंत लोकतंत्र की स्थापना नहीं, बल्कि तेल की कीमतों में आग और शरणार्थी संकट होता है।
‘अमेरिका फर्स्ट’ बना ‘अमेरिका अलोन’
ट्रम्प की विदेश नीति हमेशा से ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नारे पर टिकी रही है, जिसमें अक्सर सहयोगियों को बोझ माना गया या उन्हें अपनी सुरक्षा का खर्च खुद उठाने को कहा गया। आज जब अमेरिका को वास्तव में सहयोगियों की जरूरत पड़ी, तो दुनिया ने उसी सिक्के में जवाब दिया। यह अस्वीकृति दर्शाती है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध ‘ट्रांजेक्शनल’ या लेन-देन आधारित हो गए हैं। सहयोगी देश अब अमेरिका से यह सवाल पूछ रहे हैं कि जिस आग को भड़काने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी, उसमें वे अपने हाथ क्यों जलाएं?
अमेरिकी नेतृत्व पर भरोसे की कमी
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह शायद पहली बार है जब अमेरिका ने किसी ‘वैश्विक सुरक्षा मिशन’ के लिए आह्वान किया और उसके नाटो (NATO) सहयोगियों ने कदम पीछे खींच लिए। जर्मनी और फ्रांस का यह कहना कि वे कूटनीतिक समाधान चाहते हैं, न कि सैन्य। यह दर्शाता है कि यूरोप को अब अमेरिका की रणनीति पर भरोसा नहीं है। उन्हें डर है कि ट्रम्प के नेतृत्व में कोई भी नौसैनिक मिशन रक्षात्मक न रहकर आक्रामक युद्ध में बदल सकता है, जिसका खामियाजा उनकी अपनी अर्थव्यवस्थाओं को भुगतना पड़ेगा। जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश, जो परंपरागत रूप से अमेरिका के सबसे करीबी सुरक्षा साझेदार रहे हैं, का पीछे हटना बहुत गंभीर संकेत है। यह दर्शाता है कि अब इन देशों को यह भरोसा नहीं है कि अमेरिकी नेतृत्व में चलाया गया कोई भी सैन्य मिशन स्थिरता लाएगा। उन्हें डर है कि हॉरमुज़ में जंगी जहाज भेजने से तनाव कम होने के बजाय और भड़क सकता है, जिसका सीधा असर उनकी अपनी ऊर्जा सुरक्षा (energy security) पर पड़ेगा।
ईरान के साथ सीधा टकराव टालने की कोशिश
हॉरमुज़ जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग 20% तेल गुजरता है। तार्किक रूप से, इसे सुरक्षित रखना हर देश के हित में है। फिर भी, देशों का पीछे हटना यह बताता है कि वे ईरान के साथ सीधा सैन्य टकराव नहीं चाहते। यह ‘सामरिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) का एक नया दौर है, जहाँ देश अपने आर्थिक हितों को अमेरिकी सुरक्षा छाते से ऊपर रख रहे हैं।
चीन का उदय और नई धुरी
ट्रम्प का चीन से मदद मांगना अपने आप में अनपेक्षित और विरोधाभास था। एक तरफ अमेरिका चीन को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानता है, और दूसरी तरफ उसी से सुरक्षा की गुहार लगा रहा है। चीन का इस गठबंधन से दूर रहना अपेक्षित था, लेकिन अन्य एशियाई देशों (जैसे जापान और दक्षिण कोरिया) की झिझक यह बताती है कि वे भी अब एशिया में सुरक्षा के लिए केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना चाहते।
एकध्रुवीय विश्व का दौर अब इतिहास की बात
यह घटना इस बात का सबूत है कि एकध्रुवीय विश्व (unipolar world)—जहाँ अमेरिका के एक इशारे पर दुनिया चल पड़ती थी—अब समाप्त हो चुका है। देश अब गुटबाजी के बजाय अपने ‘राष्ट्रीय हितों’ को प्राथमिकता दे रहे हैं। यूरोपीय देश अब अपनी सुरक्षा और कूटनीति को अमेरिका से स्वतंत्र होकर देख रहे हैं। वे अमेरिका के साथ ‘सुरक्षा साझेदार’ तो रहना चाहते हैं, लेकिन ‘जूनियर पार्टनर’ बनकर उसके हर युद्ध का हिस्सा नहीं बनना चाहते।
वो टूटी हुई बाँह और टूटता हुआ हौसला
अमेरिका द्वारा इज़राइल का युद्ध लड़ने का पुरज़ोर विरोध करने और अपनी बाँह तक तुड़ा लेने वाला अमेरिकी नौसैनिक अधिकारी, उस हताशा का प्रतीक था जो अमेरिकी सेना के भीतर पल रही है। जब सैनिक को पता चलता है कि वह अपने देश की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि किसी तीसरे देश के राजनीतिक एजेंडे के लिए लड़ रहा है, तो उसका मनोबल इसी तरह टूटता है। ट्रंप शायद भूल गए कि ‘सुपरपॉवर’ होने का मतलब दुनिया का पुलिसवाला बनना नहीं, बल्कि शांति का सेतु बनना होता है।
निष्कर्ष: सॉरी डोनाल्ड, वी वांट पीस!
“Sorry, Donald Trump… We want peace now” सुनने में हल्का-फुल्का लग सकता है, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर बदलाव छिपा है। दुनिया अब हर संघर्ष में शामिल होने को तैयार नहीं है। वह अब चुन रही है—कहाँ बोलना है, और कहाँ चुप रहकर भी बहुत कुछ कह देना है। ‘हॉरमुज़ संकट’ ने एक नई विश्व व्यवस्था की नींव रखी है। अब दुनिया “With us or against us” के बुश-युग वाले फॉर्मूले को नकार चुकी है। सहयोगियों का यह रवैया— “अगर युद्ध आपका है, तो लड़िए भी आप ही” —असल में शांति की ओर एक साहसी कदम है। जापान, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने यह साबित किया कि शांति बनाए रखने का सबसे अच्छा तरीका युद्ध में शामिल न होना है। हॉरमुज़ की लहरों ने यह संदेश पूरी दुनिया में फैला दिया है कि अब वाशिंगटन के एक इशारे पर दुनिया के बेड़े नहीं निकलेंगे। दुनिया अब आपसी रंजिश में ‘बलि का बकरा’ बनने को तैयार नहीं है। हॉरमुज़ की लहरों में अकेले नज़र आ रहे ट्रम्प के लिए संदेश सीधा है: “सॉरी डोनाल्ड, आपकी पार्टी के लिए हमारे पास समय नहीं है। हमें शांति चाहिए, और अभी चाहिए।”





